Hindi Vyangya: टन्न -टन्न, टन्न-टन्न! किसी के थाली पीटने की आवाज से आस-पास की महिला मंडली काम-काज छोड़-छाड़ कर अपने-अपने घरों से बाहर निकल आई। सब यह पता लगाने में जुट गईं कि आखिर सुबह-सुबह ये आवाज कहां से आ रही है। पता चला मिश्राइन अपने ढहते शरीर की तरह अपनी ढहते घर के छज्जे पर खड़ी थाली पीट रही थी। बचपन में अम्मा के मुंह से सुना था घर में कोई खुशखबरी होती थी मेरा मतलब बहू रानी लल्ला या लल्ली जनती थी तब घर के बड़े-बुजुर्ग इसी तरह थाली पीटकर गांव-मुहल्ले के लोगों तक सूचना पहुंचाते थे। अम्मा बनने की उनकी उम्र थी नहीं और दादी बनने में अभी समय था। मिश्राइन की खुशी बरसाती नाले की तरह उफान मार रही थी और चेहरा चार सौ चालीस बोल्ट के लट्टू की तरह चम-चम चमक रहा था। कोई कुछ पूछने के लिए मुंह खोलता, मिश्राइन और उत्साह से थाली पीटने लगती। पीटते-पीटते थाली की कमर भी अब टेढ़ी हो चुकी थी पर मिश्राइन रुकी नहीं। लगता है कोई बड़ी बात थी। मिश्राइन धम्म-धम्म करती सीढ़ियों से नीचे उतर आई। उनके चरण कमल के स्पर्श मात्र से छोटा-मोटा भूकम्प आते-आते बचा। सब उन्हें ऐसे देख रहे थे मानो साक्षात परम्पिता परमेश्वर के दर्शन हुए हो। मिश्राइन ने अपनी उस थाली को चबूतरे पर रख दिया पर थाली महाशय मुंह सुजाये फूफा जी की तरह टेढ़े पड़ी रही। ‘जे क्या बात हो गई जीजी! जे थाली क्यों पीट रही हो?’ बगल वाली गुप्ताइन भाभी जी ने मुंह में ठुसे टूथब्रश को गुलगुलाते हुए कहा। मिश्राइन ने अखबार उनकी ओर बढ़ा दिया। सारी औरतें मधुमक्खी की तरह अखबार से चिपक गईं। अखबार के पहले पन्ने पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था महिला आरक्षण लोकसभा से पास। मिश्राइन अखबार पकड़े बुक्का मारकर रो पड़ीं।
मुहल्ले वाले को समझ नहीं आ रहा था कि आखिर अखबार में ऐसी कौन सी खबर निकली है कि मिश्राइन गंगा-जमुना बहाए पड़ी हैं। शुक्लाइन दौड़ कर रसोइघर से एक गिलास पानी ले आई। मिश्राइन ने एक सांस में पानी गुट-गुट करके गले के नीचे उतार दिया। मिश्राइन का गला भर आया था। आस-पड़ोस के मोहल्ले की औरतों ने सोचा लगता है घर में कोई बड़ी बात हो गई है।
‘मिश्राइन घबराओ नहीं, हमसे नहीं कहोगी तो फिर किससे कहोगी, अब हम ही तो तुम्हारे परिवार वाले हैं। पड़ोसी भी एक वक्त के बाद परिवार हो जाता है। दुख-सुख में तो रिश्तेदार बाद में पहुंचते हैं, पास-पड़ोस वाले ही सबसे पहले काम आते हैं।’ मिश्राइन ने आसमान की ओर देखा और दोनों हाथ जोड़ लिए। उनकी देखा-देखी सब औरतों ने भी हाथ जोड़ लिए पर मुद्दा अभी भी किसी को समझ नहीं आ रहा था।
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‘वो ऊपर वाला है न सबकी सुनता है, देखो हमारी भी सुन लिया। सत्ताईस साल से हम इस दिन का इंतजार कर रहे थे और देखो ये वक्त आ गया।’ मुद्दा अभी भी किसी को समझ में नहीं आया था। मिश्राइन ने मोटे-मोटे अक्षरों में लिखे उस हैडलाइन पर उंगली रख सबकी सोच पर विराम लगाया। सबके चेहरे खुशी से खिल गए। महिला आरक्षण लोकसभा से पास होने की खबर से खुश तो सभी थे पर मिश्राइन की खुशी कुछ दूसरी ही तरह की थी।
मिश्राइन जीजी जी की आंखों और नाक के परनाले एक बार फिर खुल गए। उनकी हिचकियां बंध गई। ‘क्या बताएं जीजी जी, आज से सत्ताईस साल पहले जब हम कॉलेज में पढ़ते थे। संसद में महिला आरक्षण बिल पेश हुआ था। कॉलेज में उस दिन इस विषय पर वाद-विवाद प्रतियोगिता थी। हम पक्ष में बोले थे और हमारी कक्षा का लड़का विपक्ष में बोला था। हमने इस बिल के पास होने के पक्ष के संदर्भ में अपने विचार रखे। निर्णायक मंडल हमसे इतने खुश हुए उन्होंने हमें विजेता घोषित कर दिया।’
‘फिर…’ गुप्ताइन जीजी ने आंखें चौड़ी करके कहा। ‘हम कॉलेज से खुशी-खुशी घर जाने के लिए निकले। तभी एक काली-पीली टैम्पों हमारे सामने आकर रुकी। टैम्पू खचा-खच भरी हुई थी। टैम्पू वाले ने हमें बैठने का इशारा किया। पीछे की सीट पर चार-चार यात्री पहले से ही बैठे थे तिल रखने की जगह भी नहीं थी। हमने गुस्से में कहा, ‘कहां बैठें, जगह तो है नहीं? जानती हो जीजी उस टैम्पू में वो लड़का भी बैठा था जो हमसे प्रतियोगिता में हारा था। टैम्पू वाले ने उस लड़के को इशारा किया कि वह आगे आकर बैठ जाए। उस लड़के ने हमें ऊपर से नीचे तक देखा और खिसियाकर बोला इन्हें आगे बैठने में शर्म आ रही है और इन्हें महिला आरक्षण चाहिए। उसकी वो बात हमारे कलेजे में धंस गई। सच बता रहे, कितनी रातें हम चैन से नहीं सोए। सालों-साल ये बात कानों में घूमती रही बराबरी की बात तो सब करते हैं पर बराबरी कोई देना नहीं चाहता, पर देखो न जीजी अब हमारे भी दिन बहुरेंगे। हमारी भी सुनने वाला और बात पहुंचाने वाला कोई न कोई होगा।’ मिश्राइन की आंखों के लट्टू चमक उठे और गुप्ताइन सोच रही थी काश घरों में भी महिलाओं के अधिकारों के लिए आरक्षण की व्यवस्था होती।
