papi devta by Ranu shran Hindi Novel | Grehlakshmi

‘‘बाबा।’’ सुधा ने सावधानी बरतते हुए अगल- बगल आहट ली और कहा, ‘‘मेरी आंखों का आपरेशन कब होगा ?’’

उसका प्रश्न सुनकर बाबा मौन रह गये। कुछ समझ में नहीं आया कि क्या उत्तर दें। आंखों के आपरेशन के पक्ष में वह स्वयं भी नहीं थे। वो सोचते थे कि आंखों का आना सुधा के सुखी जीवन के हित में कभी नहीं होगा। उन्हें यह विश्वास था कि आनन्द इतनी आसानी के साथ सुधा को उसकी ज्योति वापिस दिलाकर अपनी पहचान देना स्वीकार नहीं करेगा।

पापी देवता नॉवेल भाग एक से बढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- भाग-1

ऐसा न हो कि सुधा के दिल में समाई श्रद्धा फिर नफरत में बदल जाए।

‘‘बाबा।’’ सुधा ने बाबा की खामोशी में चिन्ता महसूस की तो फिर अपना प्रश्न दोहराना चाहा।

‘‘उसे आने दे बेटी, मैं पूछकर बताऊंगा।’’ बाबा ने उसे टाल दिया।

उस दिन काफी समय बीतने के बाद भी आनन्द नहीं आया। हरिया बहुत पहले लौट आया था और इस समय राजा सुधा के समीप फर्श पर बैटरी की मोटर चलाते हुए खेल रहा था। फिर भी सुधा को जाने क्यों एक उकताहट-सी महसूस होने लगी। आनन्द रहता था तो उससे न सही उसके बेटे से ही सदा बातें करता रहता था और इसीलिए घर की रौनक स्थिर रहती थी। इतनी देर बाद भी वह नहीं आया तो से पूरा बंगला सूना लगने लगा। भगतराम अब तक उसके कमरे में बैठे हुए एक पत्रिका पढ़ने में तल्लीन थे। आनन्द ने उनके लिए अनेकों धार्मिक तथा राजनैतिक पत्रिकाओं का प्रबन्ध कर दिया था। सहसा दीवार पर टंगी घड़ी ने एक का घंटा बजाया।

‘‘एक बज गया क्या ?’’ सुधा ने पूछा।

‘‘नहीं-डेढ़ बजे हैं।’’ भगतराम ने एक बार घड़ी पर दृष्टि उठाई और फिर पत्रिका में डूब गये।

‘‘अभी तक आनन्द बाबू नहीं आए ?’’

‘‘नहीं।’’ भगतराम ने सुधा को गौर से देखा। आनन्द के लिए सुधा का चिंतित होना उन्हें पसन्द आया।

तभी हरिया ने कमरे में प्रवेश किया। राजा को उसने गोद में उठा लिया और सुधा तथा भगतराम, दोनों ही से बोला, ‘‘मालिक की आज्ञा है कि कभी उन्हें आने में देर हो जाए तो आप लोगों को खाना खिला दिया करूं। खाना मेज पर लग चुका है।’’

सुधा ने आनन्द को आज पहली बार खाने के समय अनुपस्थित पाया था। इस घर की वह मेहमान है। जिसकी मेहमान है, वही घर में न हो तो वह किस प्रकार खाना खा सकती है ? उसने कहा, ‘‘आनन्द बाबू को आने दो, खाना हम सब इकट्ठे ही खायेंगे।’’

हरिया कुछ झिझका। उसने नन्हे राजा को देखा। फिर बोला, ‘‘यदि आप आज्ञा दें तो मैं राजा भैया को ही खाना खिला दूं।’’

सुधा ने आज्ञा दे दी। हरिया चला तो सुधा ने सोचा, आनंद बाबू उसका कितना अधिक ध्यान रखते हैं ! इतना अधिक ध्यान तो कोई अपना सगा भी नहीं रखता। उसे आनन्द में कोई गलत रुचि नहीं थी, फिर भी उसके दिल के अन्दर आनन्द के व्यक्तिगत जीवन के बारे में सब कुछ जाने लेने की इच्छा बढ़ने लगी तो उसने पूछा, ‘‘बाबा, आनन्द बाबू का व्यापार क्या है ?’’

‘‘कुछ पता नहीं बेटी।’’ भगतराम ने पत्रिका बंद की और सुधा की रुचि में रुचि लेते हुए बोले, ‘‘जो हम पर इतना दयालु है उसकी व्यक्तिगत बातें पूछते हुए भी तो डर लगता है।’’

सुधा एक पल चुप रही। परन्तु उसका दिल जाने क्यों अपने देवता के बारे में सब कुछ जानने के लिए अधीर हुआ जा रहा था। जब मानव को भगवान मिल जाता है तो मानव भगवान की बिल्कुल सही तस्वीर को अपने दिल के अन्दर उतार लेना चाहता है। उसने पूछा, ‘‘अच्छा बाबा, आनन्द बाबू जितने दयालु हैं क्या देखने में भी वैसे ही लगते हैं ?’’

‘‘उससे भी अच्छे लगते हैं।’’ भगतराम ने कहा, आनन्द बाबू का व्यक्तित्व उनके दिल का दर्पण है।’’ एक पल के लिए भगतराम का दिल चाहा कि वह सुधा के समक्ष आनन्द की वास्तविकता व्यक्त कर दें। परन्तु अभी उचित समय नहीं आया था। सुधा के दिल में अपने देवता के लिए कितनी ही श्रद्धा हो, परन्तु इससे कहीं अधिक घृणा वह अपने पापी से करती थी। यदि सुधा को आनन्द की वास्तविकता ज्ञात हो गई तो वह उसके द्वारा अपनी आंखों का आपरेशन भी नहीं करायेगी। आंखों के आपरेशन के बाद भी यदि उसे आनन्द की वास्तविकता का ज्ञान हुआ तो वह अपनी आंखें फोड़ डालेगी और तब एक अच्छा-बड़ा तूफान खड़ा हो जायेगा। फिर वह अपने पापी के साथ उससे भी घृणा करने लगेगी। वह उस व्यक्ति का अहसान किस प्रकार ले सकती है जिसके सर उसके पति की हत्या है, जो उसकी सारी बरबादियों का जिम्मेदार है ? पाप का दण्ड यदि पैसे से चुकाया जाता तो इस संसार में सभी पापियों को मुक्ति मिल जाती। उन्हें अपना पहले का विचार उचित ही लगा। सुधा की आंखों का आपरेशन कभी न हो तथा आनन्द की वास्तविकता सदा भेद में रहे। इसी में सबकी भलाई है। उन्होंने खामोशी धारण कर ली।

तभी पोर्टिको में एक टैक्सी आकर रुकी। आनन्द आ चुका था। भगतराम ने एक बार घड़ी पर दृष्टि उठाई और फिर आनन्द की प्रतीक्षा करने लगे।

‘लंच’ के मध्य आनन्द ने बताया कि वह एक नई ‘फर्म’ में एक छोटा ‘शेयर’ खरीद रहा है। व्यापार चल गया तो लाभ ही लाभ है। उसने और भी बहुत-सी बातें कीं परन्तु आपरेशन के बारे में कुछ नहीं बताया तो सुधा उदास हो गई। फिर भी वह कुछ पूछने का साहस नहीं कर सकी। परन्तु उसे आशा थी कि उसके बाबा आपरेशन की बात अवश्य छेड़ेंगे। परन्तु उन्होंने भी कुछ नहीं कहा तो उसे अपने आपको तसल्ली देनी पड़ी, यह सोचकर कि बाबा शायद अकेले में आनन्द बाबू से आपरेशन की बात करना चाहते हैं। एक तरह से यह विचार उसे उचित ही लगा।

रात के खाने के बाद जब सदा के समान कुछ देर के लिए सब बैठक में बैठे तो ठण्ड बढ़ चुकी थी। सुबह का भीगा वातावरण अब वर्षा की हल्की-हल्की फुहार में परिवर्तित हो चुका था। बादलों की गरज के साथ कभी-कभी बिजली भी कड़ककर कौंध जाती थी। आनन्द के हाथ में काफी का प्याला था। सुधा और बाबा काफी नहीं पीते थे इसीलिए आनन्द ने उनके लिए दूध का प्रबन्ध कर दिया था जिसे वे पलंग पर लेटने से कुछ देर पहले ही पीना पसन्द करते थे। राजा आनन्द के समीप खड़ा था जिसे वह तस्तरी में थोड़ी-सी काफी निकालकर छोटी-छोटी चुस्की दे देता था। राजा काफी का स्वाद पाने के बाद कड़वा-सा मुंह बनाता तो आनन्द इसका खूब आनन्द उठाता। राजा की इस बात का आनन्द बाबा भी उठा रहे थे, परन्तु सुधा इसे देखने को तरस रही थी। फिर भी वह खुश थी। उसके दिल के टुकड़े की खुशी ही उसकी अपनी खुशी थी। इन्हीं बातों में काफी देर हो गई तो अचानक समीप ही सुधा के कमरे में घड़ी ने घण्टे बजाये। सुधा ने घण्टे गिने-ठीक नौ बजे थे। उसने राजा को सुला देना चाहा। बच्चों का देर से सोना उसके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। परन्तु उसके बुलाने पर भी नन्हा राजा उसके पास नहीं आया।

‘‘मैं नहीं आऊंगा।’’ वह अपनी तोतली जुबान में मिनमिनाया।

‘‘क्यों ?’’ सुधा ने आनन्द के प्रति उसका प्रेम जानकर भी पूछा।

‘‘तुम कहती थीं मेरा बापू आयेगा-बापू आता नहीं इसलिए हम अंकल को नहीं छोड़ेंगे।’

सुधा गंभीर हो गई। भगतराम के मुखड़े पर भी चिन्ता गंभीर छाया बनकर छा गई। आरंभ में राजा को अपने बापू की कमी नहीं महसूस हुई थी पर परन्तु इधर आठ-दस-महीने जब कुछ बड़ा होकर वह पड़ोस के बच्चों के साथ खेलने लगा था तो उसे अपने बापू की कमी महसूस होने लगी थी और इसीलिए तब सुधा उसे झूठा सन्तोष देने पर विवश थी। परन्तु वह कब तक इस झूठे सन्तोष के सहारे सब्र करता ? उसे उसके बाप के स्थान पर जब आनन्द मिल गया तो उसने अपने दिल की बात कहने में जरा भी संकोच नहीं किया।

‘‘मां !’’ अचानक राजा के नन्हे से मस्तिष्क को जाने क्या सूझा तो उसने बहुत भोलेपन से कहा, ‘‘तुम अंकल को मेरा बापू क्यों नहीं बना देतीं ?’’

सहसा बादल की गरज के साथ बहुत जोर की एक बिजली कड़की। कड़क के साथ ही कौंध खिड़की द्वारा बैठक के अन्दर तक चली आई तो अन्दर की जलती ट्यूब लाइट मद्धिम पड़ गई। आनन्द ने देखा, सुधा एक झटके से खड़ी होकर चीख पड़ी थी, ‘‘राजा !’’ परन्तु उसकी चीख बिजली की कड़क में डूबकर रह गई। उसका मुखड़ा अचानक सफेद पड़ गया था। वह कांप रही थी क्रोध से, कुछ कहना चाहती थी, परन्तु उसके दिल में उठे तूफान के समान बादल अब तक गरज रहा था। मन मारकर वह पैर पटकती हुई अपने कमरे की ओर बढ़ गई। इतने दिनों में उसे इस बंगले के दरवाजों का अच्छा-भला ज्ञान हो चुका था।

राजा ने अपनी मां से ऐसी सख्त डांट पहली बार सुनी थी। कांपकर वह आनन्द से लिपट गया, इस प्रकार कि आनन्द के हाथ से काफी का प्याला छूटते-छूटते बचा। काफी के कुछ छींटे उसके कपड़ों को खराब कर गये। भगतराम ने आनन्द को देखा फिर राजा को भी। राजा ने उनके दिल की बात कह दी थी परन्तु उन्होंने कुछ कहा नहीं। वह उठकर धीमे पगों से अपने कमरे की ओर बढ़ गये।

उस रात अपने पलंग पर लेटने के बाद आनन्द को बहुत देर तक नींद नहीं आई। सुधा के व्यवहार का उसने जरा भी बुरा नहीं माना। उसकी मजबूरी को वह समझता था। राजा को सबके सामने ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये थी। परन्तु वह बच्चा था। किसी के दिल का हाल वह क्या जाने ! परन्तु फिर भी आनन्द के मन में एक प्रश्न बार-बार उठ रहा था। क्या सुधा अपने दिल में किसी को वह स्थान कभी नहीं देगी जो उसके पति का है ? क्या सुधा का मन वह कभी नहीं जीत सकेगा ? और यदि उसका मन जीत भी लिया तो क्या उसकी वास्तविकता जानकर वह उसे क्षमा कर सकेगी ? वह उसके पति का हत्यारा है। उसकी बरबादियों का जिम्मेदार है।

उसकी अन्तरात्मा कब तक यह बात स्वीकार करेगी कि अपना वास्तविक व्यक्तित्व छिपाकर वह सुधा का दिल बहलाता रहे ? उसके पाप का प्रायश्चित तभी पूरा होगा जब सुधा उसका वास्तविक रूप पहचानकर ही उसे क्षमा करे। और उसका प्यार उस समय सार्थक होगा जब सुधा सब कुछ भूलकर उसे स्वीकार कर ले, अपने हृदय में वह स्थान दे जो उसके पति का भी नहीं था। परन्तु यह एक बिलकुल ही अनहोनी बात थी जिसे होनी बनाने के लिए उसका दिल पहले ही पग उठा चुका था। उसका प्रयत्न सफल होगा या नहीं, इसका अनुमान वह नहीं लगा सका, परन्तु उसके इरादे नेक थे इसलिए मन को प्यार में सफल होने की आशा बंधी रही। बहुत देर बाद जब उसे नींद आने लगी तो उसने सुधा की छवि को अपनी आंखों में कैद करके बोझिल पलकों का ताला बन्द कर दिया ताकि सपने में भी वह उसका साथ प्राप्त करता रहे।

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