जौनी ने अपने चेहरे पर ठंडे पानी का स्पर्श महसूस किया।
पानी की कुछ बूंदें रिसकर उसके मुंह में भी चली गई थीं। उसे उसने ऊपर झुकी किसी छाया का अहसास हुआ। उसने डरते-डरते आंखें खोलीं और अपनी दृष्टि छाया की ओर केन्द्रित करने का प्रयास किया। कुछ ही क्षण बाद उसे एक दुबला-पतला दाढ़ी वाला आदमी स्पष्ट दिखाई देने लगा। उसके शरीर पर खाकी ड्रिल थी तथा सिर पर उसने बुश हैट पहना हुआ था। उसकी नाक उभरी हुई थी और उसकी आंखें एकदम नीले रंग की थीं।
दौलत आई मौत लाई नॉवेल भाग एक से बढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- भाग-1
‘घबराओ मत।’ अजनबी के मुंह से आवाज निकली – ‘मुझे अपना दोस्त ही समझो।’
जौनी ने उठने की कोशिश की और वह सफल भी हुआ किन्तु अगले ही क्षण दर्द की तेज लहर से उसे अपना सिर फटता-सा प्रतीत हुआ। टखने में उठी तेज पीड़ा से वह कराह उठा।
‘मेरा टखना टूट गया है।’ वह कराहते हुए बोला – अजनबी के हाथ में थमी पानी की बोतल उसने झपट ली और गटागट पानी के कई घूंट भर गया। बोतल खाली हो जाने पर उसने उसे एक ओर फेंक दिया और संदेह भरी दृष्टि से अजनबी को घूरने लगा।
‘तुम्हें सिर्फ मोच आ गई है।’ उस व्यक्ति ने कहा – ‘किन्तु हड्डी कोई नहीं टूटी। मैं एम्बुलेंस बुला दूंगा तुम्हारे लिए। क्या तुम यहीं कहीं आसपास ही रहते हो?’
‘तुम कौन हो?’ जौनी ने पूछा – उसका हाथ अनायास ही कोट के अंदर अपनी पिस्तौल पर चला गया था।
‘मुझे फ्रीमैन कहते हैं।’ वह मुस्कराकर बोला – और उसके निकट बैठ गया।
‘घबराओ मत, मैं तुम्हारा प्रबन्ध अभी किए देता हूं।’
‘नहीं।’
जौनी के स्वर में छुपे लहजे ने फ्रीमैन को तुरन्त उसकी ओर देखने पर विवश कर दिया।
‘क्या तुम किसी मुसीबत में फंस गए हो मित्र?’
‘मित्र!’
आज तक तो किसी ने उसे मित्र कहकर संबोधित नहीं किया था। अतः अबकी बार जौनी फ्रीमैन की ओर देखने को विवश हो गया। उसने फ्रीमैन की निश्छल आंखों में झांका और आश्वस्त हो गया।
‘मुसीबत ही समझो दोस्त।’ जौनी बोला – ‘लेकिन मेरे पास धन है। क्या तुम मेरा टखना ठीक होने तक मुझे अपने यहां आश्रय दे सकते हो?’
फ्रीमैन ने जौनी का पसीने से तरबतर हाथ थपथपाया।
‘मैं तुम्हें पहले ही कह चुका हूं कि घबराओ मत। क्या तुम्हें पुलिस की तरफ से कोई परेशानी है?’
उससे भी कहीं ज्यादा।
‘अपनी बांह मेरी गर्दन में डाल दो। आओ चलते हैं।’
फ्रीमैन का सहारा लेकर जौनी किसी तरह से उस जगह पर पहुंच गया जहां एक पुरानी-सी खस्ताहाल फोर्ड खड़ी हुई थी। फ्रीमैन की सहायता से वह कार में बैठ गया किन्तु इस मामूली-से प्रयास ने ही उसे बुरी तरह से हांफने पर मजबूर कर दिया था। सिर और टखने में रह-रहकर उठने वाली दर्द की लहरों के कारण वह बार-बार कराह उठता था।
‘आराम से बैठ जाओ’ – फ्रीमैन ड्राइविंग सीट पर बैठते हुए बोला – ‘अब कोई चिन्ता की बात नहीं है।’
जौनी जितना भी आरामदायक स्थिति में बैठ सकता था – बैठ गया। वह काफी राहत-सी महसूस कर रहा था।
कुछ दूर सड़क के साथ-साथ चलने के बाद कार एक कच्चे धूल भरे रास्ते पर चल पड़ी। फिर आगे इतनी संकरी-सी पगडंडी आ गई जिसके दोनों ओर खड़े पेड़ों की शाखाएं बार-बार कार को छूने लगीं।
‘लो आ गया मेरा घर।’ फ्रीमैन ने कार रोकते हुए कहा।
जौनी ने सिर ऊंचा किया। पेड़ों के झुरमुट के बीच लकड़ी के लट्ठों से बना केबिन उसे दिखाई दिया। सुरक्षा की दृष्टि से वह उसे उचित ही प्रतीत हुआ।
‘यहां तुम्हें कोई दिक्कत नहीं होगी।’ फ्रीमैन कार से उतरकर बोला – ‘यहीं आराम से विश्राम कर सकते हो तुम।’
फ्रीमैन का सहारा लिए – करीब – करीब घिसटते हुए अंदर पहुंचकर जौनी ने देखा – केबिन में एक लिविंगरूप के अलावा एक बैडरूम भी था। मामूली तौर पर सजे हुए लिविंगरूम के कोने में किताबें बड़े करीने से रखी हुई थीं। छोटे-से बैडरूम में ले जाकर फ्रीमैन ने उसे धीरे-से बिस्तर पर लिटा दिया।
‘अब आराम करो।’ फ्रीमैन ने कहा और बाहर निकल गया।
जौनी का टखना इतनी बुरी तरह दर्द कर रहा था कि उसने इस ओर ध्यान देने का कोई प्रयत्न ही नहीं किया। चुपचाप लेटा वह अविश्वासपूर्वक लकड़ी की छत को घूरने लगा, जैसे उसे वर्तमान स्थिति पर यकीन नहीं आ रहा हो।
शीघ्र ही फ्रीमैन वापिस लौटा – उसके हाथ में ठंडी बीयर से भरा गिलास था।
‘लो पहले बीयर पियो।’ फ्रीमैन ने जौनी को गिलास थमाकर कहा – ‘फिर मैं तुम्हारा टखना देखूंगा।’
जौनी ने एक ही सांस में सारा गिलास खाली कर दिया और धीरे-से गिलास को फर्श पर रख दिया।
‘धन्यवाद-मुझे सचमुच इसकी बहुत आवश्यकता थी।’
फ्रीमैन ने उसके जूते और मौजे उतार दिए और बोला – ‘मोच बहुत बुरी तरह से आई है – किन्तु ठीक हो जाएगा। एक हफ्ते में तुम चलने-फिरने योग्य हो जाओगे।’
जौनी एकदम उछल पड़ा और लगभग उठकर बैठ गया।
‘क्या कहा तुमने – एक हफ्ता।’
‘यहां तुम बिल्कुल सुरक्षित हो मित्र।’ फ्रीमैन ने उसे आश्वासन दिया – ‘यहां कभी कोई नहीं आता। लगता है तुम भी इस इलाके के बारे में कुछ नहीं जानते। मुझे स्नेक मैन के रूप में जाना जाता है और सांपों से लोग डरते हैं यह तो तुम भी जानते होंगे।’
जौनी उसे घूरने लगा।
‘सांप!’
‘हां, जीवन-यापन के लिए मैं सांप पकड़ता हूं और उनका जहर
निकालकर अस्पताल में सप्लाई कर देता हूं – इस समय भी मेरे पास विभिन्न किस्म के तीन सौ सांप मौजूद हैं जिन्हें मैंने इस केबिन के पीछे विभिन्न पिंजरों में बंद कर रखा है।’ बातें करने के साथ-साथ वह अब तक जौनी के टखने पर बर्फ जैसे ठंडी पानी की पट्टी बांध चुका था। जौनी का दर्द भी कम होना शुरू हो चुका था।
‘कुछ खाओगे दोस्त? सुबह से बाहर रहने की वजह से मैंने भी अभी तक कुछ नहीं खाया है।’
‘मुझे इतनी तेज भूख लगी है कि पूरे घोड़े को खा सकता हूं।’ जौनी बोला।
फ्रीमैन मुस्कराया,‘पर मेरे मेन्यू में ऐसी कोई चीज नहीं है। मैं अभी आता हूं।’ कहकर वह बाहर निकल गया।
दस मिनट बाद वह दो प्लेटें लिए वापस लौटा। गाढ़े सूप में भरी प्लेटों से किसी स्वादिष्ट चीज की सुगन्ध आ रही थी। बिस्तर के सिरे पर बैठकर उसने एक प्लेट जौनी को पकड़ा दी तथा दूसरी प्लेट में वह स्वयं खाने लगा। खाने के पश्चात जौनी को लगा कि वर्षों बाद उसे इतना स्वादिष्ट भोजन नसीब हुआ था।
‘तुम तो कमाल का खाना पकाना जानते हो।’ जौनी ने निःसंकोच स्वर में कहा – ‘मैंने तो अपनी जिन्दगी में इससे ज्यादा स्वादिष्ट भोजन कभी नहीं खाया।’
‘हां, रैटल स्नेक (एक बेहद जहरीला सर्प) का मांस यदि ढंग से पकाया जाए तो बहुत स्वादिष्ट बन जाता है।’ प्लेटें उठाते हुए फ्रीमैन ने उत्तर दिया।
मारे आश्चर्य के जौनी की आंखें फटी की फटी रह गईं।
‘सांप का मांस!’
‘हां – मैं यही खाता हूं।’
‘ओह! हे मेरे भगवान!’
फ्रीमैन हंसा –
‘घोड़े से तो ज्यादा बेहतर है।’
फ्रीमैन चला गया – जौनी प्लेटें धोने की आवाज सुनता रहा।
थोड़ी देर बाद वह फिर लौटा और बोला – ‘मुझे कुछ काम करना है, लेकिन तुम निश्चिंत रहो, यहां कोई नहीं आएगा। तीन-चार घंटे बाद मैं ही वापिस लौटूंगा। जौनी के चेहरे पर बढ़ती हुई दाढ़ी की ओर संकेत करके उसने पूछा – ‘शेव करना चाहो तो सामान मिल सकता है।’
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जौनी ने इंकार में सिर हिला दिया।
‘मैं दाढ़ी बढ़ाने की सोच रहा हूं।’
दोनों की आपस में निगाहें मिलीं – फिर फ्रीमैन बोला – ‘ठीक है, अब तुम आराम करो – मैं बाहर से दरवाजा लॉक कर जाऊंगा।’
फ्रीमैन के जाने के बाद जौनी टखने का दर्द भूलकर नींद के आगोश में समा गया।
जब वह सोकर उठा तो सूर्यास्त का समय हो चला था। पहले की अपेक्षा अब वह अपने आपको ज्यादा स्वस्थ महसूस कर रहा था। सिर दर्द समाप्त हो चुका था। हां-टखने में दर्द अभी था।
बिस्तर में पड़ा वह खिड़की द्वारा छुपते सूर्य को देखकर फ्रीमैन के बारे में सोच रहा था। व्यक्तित्व अत्यधिक विचित्र होने के बावजूद भी वह विश्वसनीय व्यक्ति प्रतीत होता था।
सहसा उसके विचार मसीनो की ओर पलट गये। उसके साथ एक काफी लम्बे अरसे तक काम करते रहने के कारण जौनी इस बात को अच्छी तरह से जानता था कि मसीनो एक क्रोधित मरखने सांड की तरह बौखला रहा होगा।
क्या वह सहायता लेने के लिए माफिया संगठन के स्थानीय मुखिया तान्जा के पास पहुंच गया होगा। यदि ऐसा हुआ तो हो सकता है अब तक संगठन ने उसकी तलाश आरंभ भी कर दी हो। जौनी ने लगेज लॉकर में पड़ी रकम के बारे में सोचा। सैमी के बारे में भी विचार किया। उसे सैमी से संबंध स्थापित करना होगा। टखना ठीक होते ही वह फोन द्वारा उसे सूचित कर देगा कि उसने उस गरीब का धन क्यों चुराया था। मुमकिन है सैमी द्वारा उसे मसीनो की गतिविधियों की भी सूचना हासिल हो जाए।
सहसा वह चौंक गया – खुली सड़क से बाहर उसे कोई मानवाकृति-सी नजर आई थी। उसका हाथ स्वयं ही अपने पिस्तौल पर चला गया – किन्तु कुछ ही क्षणोपरांत उसकी आशंका निर्मूल सिद्ध हो गई, आने वाला व्यक्ति फ्रीमैन था। उसके हाथ में एक बोरा था और बोरे में बंद चीज हिल-डुल रही थी।
‘सांप।’ यह सोचकर जौनी ने बुरा-सा मुंह बनाया।
‘अजीब तरीका है रोजी कमाने का’ -जौनी ने सोचा।
पांच मिनट बाद फ्रीमैन ठंडी बीयर से भरे दो गिलास लेकर उपस्थित हुआ।
‘टखना कैसा है अब?’ जौनी को एक गिलास पकड़ाकर उसी के बिस्तर पर बैठते हुए फ्रीमैन ने पूछा।
‘दर्द तो है – मगर पहले जैसा नहीं।’ जौनी ने उत्तर दिया।
‘कुछ ही देर में मैं उसे फिर देखूंगा।’ फ्रीमैन ने बीयर का घूंट भरते हुए कहा। उसने आधे से ज्यादा गिलास पिया और फिर उसे नीचे रख दिया।
‘तुम मेरे लिए बहुत भाग्यशाली सिद्ध हुए हो। आज मैंने तीन काटन माउथ पकड़े हैं। क्या मैं तुम्हारा नाम जान सकता हूं मित्र?’
‘जौनी।’ जौनी ने उत्तर दिया और फिर कुछ रुककर उसने फ्रीमैन से पूछा – ‘तुम क्या प्रत्येक अजनबी से इसी तरह का व्यवहार करते हो – जैसा मेरे साथ कर रहे हो?’
‘हां दोस्त – दूसरों की सहायता करना मेरा स्वभाव है। मैं ‘नेकी कर दरिया में डाल’ वाली कहावत पर पूरा-पूरा विश्वास करता हूं।’ वह मुस्कराया – फिर बोला – मैं। कोई धार्मिक व्यक्ति नहीं हूं किन्तु किसी की सहायता करके मुझे अपार प्रसन्नता और आत्मसंतुष्टि का अनुभव होता है। मेरे वर्तमान जीवन ने मुझे सिखाया है कि अच्छे-बुरे के चक्कर में न पड़कर सिर्फ विपत्ति में फंसे असहाय लोगों की जहां तक बन पड़े सहायता करता रहूं। वैसे किसी अजनबी के रूप में यहां पहुंचने वाले तुम्हीं पहले व्यक्ति हो – अन्यथा कोई इधर आता ही नहीं है।’

‘तुम्हारे उसूल बहुत सुन्दर हैं।’ जौनी ने शांत स्वर में कहा – मुझे तो अपने भाग्य पर खुशी हो रही है कि मेरे उस बुरे वक्त में तुम मेरे लिए, भगवान का रूप लेकर मेरी सहायता को पहुंच गए।’
‘छोड़ो इन बातों को।’ अपनी प्रशंसा के प्रति उपेक्षा प्रदर्शित करते हुए फ्रीमैन बोला – ‘लाओ अब मुझे टखना दिखाओ – फिर मैं तुम्हारे कपड़े उतरवाने में तुम्हारी मदद करूंगा। मेरे पास एक फालतू पायजामा है। तुम शौक से उसे पहन सकते हो।’
उसने धीरे-धीरे टखने की पट्टी हटाई और उसे एक ओर रख दिया। फिर बर्फ के पानी में भिगोकर दूसरी पट्टी पुनः उसी स्थान पर बांध दी। फिर वह खड़ा होकर जौनी की जाकेट उतारने में उसकी मदद करने लगा।
जैसे ही फ्रीमैन की दृष्टि जौनी के पिस्तौल तथा होलस्टर पर पड़ी – वह चौंक पड़ा – और कुछ हिचकिचाया।
जौनी ने स्वयं ही उन्हें अलग रखते हुए कहा – ‘मेरी असली मुसीबत की जड़ यही है।’
फ्रीमैन ने भावहीन स्वर में कहा – ‘आजकल बहुत से व्यक्तियों की परेशानियों का कारण ये ही चीजें होती हैं।’ उसका हाथ जौनी की पैंट तक पहुंच चुका था – ‘पैंट भी उतार दो दोस्त- आराम महसूस करने लगोगे।’ फ्रीमैन की सहायता से जौनी ने पैंट भी उतार दिया। तभी कोई चीज खन्न की आवाज करते हुए नीचे जा गिरी। फ्रीमैन ने नीचे की ओर देखा। फिर उसने फर्श पर झुककर वह चीज उठाकर जौनी की ओर देखा – ‘यह तुम्हारा है।’ उसने पूछा। यह पैंट के कफ से निकलकर नीचे गिरा था।
जौनी ने अपना हाथ आगे बढ़ा दिया।
जौनी के आश्चर्य का ठिकाना न रहा – फ्रीमैन जिस चीज को उठाकर उसे पकड़ा रहा था वह उसका सैंट क्रिस्टोफर वाला लॉकेट था।
दौलत आई मौत लाई भाग-13 दिनांक 28 Feb.2022 समय 08:00 बजे रात प्रकाशित होगा

