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हमारे धर्म में बहुत सी मान्यताएं-परंपराएं तथा विधि-विधान शामिल हैं एक ऐसी ही परंपरा है कार्तिक मास में दीपदान की जो न केवल धार्मिक बल्कि वैज्ञानिक दृष्टिïकोण से भी हमारे लिए महत्त्वपूर्ण है।

यज्ञ-अग्नि से जन्मे दीप को सभी ज्योतिपूंजों में श्रेष्ठ माना जाता है। अंधकार को भेद कर मानव मात्र के हृदय में नवचेतना का प्रकाश भरने वाला दीप, लोककल्याण के लिए आत्म-बलिदान से भी पीछे नहीं रहता। भारतीय सभ्यता व संस्कृति का दीप से गहरा नाता है। एक नन्हा सा दीप सारी निराशा व अंधकार के बीच भी आशा का प्रकाश बिंदु जगमगाना चाहता है।
पुराणों के अनुसार कार्तिक मास में दीपदान की बड़ी महिमा मानी जाती है। इस माह में संध्या समय गौशाला, घाट, मंदिर, घर, नदी, तट, सड़क किनारे व अंधकार से भरे रास्तों पर दीप जलाने वाला व्यक्ति नरक के भय से मुक्त हो जाता है।

कार्तिक मास को दीपों का उत्सव कहा जाए तो अनुचित नहीं होगा। पूरा मास जब हर स्थान पर नन्हे-जगमगाते दीप दिखाई देते हैं तो दीपमालिका पर्व के आने का संकेत मिल जाता है। आश्विन पूर्णिमा से कार्तिक पूर्णिमा तक पूरा माह प्रात: व संध्याकाल में दीप दान किया जाता है किंतु कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी, चतुर्थी व अमावस्या को विशेष रूप से दीपदान का विधान है।

कार्तिक मास की त्रयोदशी को धनतेरस मनाई जाती है। इस दिन अकाल मृत्यु से रक्षा के लिए यम को दीपदान दिया जाता है व नैवेध समर्पित करते हैं। एक पौराणिक प्रसंग के अनुसार यमराज ने स्वयं अपने दूतों को यह उपाय बताया था। तब से आज तक इस दिन घर से बाहर दक्षिण की ओर तिल का दीया जलाकर यम को दीपदान देने का विधान चला आ रहा है।

कार्तिक कृष्णा चतुर्दशी को भगवान कृष्ण ने पृथ्वी को नरकासुर के अत्याचारों से मुक्ति दिलाई थी। मृत्यु के पश्चात् नरक में न जाना पड़े अत: यमराज के सेवक श्वानों के लिए चतुर्दशी को दीपदान होता है। दीपावली तो है ही ‘दीपों की आवलि’ अर्थात् दीपों की झिलमिलाती पंक्तियां। दीपावली कार्तिक मास की अमावस्या को मनाई जाती है। उस दिन नन्हा सा दीपक मानो यही प्रेरणा देता है-

जलते दीपक के प्रकाश में
अपना जीवन-तम मिटा दें
उसकी उज्जल किरणों से
मन में पावन ज्योति जगा दें


दीप-पुंज से निकलने वाला प्रकाश संक्रामक रोगों के कीटाणुओं को तो नष्ट करता ही है, साथ ही तेल का सुस्निग्ध धूआं हर तरह व्याप्त हो कर नस्य-प्रणाली के द्वारा मस्तिष्क को आप्यायित कर देता है। माना जाता है कि इन तीन दिनों में लक्ष्मी स्वयं तेल के दीपक में विराजती हैं।

कार्तिक मास में ‘आकाशदीप के दान’ का भी विधान है। जिसे हम बोलचाल की भाषा में ‘कण्डील’ कहते हैं। पहले-पहल लंबे बांस के डंडे के सिरे पर दीप लटका कर आकाशदीप बनाया जाता था जो घने अंधकार में पथिकों को राह दिखाता था। इस प्रकार इन आकाशदीपों के दान का बड़ा पुण्यफल माना जाता था।

हमारी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसे पितरों का मार्ग प्रशस्त करने का साधन माना जाता रहा है। पुराणों का कहना है कि आकाशदीप दान करने वाला परलोक में मोक्ष पाता है वह इस लोक में भी अभूत संपदा का भागी होता है।
विधुतचालित उपकरणों व यंत्रों ने पारंपरिक आकाशदीप को अप्रचलित कर दिया है। संभवत: दीवाली जगमाती रोशनियों की कतारें व आधुनिक बनावट के कण्डील इसी भावना का पोषक करते हैं।

कार्तिक मास के जलते दीपक नियमित रूप से समय पर उठकर दीपदान देने की परंपरा को जीवित रखते हैं। इस माह में दीपदान का शास्त्रीय विधान संभवत: इसलिए बना कि वर्षा ऋतु से उत्पन्न सार्वजनिक स्थानों पर व्याप्त होने वाले विषैले जीव-जंतुओं का समूल नाश हो सके।
प्रकाश ज्ञान का ही दूसरा रूप है। अंधकार से भटकते मानव समाज को प्रकाश दान कर सन्मार्ग पर लाने की चिरंतन भानवा का प्रतिरूप है दीप।

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