Dada dadi ki kahani : एक दर्जी था। वह बहुत अच्छे कपड़े सिलता था। काफ़ी गुणवान होने पर भी वह लालची था। जल्दी से बहुत सारे पैसे कमाने के तरीके ढूँढ़ता रहता था।
एक बार उसने पूरे शहर में यह ख़बर फैला दी कि उसने एक बिल्कुल नई तरह का कपड़ा बनाया है।
यह कपड़ा बहुत ही मुलायम है। बेहद ठंडा और हल्का है, इतना हल्का कि पहनने के बाद आपको महसूस तक नहीं होगा कि आपने कुछ पहना हुआ है। लेकिन यह कपड़ा केवल उन्हीं लोगों को दिखाई देगा, जो बुद्धिमान और एकदम भोले-भाले हैं और जिन्होंने कभी किसी का बुरा नहीं चाहा। उसने सबको बताया।
फिर उसने कपड़े का एक गट्ठर उठाया और सबको दिखाया। असल में वहाँ कोई कपड़ा था ही नहीं। वह दर्जी केवल ऐसा नाटक कर रहा था जैसे वह कोई कपड़ा सबको दिखा रहा हो। वहाँ जितने भी लोग थे, सबने कपड़े की बड़ी तारीफ़ की। वे बोले, ‘वाह, कितना बढ़िया कपड़ा है। इसकी बुनाई बिल्कुल नई तरह की है और रंग तो देखो, लाजवाब!’ अब तुम सोचोगे कि जब वहाँ कपड़ा था ही नहीं तो लोगों को दिखाई कैसे दिया? अरे भाई, उन लोगों में से जो भी यह कहता कि कपड़ा दिखाई नहीं दे रहा है, उसे सब मूर्ख कहते न! क्योंकि दर्जी ने कहा था कि कपड़ा बस उसी को दिखाई देगा, जो बुद्धिमान और भोला-भाला होगा। समझ गए न!
हाँ, तो यह ख़बर राजा तक भी पहुँची। राजा ने दर्जी को बुलाया और कहा-
‘हम चाहते हैं कि तुम उस कपड़े से हमारे लिए एक बढ़िया परिधान तैयार करो। ऐसे कपड़े, जिन्हें देखकर सब वाह-वाह करने लगें!’
दर्जी ने कहा, ‘जैसी आपकी आज्ञा महाराज, लेकिन मैं चाहता हूँ कि केवल आपके लिए अलग से कपड़ा बुनें। ऐसे सुंदर कपड़े बनाना चाहता हूँ जैसे कि कभी किसी ने न पहने हों।’
यह बात सुनकर राजा और भी प्रसन्न हो गए।
तब दर्जी ने कहा, ‘लेकिन, महाराज, एक छोटी सी समस्या है।’
‘कहो, क्या बात है?’ राजा बोले।
‘महाराज, इस कपड़े को बुनने वाला धागा बहुत ही महँगा आता है। और मेरे पास इतने सारे पैसे नहीं हैं कि आपके इस ख़ास कपड़े के लिए धागा ख़रीद पाऊँ।’ दर्जी ने कहा।
राजा बोले, ‘तुम चिंता मत करो, जितना चाहो उतना महँगा धागा खरीद लो। लेकिन हमारा परिधान बिल्कुल अलग होना चाहिए।
दर्जी तो यही चाहता था न!
उसने ढेर सारे पैसे ले लिए। उसे राजमहल में ही एक कमरा दे दिया गया। वह रात-दिन अपना करघा चलाता रहता था। उसके करघे पर न तो कोई धागा था, न ही कपड़ा। वह बस ऐसे ही नाटक करता था। जैसे कि बहुत व्यस्त है।
राजा के सभी दरबारी एक-एक करके कपड़े को देखने आए। सभी ने कपड़े की बहुत तारीफ़ की।
काफ़ी दिन राजमहल में आराम से रहने के बाद एक दिन दर्जी ने राजा से कहा-
‘महाराज, आपका परिधान तैयार है। उसने अपने हाथ आगे बढ़ाकर राजा को कपड़ा दिखाया। राजा ने भी कहा, ‘वाह, बढ़िया है।’ जबकि दर्जी के हाथों में कुछ था ही नहीं।
अब राजा ने राज्य में घोषणा करवाई कि वे अपने नए परिधान को पहनकर पूरे नगर में घूमेंगे, जिससे कि सब उनके सुंदर कपड़ों को देख सकें।
सभी लोग घरों से निकलकर सड़कों के किनारे पर खड़े हो गए।
राजा महल से निकले और एकदम गर्व के साथ आगे बढ़े। सभी प्रजाजन बोले, ‘वाह, कितना बढ़िया परिधान है। तभी एक छोटा-सा बच्चा बाहर आया और बोला, ‘महाराज ने तो कपड़े ही नहीं पहने हैं।’
तब सबको समझ में आया कि कोई कपड़ा नहीं है। एक बच्चे-से ज्यादा भोला-भाला तो कोई भी नहीं होता, फिर उसे कपड़ा दिखाई क्यों नहीं दिया।
सबने अपनी नज़रें नीचे झुका लीं। राजा का हाल तो बहुत ही बुरा था। बेचारे तेज़ी से महल की ओर भागे।
उसके बाद दर्जी का क्या हुआ यह तो बस पूछो ही मत। राजा ने आदेश दिया कि वह अपने ही बनाए गए इस कपड़े को पहनकर राज्य भर में घूमे।
मिल गया न उसे लालच का फल!
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