गंगा पीछे रह गई थी, वाराणसी का स्टेशन भी। एक यात्रा तो पूरी हुई, लेकिन दूसरी…?

अजीब सा शोर है, अजीब सी सनसनी। गंगा का नतोदर प्रवाह जैसे प्रत्यंचा है और ट्रेन एक छूटा हुआ तीर। तब के विसर्जित दृश्य एक-एक कर उतराने लगे, प्रतिभा के भीतर एक नदी-सी बह चली थी। वही पुल, वही घाट, वही सीढ़ियां, वही मणिकर्णिकाएं, वही जलती चिताएं। एक चिता उसके भीतर भी जल रही थी…।

प्रतिभा को आज भी वह दिन याद था, जब रणवीर ने उसे बताया, ‘आज मैंने अपने घरवालों को सूचित कर दिया है कि मैं तुमसे शादी कर रहा हूं।’ प्रतिभा की सारी इंद्रियां जैसे कान और आंख में सकेन्द्रित हो गई थीं, ‘क्या कहा उन्होंने?’

‘वही जो मैं एक्स्पेक्ट कर रहा था।’ रणवीर ने सपाट सा उत्तर दिया।

‘फिर भी…? यह जानना मेरे लिए बहुत जरूरी है, सच-सच बताओ, कुछ भी छुपाना नहीं, तुम्हें…मेरी कसम’, प्रतिभा ने रणवीर का हाथ पकड़ते हुए कहा था।

‘ठीक है बाबा, सुनो…पहले पूछा लड़की कौन है?’ ‘जब मैंने उन्हें बताया कि मेरी कुलीग है तो और सवाल दागे गए, जाति? वर्ण? कुल? गोत्र? मैंने भी बता दिया कि तुम विजातीय हो, विजातीय ही नहीं, एक दलित परिवार से हो, उन्हें तो जैसे सांप सूंघ गया। उनकी आने वाली कई पीढ़ियों की मोक्ष प्राप्ति संकट में पड़ गई। ठाकुर परिवार का इतिहास, उसकी विरासत…उफ! इस परिवार में ऐसा पहली बार हुआ है कि उनके कुल के किसी लड़के ने अपनी जाति से बाहर की किसी लड़की से शादी करने की बात सोची है… एक विजातीय से, वह भी शूद्र!’

रणवीर को तुरंत बनारस बुला लिया गया था। वहां उनके साथ क्या हुआ, प्रतिभा नहीं जानती थी। उन्होंने वापस आकर प्रतिभा को बस इतना ही बताया था कि उनके चाचा और बड़े भाइयों का कहना है कि लड़की अगर बामन या बनिया होती तो सोच भी सकते थे, पर शूद्र! यह तो हो ही नहीं सकता, पर रणवीर अपने निर्णय पर अड़े रहे और प्रतिभा के साथ अपने विवाह की तारीख निश्चित कर, उन्होंने अपने घर सूचना भेज दी।

विवाह कानपुर में एक आर्य समाज मंदिर में कुछ मित्रों और प्रतिभा के रिश्तेदारों की उपस्थिति में संपन्न हुआ था। रणवीर के घर से कोई भी नहीं आया था, पर उस दिन जब वे मंदिर से निकल ही रहे थे कि रणवीर के पिता हृदयनाथ सिंह मंदिर पहुंच गए थे। प्रतिभा ने उन्हें पहली बार देखा था। उन्हें वहां देखकर उसका मन कई आशंकाओं से भर गया था, पर क्षण भर में ही उनके सरल व्यक्तित्व और वात्सल्य भरी मुस्कान ने उसकी सारी आशंकाओं को दूर कर दिया। रणवीर और प्रतिभा ने जब आगे बढ़कर उनका आशीर्वाद लिया तो उन्होंने दोनों को गले लगा लिया। वह बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में समाज शास्त्र के प्रोफेसर थे। रणवीर ने प्रतिभा को बताया था कि उसके परिवार में एक वही हैं, जिन्होंने बदलते समय में पुरानी मान्यताओं को तोड़कर नए मूल्यों को अंगीकार किया था, वर्ना उसके परिवार में बाकी सभी लोग आज भी सदियों पुराने खूंटे से बंधे, सड़ी-गली मान्यताओं की जुगाली कर रहे थे। उन्होंने उस दिन चलते हुए प्रतिभा और रणवीर से बस इतना ही कहा था, ‘बहुत कठिन राह चुनी है तुम दोनों ने, पर एक-दूसरे का साथ देने के अपने संकल्प को कभी डिगने मत देना। अभी मैं चलता हूं, तुम्हारी मां को समझाऊंगा। उनके मानते ही, मैं तुम्हें पत्र लिखूंगा। तुम दोनों घर आना।’ रणवीर के पिता हृदयनाथ सिंह से हुई इस छोटी-सी मुलाकात से प्रतिभा को अपनी शादी पूर्ण लगने लगी थी।

उसके बाद चार साल बीत गए, ना तो रणवीर के परिवार वाले माने और ना ही रणवीर के पिता का अपने बेटे और बहू को घर बुलाने के लिए कोई पत्र ही आया। हालांकि इस बीच जब उनके बेटे आशीष का जन्म हुआ तो प्रतिभा का रणवीर के परिवार वालों से मिलने का बहुत मन था। यह अपने बेटे को उसकी जड़ों से जोड़ने की एक नैसर्गिक इच्छा थी या कुछ और, वह नहीं जानती थी, पर उसने एक बार बनारस चलकर रणवीर से अपने भाइयों, चाचाओं और मां से मिलकर, उन्हें मनाने की बात की थी, जिस पर रणवीर ने यही कहा था, ‘वे नहीं समझेंगे, वे नहीं बदलेंगे। तुम उन लोगों का मनोविज्ञान नहीं समझतीं। वे हमारी तरह नहीं सोचते। हम कुछ भी कर लें, वे नहीं मानेंगे।’ उस समय प्रतिभा रणवीर की बात सुनकर चुप हो गई थी, पर वह उसके जवाब से संतुष्ट नहीं थी। इन वर्षों में प्रतिभा के मन में कई प्रश्न डूबते-उतराते रहे, परन्तु जब एक दिन अचानक ही रणवीर को उसके मित्र ने आकर सूचना दी कि उसके पिता का हृदय गति रुकने से देहांत हो गया है तथा यह सूचना उसे फोन पर उसके ही घर वालों ने दी है और यह भी कहा है कि यदि रणवीर चाहे तो अपने पिता के अंतिम संस्कार में शामिल हो सकता है, तब रणवीर के मना करने पर भी प्रतिभा ने उसके साथ जाने का निश्चय कर लिया था। उसके सामने रणवीर के पिता की मुस्कान तैर रही थी। उसे लग रहा था, मानो वे कह रहे हों कि तुम चिंता मत करना, मैं तुम्हें घर बुलाने के लिए पत्र ज़रूर लिखूंगा।

रणवीर के लाख समझाने पर भी प्रतिभा नहीं मानी। रणवीर और प्रतिभा अपने बेटे आशीष के साथ उसी रात में ही बनारस के लिए रवाना हो गए थे।

बनारस पहुंचने पर उन्हें पता चला कि पिता जी को अंतिम संस्कार के लिए गंगा किनारे घाट पर ले जाया जा चुका है, इसलिए उनके अंतिम दर्शन के लिए उन्हें सीधे घाट पर ही पहुंचना होगा। उन्होंने वैसा ही किया। वे सीधे घाट पर पहुंचे। उस घाट पर, जहां विशेष लोगों के दाह संस्कार की विशेष व्यवस्था थी। वहां पहले से ही कुछ चिताएं जल रही थीं। हवा में नमी होने के कारण लपटें कम और धुआं ज्यादा था। लोग लाख और देशी घी चिताओं पर डाल कर आग भड़का रहे थे। मंत्रों की गूंज और चिताओं की तपिश में वहां उपस्थित लोगों के चेहरे लाल हो गए थे। चिताओं से उठते धुएं के बादलों के बीच, पंडितों के मुंह से निकले मंत्र बिजली से तड़क रहे थे। रणवीर के पिता की चिता लगाई जा रही थी। उनका शव अर्थी समेत पृथ्वी पर रखा था। उनका चेहरा शांत और निर्लिप्त था, पर होंठ खुले हुए थे। आखिरी बार अपने इन होंठों से उन्होंने क्या कहा होगा? क्या उन्होंने रणवीर को याद किया होगा? यही सोचते हुए प्रतिभा ने रणवीर के साथ  उनके आगे हाथ जोड़े और अपनी आंखें बंद कर लीं। प्रतिभा को रणवीर के पिता से हुई अपनी पहली और आखिरी मुलाकात याद हो आई। उन्होंने स्वयं आगे बढ़कर उसे गले लगा लिया था।

रणवीर के बड़े भाई पिंडदान कर रहे थे। प्रतिभा को लग रहा था, जैसे उनके वहां पहुंचने पर मंत्रोच्चार और तेज़ हो गया था, पर इस सब की ओर ध्यान ना देते हुए वह एकटक रणवीर के पिता को ही देख रही थी। वह रणवीर की ही तरह लम्बी-चौड़ी कद-काठी के आदमी थे। अनायास ही प्रतिभा का ध्यान उनके लिए बनाई जा रही चिता पर गया। उसकी लम्बाई उनके कद से बहुत कम थी। उसे वह चिता बहुत छोटी लग रही थी। प्रतिभा के लिए यह सब बिल्कुल नया और अपरिचित था। वह दुख और कौतुहल से भरी थी। फिर भी उसका मन एक व्यर्थ जान पड़ते प्रश्न से उलझ रहा था। बार-बार उसे यही लग रहा था कि इतनी छोटी चिता पर इतने बड़े व्यक्ति के शव को कैसे लिटाया जा सकेगा? तभी पंडितों ने मंत्रोच्चार रोक दिया, रणवीर के बड़े भाई ने कुछ लोगों की सहायता से शव को चिता पर लिटा दिया। उनके पैर घुटनों से मुड़े हुए, चिता से बाहर लटक रहे थे। उनके शरीर को धीरे-धीरे लकड़ियों से ढका जाने लगा। चिता को अग्नि दे दी गई। पर पैर? वे अब भी बाहर लटक रहे थे।

प्रतिभा ने रणवीर से कुछ पूछना चाहा, पर उसके बहते आंसुओं को देखकर उसने खुद को ज़ब्त कर लिया।

चिता के आग पकड़ते ही, चिता से बाहर लटकते पैरों की त्वचा का रंग बदलने लगा। वे पहले पीले… फिर भूरे और धीरे-धीरे काले होने लगे। वही पैर जो जीवन भर पूरे शरीर का बोझ उठाते रहे, जो पूरे व्यक्तित्व को ज़मीन से ऊंचा किए रहे। वही पैर अपनी ही देह से तिरस्कृत, चिता से बाहर झूल रहे थे। झुलस रहे थे। चमड़ी के जलने की गंध चारों ओर फैलने लगी। घी के पड़ते ही चिता से लपटें उठने लगीं। तभी एक पैर घुटने से टूटकर ज़मीन पर खिसक गया। दूसरा भी टूटकर ज़मीन पर गिर पाता कि अंतिम क्रिया कर रहे रणवीर के भाई ने दो लम्बे बांसों की कैंची बनाकर पैरों को पकड़ा और एक-एक कर चिता में झोंक दिया। प्रतिभा के मुंह से चीख निकल गई। वह थर-थर कांप रही थी।

चिता के ऊपर पड़े दोनों पैर धूं-धूं करके जल रहे थे।

प्रतिभा की चीख सुनकर अंतिम संस्कार करा रहे पंडित ने बड़े ही कड़े स्वर में कहा, ‘पैर जीवन भर धरती पर चलते हैं। ये शरीर का बोझ उठाने के लिए बने हैं। आगे की यात्रा में पैरों की आवश्यकता नहीं होती! बोलते हुए उनकी आंखों में चिता की लपटें चमकने लगी थीं।

प्रतिभा की आंखों से गंगा छलछला रही थी। पंडित ने बादलों की तरह फिर गर्जना की, ‘एक व्यक्ति को अपने जीवन में कई प्रकार के कर्म करने होते हैं। वह अपने सिर से ब्राह्मïण का कर्म करता है, भुजाओं से क्षत्रियों का, उदर के लिए उसे वैश्य का कर्म करना पड़ता है। पर पैर, ये शूद्र हैं। इन्हें बाकी शरीर के साथ नहीं जलाया जा सकता। जब सिर, भुजाएं और उदर जल जाता है, जब आत्मा शरीर के मोह से मुक्त होकर अनंत यात्रा पर निकल जाती है, तब बिना स्पर्श किए लकड़ी की सहायता से पैरों को भी अग्नि में डाल दिया जाता है।’

रणवीर ने अपने बेटे को गोद में लेकर उसका मुंह दूसरी ओर फेरा और आंखें मूंद ली, फिर भी उसकी आंखों में पिता के पैर बार-बार कौंध रहे थे। उसने उन पैरों को आखिरी बार अपनी शादी के समय छुआ था, जीवन में कितने स$फर तय किए थे, इन्हीं पैरों के निशानों का पीछा करते हुए। रणवीर ने अपनी आस्तीन से आंसू पोंछते हुए प्रतिभा की ओर देखा। वह अभी भी रणवीर का हाथ पकड़े कांप रही थी, फिर भी उसने हिम्मत बटोरकर रणवीर के कान में फुसफुसाते हुए कहा, ‘पर मैंने तो ऐसा कहीं नहीं देखा।’

पंडित ने ऊंचे स्वर में आगे कहना शुरू किया, ‘बहुत से लोगों ने संसार में बहुत कुछ नहीं देखा, इसी कारण वे अज्ञान के अंधकार में अपना जीवन बिता रहे हैं। उन्हें नहीं पता वे अपना लोक ही नहीं, परलोक भी नष्ट कर रहे हैं।’ उन्होंने रणवीर की ओर देखते हुए कहा, ‘शूद्र की छाया भर पड़ने से वैतरणी पार करने में बाधा पड़ जाती है। भवसागर को पार करना कोई नदी-नाला पार करना नहीं है। उसे पार करने के लिए कोई पुल, कोई गाड़ी, कोई साधन नहीं है, सिवाय अपने धर्म पालन के, सारे कर्मकांड पूरे करने के और अंतिम संस्कार, यह तो वह संस्कार है, जिसमें रत्तीभर चूक से व्यक्ति की आत्मा युग-युगांतर तक प्रेतयोनि में भटकती रहती है। पूरे ब्रम्हांड में कोई उसे वैतरणी पार नहीं करा सकता। कोई उसे मोक्ष नहीं दिला सकता। यह इसी स्थान की महिमा है, जहां इतने विधि-विधान पूर्वक यह संस्कार संभव है।’

प्रतिभा की आंखों में गंगा जैसे ठहर गई थी। उसकी लहरों का कोलाहल शांत हो गया था। एक पल को उसे लगा, जैसे किसी ने उसके पैरों के नीचे की वह ज़मीन हिलाकर रख दी है, जिस पर उसका और रणवीर का रिश्ता खड़ा है। उसे लग रहा था, मानो उसने अपने पति और बेटे का जीवन स्वयं नष्ट कर दिया है, पर इससे अलग उसके भीतर कुछ और भी उबल रहा था, किसी विकराल ज्वालामुखी की तरह, जो एक सन्नाटे को तोड़ते हुए बह निकलना चाहता था। वह चीख-चीख कर कहना चाहती थी, ‘हां, मैं शूद्र हूं, शूद्र माने पैर…सभ्यताओं के पैर, जिनपर चलकर पहुंची हैं वे यहां तक। वह अपने हाथों से पानी उलीचकर धो डालना चाहती थी एक-एक घाट। वह पछीट-पछीट कर धोना चाहती थी संस्कृतियो और संस्कारों पर पड़ी धूल, पर वह जैसे जड़ हो गई थी।

घाट पर सदियों से जलती चिताओं की राख धीरे-धीरे आसमान से गिरकर सबके चेहरों पर बैठती जा रही थी। लोगों के मुंह काले हो रहे थे। प्रतिभा चारों ओर फैले काले धुएं और चमड़े की गंध के बीच, स्वर्ग में खुलने वाले किसी दरवाज़े को तलाश रही थी, पर उसकी आंखें उस धुंध में कोई रोशनी नहीं खोज पा रही थीं।

गंगा अब भी बही जा रही थी-निर्लिप्त-सी। किसी समारोह में प्रतिभा को अपना ही गाया हुआ, भूपेन हजारिका का वह गीत याद आ रहा था- ऐ गंगा तुम बहती हो क्यूं…? विस्तीर्ण दोनों पाट, …असंख्य मनुष्यों का हाहाकार सुनकर भी, बही जा रही हो। इतने अन्याय-अविचार पर तुम सूख क्यों नहीं जातीं?

प्रतिभा ने ज़ोर से सिर को झटका। सामने की सीट पर रणवीर और उसका बेटा आशीष दोनों ही गहरी नींद में थे। उसे रणवीर के पिता हृदयनाथ सिंह की मुस्कान बार-बार याद आ रही थी। उन्होंने उसे कितने स्नेह से गले लगा लिया था। उनकी मुस्कान में पूरा बनारस सिमट आया था, जिसे देखकर उसकी मुठ्ठियां ढीली पड़ गईं, उसके चेहरे की मांसपेशियों का तनाव कम होने लगा, आंखों की नमी धीरे से गालों पर उतर आई। वह हल्की ठंड का मौसम था और अपरान्ह की बेला चमकीली धूप में उसके सामने प्रतिपल फैलता हुआ परिदृश्य था। गतिमान, स्पष्ट और जीवंत, पर लगा जैसे सारा कुछ फेड आउट होता जा रहा है… दिख रहे हैं तो सिर्फ़ दो लटकते पांव।

…अचानक ही उसे लगा जैसे लटकते पांव खड़े हो रहे हैं। वे सचमुच ही खड़े हो गए। चलने लगे। वे ज्वालाओं के बीच से चले आ रहे हैं, उसकी ओर।  पांव से ऊपर न धड़ दिखाई पड़ रहा है, न मुंह। मानो वे थे ही नहीं। थे तो सिर्फ़ पांव ही थे।

वह चौकन्नी हो गई। उसके ससुर के पांव! पांव जो शूद्र हैं, जो वह है। 

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