Adhuri Maafi: “ तू अपनी अब पूरी जिंदगी इस अधूरी माफी के साथ ही गुजरेगा”- साहिल के कानो ने अपनी बड़ी बहन ममता के शब्द गूंजते जा रहे थे।
शीशे के आगे खड़ा वह बहुत महंगे गहरे नीले रंग के सूट के साथ मेहरून रंग की टाई लगा रहा था। पैरों में बहुत महंगे ब्रांडेड जूते पहने साहिल के दिमाग में बहुत कुछ चल रहा था। आज उसका बहुत बड़े स्तर पर इंटरव्यू था जहां हजारों लोग मौजूद होने थे और टीवी पर भी उसका लाइव शो आना था। उस इंटरव्यू के बारे में विचार करते-करते मन के साथ दिमाग पीछे जाने लगा था करीब 20 साल पीछे………..
मन और दिमाग की उधेड़बुन में उलझने ही लगा था कि दरवाजे की घंटी बजी। साहिल ने दरवाजा खोला तो उसका सहायक था। “ सर, आप को स्टेज पर बुला रहे हैं” सहायक बोला। 2 मिनट तक उसको देखा और ठंडी सांस लेकर साहिल बोला, “ हां आता हूं”। अपने ख्यालों की दुनिया से बाहर निकलकर होटल के कमरे से बाहर आया और चेहरे पर बनावटी मुस्कान लिए स्टेज पर पहुंचा। इंटरव्यू खत्म करके वह अपने कमरे में आ जाता है और बिना कपड़े बदले थके शरीर और मन से सोफे पर बैठ जाता है और फिर 20 साल पीछे चला जाता है, एक कॉलेज में…….
साहिल और उसके दो दोस्त- राजीव और अमित क्लास छोड़कर कैंटीन में मटरगश्ती कर रहे हैं। साहिल हमेशा की तरह पैसों की बड़ी बड़ी बातें कर रहा था। यूं तो उसके दोस्त भी तरक्की में विश्वास रखते थे लेकिन उसके लिए उन्हें साहिल की तरह हर तरीका मंजूर नहीं था।
साहिल ने कई बार कॉलेज में लड़कों को इम्तिहान से पहले फर्जी प्रश्न पत्र देखकर पैसे लिए तो कभी कार और मोटरसाइकिल की गैरकानूनी रेस का सट्टा लगाया। उसका बस एक ही लक्ष्य था, किसी भी तरीके से ज्यादा से ज्यादा पैसा उसके पास आ जाएं।
घर में पता चलने पर साहिल को अक्सर मां-बाप की कड़ी फटकार झेलनी पड़ती थी। दीदी ने भी कई बार प्यार से समझाया के अमीर बनने का उसका रास्ता गलत है, लेकिन साहिल के कानों पर तो जैसे जूं तक नहीं रेंगती।
एक दिन साहिल को कहीं से पता चला ही मेहता कंपनी( हिंदुस्तान की बड़ी कंपनियों में से एक) ने एक अजीब सा प्रस्ताव निकाला है—’ उनकी एक डूबते हुए उत्पाद को अगर कोई अपनी समझदारी से मुनाफे में बदल दे तो वह उस इंसान को अपनी कंपनी का ‘मार्केटिंग हेड’ बना देंगे। यह पढ़कर साहिल ने मिस्टर अमन मेहता से मिलने के लिए अपना नाम लिखवा दिया।
जब वह मिलने गया तो और भी कई लोग वहां बैठे थे। साहिल का नाम आने पर वह मिस्टर मेहता से मिला। अपने चालाक दिमाग से उसने मिस्टर मेहता को अपना आईडिया दिया। मिस्टर मेहता को साहिल की बात पसंद आई। साहील का तेज दिमाग से 6 महीने में उसने कंपनी को उम्मीद से ज्यादा फायदा कराया।
मिस्टर मेहता ने बहुत खुश होकर साहिल को मार्केटिंग हेड बना दिया; पर साहिल वहां डिपार्टमेंट हेड नहीं कंपनी का मालिक बनने आया था।
उसने धीरे-धीरे मेहता जी के दिलो-दिमाग पर काबू करना शुरू करा और बहुत ही जल्दी ऊंचाइयां चढ़ने लगा। ऑफिस तो क्या घर में भी सब को उसकी चलाकी समझ आ रही थी पर मिस्टर मेहता पर ना जाने उसने क्या जादू कर रखा था।
उसकी लालच की हद पार हुई जब साहिल ने चालाकी से खास कागजों पर मिस्टर मेहता के सिग्नेचर ले लिए। उनमें साफ-साफ लिखा था कि मिस्टर मेहता ने अपनी सारी पोजीशन और पैसा साहिल के नाम कर दिया है लेकिन अपने विश्वास के चलते उन्होंने कागजों को पढ़ने की जरूरत नहीं समझी थी। साहिल मेहता जी की दिल की बीमारी को भी अच्छी तरह जानता था।
यह बात किसी तरीके से साहिल के पिता की नजर में आ गई, उन्होंने उसको साफ साफ धमका दिया, “ या तो तू यह मिस्टर मेहता के सिग्नेचर करे हुए कागज जला दे नहीं तो आज से मैं तेरे लिए मर गया यह समझ ले”। पैसे और रुतबे का नशा इतना था कि साहिल जैसे कानों से ही नहीं दिमाग से भी बेहरा हो गया था। उसने अपने पिता को कुछ जवाब नहीं दिया और घर छोड़कर चला गया।
साहिल ने जब मिस्टर मेहता को कागज दिखाएं तो उनको बहुत गहरा सदमा लगा और अपनी बीमारी के चलते उन्हें बहुत बड़ा दिल का दौरा पड़ा जिससे उनका निधन हो गया। मिस्टर मेहता के आगे पीछे कोई नहीं था इसलिए साहिल के लिए दुनिया वालों को बेवकूफ बनाना बहुत ही आसान था ।
बस, जो चाहता था उसे वही मिल गया। जिंदगी का पूरा ऐसो आराम काटने लगा, अपने घर वालों को तो वह कब का भुला चुका था। पिता की मौत की खबर भी उसके करोड़ों की बिजनेस के आगे बेमानी थी वह उनके अंतिम दर्शन और संस्कार के लिए भी नहीं गया। मां और दीदी को इतना धक्का लगा की बाद में दीदी की शादी की भी उन्होंने साहिल को कोई खबर नहीं की।
साहिल को कहीं से पता चला लेकिन अपने घमंड में उसे कोई फर्क नहीं पड़ा और उसने मां या दीदी को फोन भी नहीं करा।
कहते हैं पैसा हर सुख सामान दे सकता है लेकिन सुकून और अपनों का सच्चा प्यार नहीं।
रोज वही बड़े लोग, बड़ी बिजनेस डील और बड़ी-बड़ी बातें, साहिल के पास अलग कहने को कुछ भी नहीं था। उसका अपना कोई नहीं था, शादी को भी उसने एक बंधन समझा था; आज वह पूरी तरीके से बिल्कुल अकेला था।
धीरे-धीरे अकेलापन उसको खाने लगा था। बाहर वाला कोई उसको अपना नहीं समझता था और जो अपने थे उनको वह कब का पीछे छोड़ चुका था।
आज सुबह उसने बहुत बेचैन होकर अपने घर फोन किया था मां से बात करने के लिए। दीदी ने फोन उठाया और बहुत रूखे लहजे में उसे बताया कि मां का तो 2 दिन पहले ही स्वर्गवास हो गया था। यह सुनकर वह भौचक्का रह गया था, एक मौका था माफी मांगने का वह भी हमेशा के लिए चला गया। दीदी के आखिरी शब्द( उसको अधूरी माफी के साथ जीना पड़ेगा) सुनकर उसने फोन रख दिया था।
जब अपनी सोच से बाहर आया तो वह सोफे से उठा और उसने दीदी को फिर से फोन मिलाया माफी मांगने के लिए। दीदी ने फोन उठाया और बस इतना कहा, “ जिनकी माफी तुझे मिलनी चाहिए थी वह तो कब के चले गए और रही बात मेरी, मेरे लिए तो तू मेरा छोटा सा गुड्डू भैया ही रहेगा। मिस्टर साहिल को मैं नहीं जानती। जब भी गुड्डू का मन मुझसे मिलने को करें वह कभी भी आ सकता है, साहिल नहीं।
दीदी की बात सुनकर वह समझ गया कि उसे अब उनकी भी अधूरी माफी के साथ ही जीना पड़ेगा क्योंकि गुड्डू को तो साहिल– एक बड़ा उद्योगपति, कब का मार चुका था। मन में बस यही ख्याल आ रहा था……….
बहुत रफ्तार में दौड़ता चला आया हूं
पीछे कई गलतियां छोड़ आया हूं
सूखी आंखें काली रातें
रोते दिलों में कई अरमान तोड़ आया हूं
पीछे कई गलतियां छोड़ आया हूं
अपनो के सपने तोड़े
बनते रिश्ते छोड़ें
प्यार भरे दिलों को कुचल आया हूं
पीछे कई गलतियां छोड़ आया हूं
रूह को रंग सुनहरा छोड़
काला भाने लगा
चेहरे पर रोज नया मुखौटा लगाने लगा
आईने के पीछे मासूम चेहरा भूल आया हूं
नहीं कोई माफी मुझे उनकी
पीछे जो गलतियां छोड़ आया हूं।।
