Haye mein Sharam se Tamatar Hui
Haye mein Sharam se Tamatar Hui

Hindi Vyangya: कुलमिलाकर शरम ने गुलामी के कपड़े उतार कर बेशरमाई का चोला अंगीकार कर लिया है। युवाओं की शरम भी, आधुनिकता की दौड़ में संस्कार की वर्जनाओं को तोड़ते हुए बेशरम हो चली है।

बहुत प्यारा नजारा है। श्रीमती जी सोफे पर लेटीं हुई हैं। नजरें उनकी पत्रिका पर टिकी हैं। पढ़ते हुए
मंद-मंद मुस्कुरा भी रहीं हैं। मैंने पूछा, ‘पत्रिका में क्या पढ़ रही हो भागवान? उन्होंने पत्रिका का खुला हुआ पृष्ठ मेरे सामने कर दिया और बोलीं, ‘हाय! मैं शरम से लाल हुई।
मुझे अचानक आसमान छूते टमाटरों की याद हो आई। दरअसल, शरम से लाल हो जाने का मामला मुझे टेक्नीकली ठीक नहीं लगता। मेरी खोपड़ी का ऐआईए एल्गोरिथम भिड़ाते हुए आंसर खोजने लगता है। खुराफाती लेखकीय दिमाग कलम घिसने बैठ जाता है। शरम से लाल हो जाने वाली
बात हजम नहीं होती। एक तो शरम के प्रादुर्भाव के संबंध में कोई ठीक-ठाक प्रमाण उपलब्ध नहीं है, दूसरा कोई पौराणिक उल्लेख भी मेरे सामने नहीं आया है। सिवा इसके कि आदम और हौवा नंगे
इस धरती पर आए थे। बचपन से लेकर जवानी तक बेशर्मों की भांति नंग-धडंग जंगलों में विचरते रहे। मेरा मानना है कि वर्जित फल के सेवन के बाद ही उन पर शरम हावी हुई होगी और अनावृत तन को ढकने का विचार कौंधा होगा। फिर तन पर पत्ते वगैरह लपेटने लगे होंगे। तदाधार पर माना जा सकता है कि शरम एक प्राचीन परंपरा है।
परंपराएं हमारी संस्कृति का हिस्सा हैं, लेकिन परंपराएं अब टूट रहीं है। माता-पिता का समान घट रहा है। परिवार बिखर रहे हैं। वसुधैव कुटु बकम का सूत्र भी बेमानी लगता है। परंपरागत वैवाहिक व्यवस्था ‘लिव-इन-रिलेशनशिप’ के साथ चरमरा रही है। शादी पूर्व की शरम, ‘प्रीवेडिंग शूट’ के अधुनातन रिवाज के साथ तिरोहित होती जान पड़ती है। पश्चिम में शरम पहले ही समाप्त हो चुकी है।
हमारे देश में भी शरम लगभग समाप्ति पर है। बेशरमाई का दौर आरंभ हो चुका है। फिल्मी पर्दे पर कपड़ों में छुपी शरम, बेपर्दा होने की जंग जीत चुकी है। ओटीटी शरम को भुनाने के प्लेटफार्म बन गए हैं। मोबाइल दर मोबाइल बेशर्मी नाचती हुई दिखाई देती है।

कुलमिलाकर शरम ने गुलामी के कपड़े उतार कर बेशरमाई का चोला अंगीकार कर लिया है। युवाओं की शरम भी, आधुनिकता की दौड़ में संस्कार की वर्जनाओं को तोड़ते हुए बेशरम हो चली है। इसलिए किसी का शरम से लाल हो जाना ठीक नहीं लगता। भले ही एक प्रेमी लाल-लाल टमाटरों में गोरी के गालों का आभास कर लेता हो, परन्तु मुझे बंद पड़े फ्रिज में बासी हो चले सुर्ख टमाटरों की याद आ जाती है।
दरअसल, शरमाकर लाल हो जाने का अतिशयोक्तिपूर्ण प्रयोग बिलकुल भी ठीक नहीं है। जब कोई मनचला पड़ोसी-युवक, किसी युवती के घर के सामने से एक्टिंग मारते हुए गुजरता है और युवती से नजरें चार होती हैं, तब द्विआयामी असर दिखाई पड़ता है। इधर मुस्कुराती युवती शरम से लाल होती है, उधर युवती का खलनायक भाई गुस्से से लाल हो जाता है! मजा देखिए, दोनों लाल हुए जा रहे हैं। एक शरम से और दूसरा गुस्से से! विकट विरोधाभास है। अजीब स्थिति निर्मित हो रही है!

अब यही बात टमाटरों के लाल हो जाने की लीजिए, तो अर्थ एक ही है? टमाटर पक चुके हैं। खा लिए जाने चाहिए, अन्यथा सड़ जाएंगे, इसके सिवा कुछ नहीं। अंतत: स्पष्ट है कि युवती का शरमा कर लाल हो जाना यथार्थ नहीं है। यथार्थ है, टमाटर का लाल होकर सड़ जाना। इसलिए मैं अपनी
शरम टमाटरों को समर्पित करता हूं। मैं ‘हाय मैं शरम से टमाटर हुई का प्रयोग किसी युवती के शरमाने के मामले में करता हूं तो इसमें किसी को शरम नहीं आना चाहिए, है कि नहीं बोलो!