दीप-गृहलक्ष्मी की कविता
Deep

Hindi Poem: स्नेह भरा मैं दीप अकेला
बन प्रकाश – पुंज चमकूँगा ,
असत – अँधेरा मेटूँ जग से
सूरज सा मैं भी दमकूँगा ।

अन्तर्मन में उजियारा दे
कुण्ठाओं को दूर करूँगा ,
धरती पर फैले तम को
निज प्रकाश से स्वयं हरूँगा ।

ज्योतिर्मय मन को रख करके
तन में तिमिर न आने दूँगा ,
स्नेह भरा मैं दीप अकेला
बन प्रकाश – पुंज चमकूँगा ।

मन में मेरे ज्योति भरी है
उसे सदा जलने दूँगा ,
झंझावातों तूफानों में
भी , लौ न बुझने दूँगा ।

दिल – दीया न टूटने पाए
नेह भरा घी , न , घटने दूँगा ,
स्नेह भरा मैं दीप अकेला
बन प्रकाश – पुंज चमकूँगा ।

सूनामी या आँधी में भी
साहस को न झुकने दूँगा ,
कर्तव्य मार्ग पर अपने पग को
कभी भी न रुकने दूँगा ।

“भावुक” अपने प्रखर – तेज को
मैं निश – दिन ही बढ़ने दूँगा ,
स्नेह भरा मैं दीप अकेला
बन प्रकाश – पुंज चमकूँगा ।

असत – अँधेरा मेटूँ जग से
सूरज सा मैं भी दमकूँगा ।

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