Hindi Poem: बंधन मुझे भला लगता है स्वतंत्रता की चाह नहीं साथ चलूं या थोड़ा पीछे ,इसकी अब परवाह नहीं ।भीड़ भरी सड़कों पर जब ,तुम मेरा हाथ पकड़ते हो मुझे बचाने को सबसे, जब मेरे साथ अकड़ते हो मुझ पर पड़ने देते हो तुम ,कोई गलत निगाह नहीं।साथ चलूं या थोड़ा पीछे ,इसकी अब […]
Category: कविता-शायरी
मैं और तुम पति-पत्नी थे—गृहलक्ष्मी की कविता
Hindi Poem: तुम और मैं पति पत्नी थे, तुम माँ बन गईं मैं पिता रह गया। तुमने घर सम्भाला, मैंने कमाई, लेकिन तुम “माँ के हाथ का खाना” बन गई, मैं कमाने वाला पिता रह गया। बच्चों को चोट लगी और तुमने गले लगाया, मैंने समझाया, तुम ममतामयी बन गई मैं पिता रह गया। बच्चों […]
हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं-गृहलक्ष्मी की कविता
Hindi Poem: मैं हिन्दुस्तान की बेटी,मेरी पहचान है हिन्दी।मुझे प्यारी है हर भाषा,मगर अभिमान है हिन्दी। निहित करुणा है माँ जैसी,पिता सा प्यार है जिसमें।प्रकट भावों को जो करती है,वो आधार है हिन्दी। ये संस्कृत की दुलारी है,जुबाँ सबसे ये न्यारी है।सहज, मीठी,मनोरम सी,मगर फिर भी बेचारी है। कहीं गुम सी हुई है आजकल,जाने क्यों […]
स्त्री पुरुष से सीखती है-गृहलक्ष्मी की कविता
Hindi Poem: स्त्री जो भी सीखती हैवह काम आती है किसी पुरुष के!स्त्री सीखती हैआटा गूंथनापुरुष का पेट भरता हैस्त्री सीखती हैघर बुहारनापुरुष घर में रहता हैस्त्री सीखती हैबिंदी लगानापुरुष प्रेम करता हैस्त्री सीखती हैबच्चे पालनापुरुष पिता बनता हैबस किसी दिन स्त्री ने सीखना चाहाघर से बाहर निकलनापुरुष ने देहरी बनाईऔर कहाबाहर रावण रहता हैऔर […]
बागबान की झुकी कमर-गृहलक्ष्मी की कविता
Hindi Poem: बागबान की झुकी कमर,अब बोझ नहीं उठा पाती।चेहरे की चमक अब, झुर्री से ढक जाती। जो हाथ पहले सारे घर का काम कर देते थे, वह कांपते हाथ अब थाली भी ठीक से पकड़ नहीं पाते।धूप की चटकीली किरणें अब इन आंखों को चुभती है, फिर भी बागबान की आंखें रोज सुबह समय से जाग जाती हैं। पैरों […]
” शब्द कहाँ से लाऊँ ?”-गृहलक्ष्मी की कविता
Hindi Poem: लिखूँ क्या पिताजी के बारे में?शब्द नहीं हैं मेरे पास।जब भी कोशिश करती हूँ कुछ लिखने कीआँख मेरी भर आती है।कोशिश करती हूँ कुछ सोचने की,ठीक से सोच मैं पाती नहीं हूँ।लिखूँ क्या पिताजी के बारे में?शब्द नहीं हैं मेरे पास। पिता की तस्वीर दिल में समां जाती है,रह रहकर उनकी याद दिलाती […]
मोबाइल-गृहलक्ष्मी की कविता
Short Hindi Poem: अब दिन भर मोबाइल में उलझी रहती हूँ,इन्स्टा और फेसबुक पर ही बिज़ी रहती हूँ।मुलाकात नहीं होती किसी से फिर भीस्टेटस पर हर दम ही दिखती रहती हूँ। किचन में भी अब कहाँ मन लगता है,दाल,चावल भी बड़ी मुश्किल से पकता है।कोमेन्टस तो कभी लाइक गिनती रहती हूँ,अब दिन भर मोबाइल में […]
रिश्ते-गृहलक्ष्मी की कविता
Hindi Short Poem:रिश्ते सिमट रहेबंद कमरों के जालो सेफासले बढ़ रहेशीत की ओस सेअब फुरसत कहां कहीं कोई अपना हैले लिया रिश्ता सब मोबाइल के नेटवर्क नेदिन कट जाता कामों मेंरात फ़िर सुबह के उलझन मेंबच्चे बड़े होकर व्यवस्थित हो गये कमरों मेंअब इतनी फुरसत कहाँ जो पूछे हाल दिन भर केकाम का टेन्शन ले […]
स्मार्ट सिटी- गृहलक्ष्मी की कविता
Hindi Poem: बन रही स्मार्ट सिटी तोप रही दिखती मिट्टी क्या होगा प्रतिफल इसका कौन करे इस पर ड्यूटी गाँव बने स्मार्ट अगर पक्का होना है बेहतर पर जहाँ पर पत्थर ईंट पत्थर लगना कैसे बेहतर दुर्दशा है जीव जंतु की कल मानव तेरी होगी कोरोना के काल से भी सीख तूने न ली होगी […]
जल संकट-गृहलक्ष्मी की कविता
Hindi Short Poem: जल संकट है बड़ी समस्या,सूख रही झीले और नदियाँ,जनसंख्या भी बढ रही,जल की मांग बढ़ रही ।जल जीवन है जल आधार,जल बिन जग है निराधार,चौमासे में बरखा आती ,भर भर कर पानी लाती ,सभी मगन हो जाते है,कढी पकौडे खाते है।बारिश का पानी बह जाता,कोई उसे संग्रह न करता ,पोखर, कुएँ सूखते […]
