भोजन में और सब कुछ हो सिर्फ नमक न हो तो भोजन बेकार है। गाड़ी में और सब कुछ हो सिर्फ ब्रेक न हो तो गाड़ी बेकार है। मंदिर में और सब कुछ हो सिर्फ मूर्ति न हो तो मंदिर बेकार है। अस्पताल में और सब कुछ हो सिर्फ डॉक्टर न हो तो अस्पताल बेकार है। ठीक इसी तरह जीवन में और सब कुछ हो सिर्फ मन की शांति न हो तो जीवन बेकार है।

मेरा शांति से मतलब मन की शांति से है। शांति सबसे प्यारी सहेली है। संकल्प करें कि आप हर हाल में शांत रहेंगे और सोचेंगे कि शांति ही मेरी पूंजी है। शांति ही मेरी वसीयत है। शांति ही मेरा धर्म है। शांति ही मेरी मोहब्बत है। शांति ही मेरी संपदा है। दिमाग में भी शांति का ही चैनल चलाइए।

अपने दिमाग को ठंडा रखिए।

आज के आदमी का दिमाग जरूरत से ज्यादा गरम रहता है। मेरा आपसे निवेदन है कि आपने अपने मकान को एयरकंडीशनर बना लिया। दुकान को एयकंडीशनर बना लिया। मकान से जिस कार में बैठ कर दुकान जाते हो उसे भी एयरकंडीशनर कर लिया। अब एक काम और करिए। अपने दिमाग को भी एयरकंडीशनर बना लीजिए। अगर 

आपने अपने दिमाग को एयरकंडीशनर बना लिया तो सचमुच में जीवन ठंडा-ठंडा, कूल-कूल हो जायेगा।

एक भाई ने पूछा है: स्वर्ग मेरी मुट्ठी में कैद रहे। इसके लिए मुझे क्या करना होगा? कुछ नहीं, बस इतना ही करना होगा कि दिमाग को ठंडा रखो, जेब को गरम रखो, आंखों में शरम रखो, जुबान को नरम रखो और दिल में रहम रखो। बस फिर स्वर्ग तुम्हारी मुट्ठी में है। फिर तुम्हें किसी स्वर्ग की जरूरत नहीं है। बल्कि स्वर्ग ही चलकर तुम तक आयेगा। बस जरा तुम समझ लो कि तुम्हें क्या करना है? तुम्हारे कर्तव्य क्या हैं? कर्तव्य से ही भवितव्य बनता है।

शास्त्रों में चार आश्रम का वर्णन है- 

1. ब्रह्मचर्याश्रम

2. गृहस्थाश्रम

3. वानप्रस्थाश्रम

4. संन्यासाश्रम

हमारे ऋषि-मुनियों ने इन आश्रमों को जीवन के साथ यों बांटा कि 25 साल तक ब्रह्मचर्याश्रम। फिर 25 साल तक गृहस्थाश्रम। आदमी 50 साल का हो गया तो फिर 25 साल तक वानप्रस्थाश्रम। 75 साल का हो जाए तो सन्यासाश्रम ले लें। जरा गिनती पढ़िए। 50 साल के बाद इक्यावन।… वन शब्द आया गया। बावन,… तिरेपन…। 51 यह शब्द ही कहता है कि बस बहुत रम लिया गृहस्थी में। अब वन को याद कर। अब तेरा वानप्रस्थाश्रम का समय आ गया है। वानप्रस्थ का मतलब भले ही घर में रहो लेकिन अपना मुख वन की तरह रखो। भवन में वन में जैसे रहो।

वन बनने की प्रयोगशाला है। जो वन गया वह बन गया। राम वन गये तो बन गये। महावीर वन गये तो बन गये। बुद्ध वन गये तो बन गये। 

दो दोस्त थे। उन्होंने तय किया कि आज रेस्टोरेंट में जाकर बढ़िया भोजन करेंगे। ज्यों ही रेस्टोरेंट में प्रवेश किया तो सामने दो दरवाजे थे- एक पर लिखा था हिन्दुस्तानी भोजन और दूसरे पर लिखा था चाईनीज भोजन। वे चाईनीज भोजन कक्ष में घुस गये। ज्यों ही चाईनीज भोजन के कक्ष में घुसे फिर दो दरवाजे सामने थे। एक द्वार पर लिखा था शुद्ध घी का भोजन। दूसरे दरवाजे पर लिखा था डालडा का भोजन। उन्होंने सोचा: जब भोजन करने आये ही हैं तो डालडा का भोजन क्या करना, शुद्ध देशी घी का खायेंगे और वे शुद्ध देशी घी वाले कक्ष में घुस गये। ज्यों ही अन्दर घुसे फिर सामने दो दरवाजे थे-एक पर लिखा था ‘नगदÓ और दूसरे पर लिखा था ‘उधार’। बोले मजा आ गया। और उधार वाले कक्ष में घुस गये और जैसे ही उधार वाले कक्ष में घुसे होटल के बाहर निकल गये। होटल के बाहर एक साइन बोर्ड लगा था उस 

पर लिखा था यहां मुफ्तखोरों के लिए कोई जगह नहीं है।

आदमी का मन भी तो ऐसा ही है। वह चाहता तो है स्वर्ग लेकिन स्वर्ग के लिए करना कुछ नहीं चाहता। मन खाना तो शुद्ध देशी घी का चाहता है लेकिन उधार। धर्म उधार नहीं नगद है। धर्म उधार नहीं, उदार है। धर्म कल नहीं, आज है, अभी है, इसी वक्त है। धार्मिक होने के लिए अंतिम दिन की प्रतीक्षा न करें। बस आज और अभी शुरू कर दें क्योंकि कल का कोई भरोसा नहीं है। 

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