सुबह जब वह भगतराम के साथ नाश्ते पर बैठा तो सुधा नहीं आई। भगतराम को यह बात अच्छी नहीं लगी। इस घर में वे लोग मेहमान हैं। इधर घर के मालिक से नाराज होने का अधिकार उनमें से किसी को नहीं। इसीलिए वह सुधा को स्वयं बुलाने चले गये। परन्तु सुधा तब भी नहीं आई। हां, अपने बेटे को अवश्य भेज दिया। भगतराम ने आनन्द से सुधा के न आने की क्षमा मांगनी चाही परन्तु कुछ बोले नहीं।
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आनन्द उनकी विवशता समझता था इसलिए चुप ही रहा। सुधा के न आने का कारण उसे ज्ञात था। उसके पास आंखें नहीं हैं फिर भी उस व्यक्ति के सामने वह किस प्रकार पलकें उठा सकती हैं जिसके लिए उसके बेटे ने एक अनुचित बात कह दी हो ? राजा को उसने अपने समीप बिठा लिया और उसके साथ मुस्कराने का प्रयत्न करते हुए नाश्ता करने लगा। सुधा का नाश्ता हरिया उसके कमरे में पहुंचा आया था।
नाश्ते के कुछ देर बाद आनन्द बाहर चला गया। जिस ‘फर्म’ के वह ‘शेयर’ खरीद रहा था, उसके लिए कुछ न कुछ तो कार्यवाही करनी ही थी। परन्तु अवसर निकालकर वह लंच के लिए समय से पहले ही बंगले लौट आया। सुबह के नाश्ते पर सुधा की अनुपस्थिति ने उसके दिल के अन्दर तड़प उत्पन्न कर दी थी। इसीलिए अब वह ‘लंच’ के समय उसकी समीपता बिलकुल नहीं खोना चाहता था परन्तु जब सुधा ने लंच पर भी साथ नहीं दिया तो उसके दिल को ठेस लगी। जब कोई वस्तु मिलने के बाद बिछड़ती है तो दिल को बहुत दुख होता है। उसे ऐसा लगा मानो सुधा उससे बहुत दूर चली गई है। उसके मन में निराशा की हल्की-सी छाया रेंग गई। क्या वह सचमुच सुधा का मन नहीं जीत सकेगा ? अभी जब वह उसकी वास्तविकता नहीं जानती है तब यह हाल है। जब वास्तविकता का ज्ञान हो जायेगा तब क्या होगा? नफरत-केवल नफरत-असीमित नफरत।
सुधा की दूरी का अहसास करके वह दो कौर से अधिक अपने मुंह में नहीं डाल सका और कुर्सी पर से उठ गया तो भगत राम को उसकी अवस्था समझते देर नहीं लगी। उन्हें अफसोस हुआ। परन्तु वह कर भी क्या सकते थे ? सुबह आनन्द के जाने के बाद वह सुधा को समझाते-समझाते थक चुके थे। परन्तु सुधा का एक ही उत्तर था-यदि दो एक दिन के अन्दर उसकी आंखों का आपरेशन नहीं होता तो वह इस बंगले को छोड़कर सदा के लिए चली जायेगी। राजा की भोली-भाली बात के बाद आनन्द बाबू के सामने वह पलकें भी उठाना पाप समझती है। मन मारकर भगतराम चुप हो गये थे।
उस दिन ‘लंच’ पर भगतराम ने भी बहुत कम खाना खाया। आनन्द का मन उदास था इसलिए राजा को वह अपने साथ ले गए। अपने पलंग पर लेट गए और राजा को समीप बैठा लिया। बातों द्वारा उसका मन बहलाने लगे।
आनन्द कुछ देर तक अपने पलंग पर बैठा रहा-बहुत खोया-खोया-सा। उसके कानों में बाबा भगतराम तथा नन्हे राजा का स्वर सुनाई पड़ा था परन्तु उसका मन सुधा के विचारों में कहीं और भटक रहा था। सुधा की पल भर की दूरी ने ही उसे विश्वास दिला दिया था कि यदि वह इस घर को छोड़कर चली गई तो उसका जीना कठिन हो जायेगा। सुधा उसकी एक-एक सांस में प्यार बनकर समा गई थी।
आज सुबह से जब सुधा से उसकी एक भी बात नहीं हो सकी तो यह प्यार दीवानगी का रूप धारण करने लगा। उसका दिल सुधा से मिलने के लिए तड़प उठा। परन्तु उसने अपने आपको काबू में किया। ऐसी स्थिति में सुधा से मिलकर वह बात क्या करेगा ? सुधा पर इतनी जल्दी अपने दिल का हाल प्रकट कर देना उचित नहीं था। सुधा का मन जीतने के लिए उसे धीमे-धीमे पग उठाना था-बहुत संभल-संभलकर। एक पग भी गलत पड़ जाने से उसके प्यार की सारी तपस्या नष्ट हो सकती थी। आखिर एक ही घर में सुधा कब तक उससे दूरी बरत सकती है ? उसने आशा कर ली, आज नहीं तो कल, कल नहीं, तो परसों, सुधा के साथ उसकी बोल-चाल अपने आप ही आरम्भ हो जायेगी। आखिर आंखों का आपरेशन भी तो सुधा को उसी के द्वारा कराना है। कुछ देर लेटकर आराम करने के लिए उसने अपना स्वेटर उतारा और खिड़की के समीप आकर खूंटी पर टांग दिया। दिल के अन्दर सुधा को देखने की इच्छा उत्पन्न हुई तो वह एक पग बढ़ाकर खिड़की पर चला आया। उसने सामने के कमरे में झांककर देखा, दरवाजे का पर्दा सरका हुआ था तथा सुधा अपने पलंग पर बहुत खामोश बैठी हुई थी। सुधा के कान इस प्रकार चौकन्ने थे मानो वह बगल के कमरे से आती अपने बेटे की बात बहुत ध्यान से सुन रही थी।
‘‘मां कह रही थी, कि वह मुझसे गुस्सा है।’’ भगतराम के कमरे में उसके राजा बेटा ने अपने तोतले स्वर में कहा था, ‘‘वह हमसे बिलकुल भी बात नहीं करेगी।’’
‘‘अच्छा !’’ उसके बाबा का स्वर था, ‘‘तो उसने तुमसे बात नहीं की ?’’
‘बात की थी।’’ राजा का स्वर अचानक ही भीग गया। उसने कहा, ‘‘और फिर रो-रोकर कहने लगी कि मेरा बापू अब कभी नहीं आएगा। उसको एक हत्यारे ने जान से मार दिया है।’’
भगतराम का कोई भी स्वर नहीं सुनाई पड़ा।
‘‘मैंने मां को चुप कर दिया।’’ एक पल बाद फिर नन्हा राजा कह रहा था, ‘‘मैंने कह दिया, जब मैं खूब बड़ा हो जाऊंगा तो अपने बापू के हत्यारे को जान से मार दूंगा।’’
आनन्द के दिल को ठेस लगी। घृणा का यह बीज सुधा में ही नहीं, उसके बच्चे में भी उपस्थित है। उसने प्रण कर लिया कि घृणा के इस बीज को पनपने से पहले ही वह जड़ से उखाड़ फेंकेगा। फिर इसकी जगह प्यार का एक खिला पौधा ऐसे ढंग से उत्पन्न करेगा कि सुधा अपने लिए न सही, अपने दिल के टुकड़े के लिए अवश्य उसके समीप रहने पर विवश हो जायेगी। सुधा उसके समीप रहेगी तो अपने त्याग द्वारा एक-न-एक दिन वह उसके दिल में अपना स्थान अवश्य बना लेगा। सुधा की समीपता प्राप्त करने के बाद ही वह अपनी भूल का प्रायश्चित कर सकता था। साथ ही अपने प्यार को सार्थक बनाने का अवसर भी उसे मिल सकता था।
सहसा राजा बातें करते-करते खामोश हो गया तो सुधा लापरवाह होकर बैठ गई। इसी लापरवाही में उसकी भटकती आंखों का केन्द्र खिड़की पर खड़ा वह बन गया। उसे लगा मानो सुधा नजरों की डोर बांधकर उसे अपनी ओर खींच रही है। उसकी ज्योतिहीन आंखों में कुछ ऐसा ही आकर्षण था। सुधा को एकान्त में देखकर उसके दिल के भटकते शोलों को हवा लगी। वह सब्र नहीं कर सका तो अपने कमरे से बाहर निकला-बहुत खामोशी के साथ। भगतराम का पलंग उनके कमरे में एक किनारे दीवार से सटकर था। इसलिए उसे कोई नहीं देख सका।
आगे बढ़कर दबे पगों वह सुधा के कमरे में प्रविष्ट हुआ। अपनी सांसें उसने रोक लीं और फिर सुधा के बिलकुल समीप जाकर खड़ा हो गया। सुधा उसकी उपस्थिति से बिल्कुल निश्चिंत थी। उसकी छाती पर से आंचल सरक गया था। उसकी दूध समान सफेद गर्दन के नीचे नन्हीं-नन्हीं हड्डियों का हल्का-सा उभार शीशे के समान चमक रहा था। वह अपने यौवन से अनभिज्ञ थी-या शायद उसने इसका गला घोंट रखा था, उस मदिरा के समान जिसे यदि बोतल में ठीक से बंद न किया जाए तो झाग बनकर फूट निकलती है। इस मदिरा की एक-एक बूंद को उसके पंखुड़ियों जैसे होंठों से पीने के लिए उसका दिल पागल हो उठा। वह उसकी ओर झुका भी, परन्तु फिर दिल पर पत्थर रखकर अपने होंठों को चबाने लगा। उसे सब्र करना पड़ा। जल्दबाजी का परिणाम कभी अच्छा नहीं होता। बेबसी की अवस्था में उसने अपनी दोनों हथेलियां आपस में मसलीं और फिर दो पग पीछे हटकर सीधा खड़ा हो गया। परन्तु तभी अपने कानों में राजा का स्वर सुनकर वह चौंक गया।
‘‘अंकल।’’ राजा उसके समीप आते हुए कह रहा था, ‘‘तुम मां के पास खड़े हो और मैं तुम्हारे कमरे में तुम्हें देखने गया था।’’
आनन्द बौखला कर इधर-उधर देखने लगा। उसकी चोरी पकड़ी गई थी।
अपने बेटे की बात सुकर सुधा भी चौंकते हुए उठ खड़ी हुई। बौखलाकर उसने अपनी छाती पर आंचल ठीक किया और फिर कुछ लजाई-सी बोली, ‘‘कौन ? आनन्द बाबू ?’’
‘‘जी।’’ आनन्द ने अपनी स्थिति संभाली।
‘‘आप..आप यहां कब आए ?’’ सुधा अपनी स्थिति संभालने में अब तक असमर्थ थी।
‘‘बस-अभी-अभी ही आया हूं।’’
‘‘अंकल, तुमने कहा था कभी झूठ नहीं बोलते।’’ सहसा राजा ने उसके सामने आकर एक अंगुली द्वारा इशारा करते हुए भोलेपन से कहा, ‘‘अभी-अभी तो मैं यहां आया हूं। तुम तो मुझसे पहले यहां आकर मेरी मां को देख रहे थे।’’
लाज के मारे सुधा धरती में गड़ गई। जाने कब आनन्द बाबू आए और चोरी से उसे देख भी लिया। किस स्थिति में वह बैठी थी ? उसने अपनी साड़ी का आंचल खींचकर दोनों ही कंधे ढांक लिए।
आनन्द फिर बौखला गया। उसने इधर-उधर देखा, फिर झुकते हुए राजा के गाल पर प्यार से हल्की-सी थपकी दी। अपनी झेंप मिटाते हुए उसने कहा, ‘‘बहुत बातें करने लगा है, इसलिए अब तुझे स्कूल में डालना पड़ेगा।’’
‘‘स्कूल में ! स्कूल में क्या होता है अंकल ?’’ राजा ने आश्चर्य से पूछा।
आनन्द वहीं फर्श पर पंजों के बल बैठ गया। दोनों हाथों से उसने राजा की कमर पकड़ ली। फिर उसी बहाव में प्यार से बोला, ‘‘स्कूल में पढ़ाया लिखाया जाता है। मेरा राजा पढ़ेगा-लिखेगा-फिर बड़ा होकर कमीशन में बैठेगा और पास होकर पुलिस विभाग का एक बहुत बड़ा अफसर बनेगा।’’
‘‘नहीं।’’ सहसा सुधा चीख पड़ी, इस प्रकार जैसे उसे हिस्टीरिया का दौरा पड़ गया हो। उसकी चीख के साथ तुरन्त ही उसके मुखड़े पर दर्द और गम की छाया लौट आई। वह छाया जिसे आनन्द ने बहुत कठिनाई के बाद उससे दूर किया था। सुधा की अवस्था देखकर आनन्द घबरा गया। फिर संभलकर उठ खड़ा हुआ। सुधा उसी प्रकार चीख रही थी, ‘‘मेरा बेटा छोटे-से-छोटा काम कर लेगा, परन्तु पुलिस विभाग का कर्मचारी कभी नहीं बनेगा। मुझे पुलिस के आदमियों से सख्त नफरत है-सख्त नफरत है।’’ सुधा चीखते-चीखते अचानक फूट-फूटकर रो पड़ी। उसके दिल के घाव पर मानो किसी ने नमक छिड़क दिया था। उसकी चीख सुनकर बाबा भगतराम भी कमरे में दौड़े-दौड़े चले आये। उन्होंने आनन्द को देखा। आनन्द की बात वह अपने कमरे में सुन चुके थे। उन्होंने उसे कोई दोष नहीं दिया। सुधा को उन्होंने संभाल लिया। उसे कंधे से पकड़कर वहीं पलंग पर बैठा दिया और स्वयं भी समीप बैठकर उसे तसल्ली देने लगे।
आनन्द का दिल टूट गया। सुधा को उससे ही नहीं, सारे पुलिस कर्मचारियों से भी नफरत है। वह उसे कभी क्षमा नहीं करेगी। उस पर वह अपनी वास्तविकता नहीं खोल सकेगा। अपने वास्तविक रूप में वह उसका मन कभी नहीं जीत सकेगा। बड़े से बड़ा त्याग करने के बाद भी वह उसके हृदय में वह स्थान प्राप्त नहीं कर सकता जिसकी उसने आशा बांध रखी है। नारी के जीवन में एक ही पुरुष आता है-एक बार। उसने निश्चय कर लिया वह अपनी भूल की सजा में सुधा को उसके हाल पर छोड़कर सहायता करता रहेगा-केवल सहायता। उसे उससे और किसी बात की आशा रखने का कोई अधिकार नहीं। किसी से किसी बात की आशा रखना अपना स्वार्थ प्रकट करना है। परन्तु यह दिल, मांस का नन्हा-सा यह टुकड़ा, जब किसी के लिए तड़पने लगता है तो कोई क्या करे ? फिर भी उसने तय कर लिया, अब वह जल्द ही डाक्टर से मिलकर सुधा की आंखों के आपरेशन का प्रबन्ध कर देगा। आंखें आने के बाद जो होगा देखा जायेगा। यह निर्णय उसने अपने आप से खिसियाते हुए कर लिया, बहुत जल्दबाजी में, उस जुआरी के समान जो अपनी एक बहुत बड़ी धनराशि हार जाने के बाद बची-खुची धनराशि इकट्ठी ही दांव पर लगा देता है। वह सुधा के समीप आया। निराश स्वर में उसने कहा, ‘‘सुधा देवी, मुझे अफसोस है कि आपको मेरी बात से इतनी चोट पहुंची। मुझे क्षमा कर दीजियेगा।’’

सुधा ने कोई उत्तर नहीं दिया, परन्तु उसकी हिचकियां अवश्य कम हो गईं। आंचल द्वारा वह अपने आंसू पोंछने लगी। आनंद ने उसकी बात की प्रतीक्षा नहीं की और पलटकर कमरे से बाहर निकल गया। नन्हा राजा फटी-फटी आंखों से अपनी मां को देख रहा था इसलिए वह आनन्द के पीछे नहीं जा सका। कुछ देर बाद भगतराम ने सुधा को समझाया। आनन्द बाबू देवता हैं। उसे उनके साथ ऐसा व्यवहार नहीं करना चाहिये था। आनन्द बाबू के अतिरिक्त उनका इस संसार में है ही कौन ? उसे अपने लिए न सही, अपने बच्चे के लिए ही सोचना चाहिए। उसे अपनी आंखों के आपरेशन के लिए भी जल्दी नहीं करना चाहिये। आनन्द बाबू को उसका पूरा ध्यान है। वह स्वयं ही उचित अवसर देखकर आपरेशन करवा देंगे।

