googlenews
bhootnath-novel-by-devkinandan-khatri-2
bhootnath by devkinandan khatri

दयाराम की खोज निकालने की धुन से तीन आदमी अपने-अपने स्थान से बाहर निकले। निरंजनी को दारोगा साहब से नागर की बदौलत कुछ घनिष्ठ संबंध था और नागर निरंजनी को बहुत प्यार करती थी अस्तु निरंजनी पहिले नागर ही के घर की तरफ रवाना हुई। भूतनाथ यद्यपि दारोगा से कुछ लड़ गया था परन्तु उसे इतना जरूर विश्वास था कि यदि मैं दारोगा के घर उसका दोस्त बनकर जाऊँगा तो वह मेरी खुशामद करने के लिए तैयार मिलेगा और चाहेगा कि मुझे किसी तरह अपना दोस्त बनावें, इसलिए वह दारोगा से मिलने के लिए अपनी असली सूरत में जमानिया की तरफ रवाना हुआ। इन्द्रदेव से दारोगा नि:सन्देह डरता था और यह बात इन्द्रदेव को मालूम थीं परन्तु इन्द्रदेव को विश्वास था कि यदि मैं दयाराम के विषय में दारोगा से कुछ कहूँगा तो वह जरूर अनजान बन कर इनकार कर जाएगा और कहेगा कि उनके बारे में मैं कुछ नहीं जानता, इस खयाल से इन्द्रदेव ने दारोगा को अपने घर ही बुला कर कुछ कार्रवाई करना मुनासिब समझा और अपने एक सवार को चिट्ठी देकर दारोगा के पास रवाना किया जिसमें यह मजमून लिखा हुआ था-

“मेरे परम प्रिय गुरुभाई,

पत्र देखते ही हजार काम छोड़ कर मेरे पास चले आइए। मैं खुद आपसे मिलने के लिए आता परन्तु अपने स्वास्थ्य के बिगड़ जाने से बिलकुल लाचार हो रहा हूँ, नहीं तो आपको कष्ट न देता। यदि किसी कार्यवश महाराज भी आपको रोकें तो उनसे मेरी तरफ से क्षमा-प्रार्थना करना परन्तु आने में विलंब न करना।

आपका-इन्द्रदेव।”

इस पत्र को लेकर सवार तेजी के साथ जमानिया की तरफ रवाना हुआ और इन्द्रदेव दारोगा के आने का इंतजार करने लगे।

तीसरे दिन संध्या के समय दारोगा साहब इन्द्रदेव के घर पहुँचे और उन्होंने बड़ी खातिर से दारोगा को अपने कैलाश-भवन के एक सुन्दर कमरे से उतारा जो उस मकान या खंड से बिलकुल ही निराले में पड़ता था जिसमें इन्द्रदेव की गृहस्थी और जमना, सरस्वती तथा इन्दुमति वगैरह रहती थी।

खातिरदारी से छुट्टी पाने के बाद जब दोनों आदमी निश्चिन्ती से एकांत में बैठे तो इन्द्रदेव और दारोगा में इस तरह बातचीत होने लगी-

दारोगा : कहो क्या मामला है जो तुमने इस तरह यकायक जल्दी के साथ मुझे बुला भेजा? तुम्हारी चिट्ठी पाकर तो मैं बहुत ही घबड़ा गया था फिर भी ईश्वर को धन्यवाद है कि यहाँ आकर तुम्हें तन्दुरुस्त पाता हूँ।

इन्द्रदेव : नहीं, मैं तन्दुरुस्त नहीं हूँ। यद्यपि उस दिन की बनिस्बत जिस दिन मैंने आपको चिट्ठी लिखी थी आज कुछ अच्छा दिखाई देता हूँ और मुझमें चलने-फिरने तथा घोड़े पर चढ़ने की भी हिम्मत हो गई है परन्तु फिर भी मैं अपने को तन्दुरुस्त नहीं मानता और वैद्य की बात पर विश्वास करता हूँ जिसने मुझे संकोच छोड़ कर यह कह दिया है कि इन्द्रदेव, अगर तुम पन्द्रह दिन तक जीते बच गए तो फिर तुम्हें इस बीमारी से किसी तरह का डर न रहेगा।’

दारोगा : (आश्चर्य और दु:ख के साथ) हैं ऐसी बात है! आखिर तुम्हें बीमारी क्या है सो भी तो कुछ मालूम हो!

इन्द्रदेव : मुझे एक अजीब तरह की बीमारी हो गई है! मेरे पैरों में सख्त दर्द रहता है। कभी-कभी वह दर्द आठ-आठ दस-दस घंटे तक बंद रहता है और जब यकायक उभरता है तो अधमुआ करके छोड़ देता है। इसी तरह दिन में दो-तीन मरतबे कलेजे में दर्द होता है और उस समय तो मैं अपने जीवन से बिलकुल ही निराश हो जाता हूँ। खाना-पीना बिलकुल ही नष्टप्राय: हो रहा है, केवल मूंग की दाल खाने की आज्ञा वैद्यजी दे गए हैं!

दारोगा : बड़े दु:ख की बात सुना रहे हो!

इन्द्रदेव : आप जानते हैं कि मेरा कोई लड़का नहीं है और मैं एक भरी तिलिस्मी का दारोगा हूँ।

दारोगा : हाँ यह तो मैं बखूबी जाता हूँ।

इन्द्रदेव : यद्यपि मेरे घर लड़का होने की उम्मीद है सही परन्तु नहीं कह सकता कि लड़का होगा या लड़की अथवा दोनों की उम्मीद जाती रहेगी।

दारोगा : परमात्मा न करे ऐसा हो!

इन्द्रदेव : भविष्य के गर्भ में क्या है सो कोई नहीं जानता।

दारोगा : बेशक् ऐसा ही है।

इन्द्रदेव : अतएव मैं चाहता हूँ कि आपको तिलिस्म में ले चलकर वहाँ के कुछ भेद समझाने के साथ-ही-साथ एक वसीयतनामा और तिलिस्म की तालियों का गुच्छा आपके हवाले कर दूं। ईश्वर की कृपा से यदि अच्छा रहा तो पन्द्रह-बीस दिन बाद तालियों का गुच्छा वापस ले लूँगा नहीं तो उस वसीयतनामे के पढ़ने से आपको तिलिस्म का सब हाल मालूम हो जाएगा, तथा और भी जो कुछ मैंने उस वसीयतनामे में लिख रखा है उसे आप बखूबी पूरा करेंगे, ऐसी आज्ञा केवल आप ही से रख सकता हूँ।

इन्द्रदेव की बीमारी का हाल सुन कर दारोगा साहब को दु:ख हुआ सही परन्तु इन्द्रदेव जिस तिलिस्म का दारोगा है वहाँ का भेद मालूम हो जाएगा और वहाँ की तालियाँ भी मिल जाएँगी इस आशा से वह दिल में बहुत ही खुश भी हुआ मगर इस खुशी को अपने चेहरे से जाहिर न होने दिया।

सराहना तो इन्द्रदेव की करनी चाहिए कि इतनी दुष्टता देखकर भी उससे जाहिरदारी तोड़ने का विचार नहीं करता। यद्यपि वह दारोगा को चार दिन के लिये कैद करके अपना काम निकालना चाहता है मगर दारोगा को दु:ख देना अथवा उससे जबर्दस्ती करना नहीं चाहती और न यही चाहता है कि दारोगा को उसके ऊपर किसी तरह का शक हो।

दारोगा ने दिल की प्रसन्नता के भाव को छिपाया और जाहिर में अपने चेहरे को रंजीदा बना कर इन्द्रदेव से कहा-

दारोगा : इन्द्रदेव, तुम्हारी इन बातों को सुन कर मेरा दिल डूबा जाता है। जो कुछ तुम कहोगे उसे मैं करूँगा जरूर परन्तु इन दु:खमय बातों को सुन कर मेरे कलेजे में चोट लगती है। इस दुनिया में मरा मददगार सिवाय तुम्हारे और कोई भी नहीं है इसलिए तुम्हारी बात अगर सच निकली तो तुम्हारे बाद मेरी क्या दशा होगी यह तो जरा सोचो।

इन्द्रदेव : ईश्वर सब अच्छा ही करेगा। दुनिया में किसी के बिना किसी का काम अटका नहीं रहता है। अब भोजन करके आराम कीजिए, कल प्रात:काल आपको साथ लेकर मैं तिलिस्म की तरफ रवाना हो जाऊँगा।

दारोगा : तुम्हारी बातों ने मेरी भूख-प्यास बिलकुल नष्ट कर दी है, अब मैं भोजन न करूँगा।

इन्द्रदेव : नहीं-नहीं ऐसा नहीं हो सकता।

इन्द्रदेव ने दारोगा के लिए भोजन इत्यादि का सामान ठीक कराया, दारोगा के साथ-ही-साथ इन्द्रदेव ने भी कुछ भोजन किया और तब दोनों आराम करने के लिए अलग-अलग कमरे में चले गये।

दूसरे दिन सुबह कोई दो घड़ी रात रहते इन्द्रदेव उठे और उन्होंने दारोगा साहब को नींद से होशियार किया। घंटे-भर के अन्दर ही दोनों आदमी जरूरी कामों से निपट सफर करने के लिए तैयार हो गये। हुक्म के मुताबिक दो घोड़े तैयार करके हाजिर किए गये जिन पर सवार होकर दारोगा तथा इन्द्रदेव घर से बाहर निकले तथा उत्तर की तरफ रवाना हुए।

दोपहर दिन चढ़े तक ये दोनों आदमी मामूली चाल पर बराबर चले गये। इसके बाद इनको पहाड़ की तराई मिली और सुन्दर तथा साफ जल से भरा हुआ एक कुदरती तालाब भी नजर आया। इन्द्रदेव ने दारोगा से कहा कि अब यहाँ पर उतर का स्नान और कुछ भोजन कर लेना चाहिए। रात को मैंने अपने एक शागिर्द को आज्ञा दे दी थी कि वह यहाँ पर कुछ भोजन की सामग्री तैयार रखे, संभव है कि वह यहाँ आ चुका हो अथवा आता ही हो।

यद्यपि दारोगा वहाँ ठहरा नहीं चाहता था और तिलिस्म के अन्दर शीघ्र पहुँचने के लिए उसका जी बेचैन हो रहा था तथापि इन्द्रदेव की इच्छानुसार उसे रुकना ही पड़ा। दोनों आदमी उस तालाब के पास चले गये और एक सायेदार पड़े के नीचे पहुँच घोड़े पर से उतर पड़े। दोनों ने अपने-अपने घोड़े (कुछ टहलाने और शान्त करने के बाद) पेड़ से बाँध दिए और जरूरी कामों से निपटने की फिक्र करने लगे।

थोड़ी देर में सब कामों से निश्चिन्त होकर दोनों आदमी पुन: वहाँ पहुँचे जहाँ उनके घोड़े पेड़ से बँधे हुए थे और जीनपोश बिछाकर बैठ गए। उसी समय एक आदमी सर पर एक छोटी-सी दौरी रखे उनकी तरफ आता हुआ दिखाई दिया। इन्द्रदेव ने दारोगा से कहा, “लीजिए जलपान का सामान भी आ पहुँचा।”

उस आदमी ने पास पहुँचकर जलपान की दौरी उनके सामने रख दी और पानी का बंदोबस्त करके पेड़ की आड़ में चला गया तथा ये दोनों भोजन करने लगे। इन्द्रदेव ने बीमारी का पाखंड रच ही रखा था इसलिए केवल एक-दो फल खाकर रह गए, मगर दारोगा ने तरह-तरह की चीजों पर खूब ही हाथ फेरा।

जलपान से छुट्टी पाकर जब दोनों आदमी निश्चिन्त हुए तब उनमें इस तरह बातचीत होने लगी-

इन्द्रदेव : बीमारी ने मेदा ऐसा कमजोर कर दिया है कि एक-दो फल खाना भी भारी हो रहा है, छाती में बोझ-सा हो गया और सर घूमने लगा।

दारोगा : अफसोस, तुम्हारी तन्दुरुस्ती बहुत खराब हो गई है।

इन्द्रदेव : (लेट कर) बैठना मुश्किल हो गया, सर का चक्कर बढ़ता जाता है।

दारोगा : सर तो मेरा भी घूम रहा है। (कुछ ठहरकर) ऐसा मालूम होता है कि खाने की चीजों में बेहोशी की दवा मिली हुई थी।

इन्द्रदेव : मुझे भी ऐसा ही शक होता है। किसी ऐयार ने मेरे आदमी को धोखा तो नहीं दिया? उस आदमी की जाँच करनी चाहिए जो खाने का सामान लाया है।

इतना कहकर इन्द्रदेव उठ बैठे और ‘रामा-रामा’ कह उस आदमी को पुकारने लगे। वह पास ही पेड़ की आड़ में था, पुकारने से सामने आकर खड़ा हो गया और बोला, “आपका रामा मेरी बदौलत जहन्नुम की सैर कर रहा है। मैं तुम्हारे दुश्मन का ऐयार हूँ और अब तुम दोनों को गिरफ्तार करके अपने मालिक के पास ले जाऊँगा।”

इतना कहकर वह कुछ दूर पीछे हट गया। उसकी बात सुन दारोगा के तो होश उड़ गए, उधर इन्द्रदेव ने जान-बूझ कर जमीन पर लेट के आँखें बंद कर लीं। दारोगा ने समझा कि वह बेहोश हो गए, क्रोध में आकर उठ खड़ा हुआ और तलवार बैंच कर उस ऐयार की तरफ बढ़ा मगर कुछ कर न सका, थोड़ी ही दूर जाकर जमीन पर गिर पड़ा और बेहोश हो गया। दारोगा के बेहोश देखकर वह आदमी इन्द्रदेव के पास आया और धीरे से बोला “उठिए, दारोगा साहब बेहोश हो गए।”

इन्द्रदेव उठ खड़े हुए ओर अपने शागिर्द से बोले, “अब इन्हें हमारे मकान में ले जाकर कैद करो। जहाँ मैं तुम्हें बता चुका हूँ उस जगह पर इन्हें रखना और खाने-पीने का खयाल रखना। इनको यह न मालूम होने पावे कि कहाँ पर और किसके यहाँ कैद है। इन्हें मैं घोड़े पर लाद देता हूँ, तुम भी उसी पर सवार हो जाओ, जंगल की राह से धीरे-धीरे जाओ जिसमें रात्रि के समय घर पहुँचो। मैं किसी काम के लिए तिलिस्म में जाता हूँ।”

शागिर्द के साथ मिलकर इन्द्रदेव ने दारोगा को घोड़े पर लादा और शागिर्द को भी उसी पर चढ़ाकर घर की तरफ रवाना करने के बाद स्वयं उसी तरफ को चल पड़े जिधर जा रहे थे।

Leave a comment