अपना पराया भाग-1 - Hindi Upanyas

वैदराज बदबद हाथ मलते हुए बेचैनी के साथ कमरे में टहल रहे थे। मुखाकृति पर चिंता एवं क्रोध का सम्मिश्रण था। कभी-कभी हंसकर उस अधेड़ व्यक्ति की ओर तेज निगाहों से देख लेते थे, जो पास ही गद्दी पर बैठा हुआ था। कमरे में और कोई न था।

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‘आज महीना भर हुआ, वह जेल से भाग आया है…।’ उस अधेड़ व्यक्ति ने क हा। वेशभूषा से वह शरारती मालूम होता था।

‘हां।’ वैदराज रुके, पुनः टहलने लगे।

‘यों तो वह लड़कपन से ही सनकी-सा था, मगर जेल से भाग आने पर तो वह पूरा सनकी हो गया है। उसका दिमाग एकदम खराब हो गया है। न किसी से ठीक से बोलता है, न किसी बात का उचित जवाब ही देता है।’ अधेड़ व्यक्ति ने कहा।

‘मगर जेल से भागा कैसे वह?’

‘पता नहीं भैया! कुछ भी नहीं बताता, जैसे सुनता ही नहीं कुछ। यह तो मेरा ही हौसला था, जो मैं किसी तरह छिपता-छिपाता उसे लेकर यहां आ पहुंचा हूं।’

आज से बीस साल पहले की बात तुम्हें याद है न?’ वैदराज ने उतावले स्वर में कहा और तब उसकी आंखों में बीस साल पहले की घटना साकार हो उठी।

‘बिल्कुल याद है, भैया।’ बोला वह—‘उस अंधेरी रात में तुम वर्षा में भीगते हुए एक नवजात शिशु को लेकर मेरे पास आए थे। तुमने उस शिशु के भरण-पोषण का भार मुझे सौंपा था। सभी तरह की मदद देने का वादा किया था। मैं उस शिशु का—उस अनाथ बालक का पालन-पोषण करने लगा। शिशु का नाम राज नारायण रखा गया। तुम हमेशा उसके पालन-पोषण के लिए प्रतिमास मेरे पास रुपये भेजते रहे। धीरे-धीरे वह बड़ा हुआ। स्कूल और, फिर कॉलेज में भरती हुआ। बड़ी तीव्र बुद्धि थी उसकी मगर सनकी-सा था वह।’

‘मैं देखता हूं कि तुम उस बीती हुई घटना को बिल्कुल भूल नहीं सके हो, मगर देखना-भूलकर भी उस पर रहस्य प्रकट न हो वह यह कभी न जानने पाए कि तुम उसके पिता नहीं हो।’ वैदाराज ने कहा।

‘अच्छा भैया! मैं भला उससे क्यों कुछ कहने लगा? तुम्हारे कहने ही से तो मैंने उस शिशु को मां की तरह पाला-पोसा है…।’ अधेड़ व्यक्ति कुछ रुककर पुनः कहने लगा—‘मगर, क्या-से-क्या हो गया? कैसी अनहोनी घटना घटी।

कुछ षड्यन्त्रकारियों ने रेल पर डाका डाला। पुलिस की छानबीन के फलस्वरूप राज पकड़ा गया। सबूत एकदम पक्के थे। राज को आजन्म कैद की सजा हो गईं—उसी राज को, जिसे तुमने एक दिन शिशु-रूप में मुझे सौंपा था।’

‘आजन्म कैद की सजा हुई थी तो क्या?’ वैदराज ने गर्व से कहा—‘देश के लिए ही तो हुई थी, मगर सिर्फ सात महीने जेल में रहकर वह भाग आया। पता नहीं स्वतंत्रता की आग उस छोकरे के दिमाग में कहां से प्रवेश कर गईं…।’

‘यही सोचकर तो मैं हैरान हूं, भैया! पुलिस उसकी खोज में परेशान है। राज जैसा पागल इतना बड़ा डाका कैसे डाल सकता है? वह षड्यंत्रकारियों का मुखिया कैसे हो सकता है? मुझे तो विश्वास नहीं होता।’

‘तुम जानते हो न कि वह मेरा बेटा नहीं है…।’ वैदराज ने कहा।

‘जानता हूं।’

‘फिर उसे मेरे पास क्यों लाए?’

‘मगर मैं यह भी तो नहीं जानता कि वह किसका बेटा है?’ लाचार होकर उसे तुम्हारे पास लाना पड़ा, क्योंकि वह तुम्हारी धरोहर थी। उसे तुम्हें सौंपकर अब निश्चिंत हो जाना कहता है। बाज आया ऐसी धरोहर से।’ अधेड़ व्यक्ति बोला।

‘तुम सारा भेद नहीं जानते, वरना उसे यहां लेकर कभी न आते। शायद तुम भूले न होंगे, कि जब मैंने उसे तुम्हें सौंपा था, तो यह ताकीद कर दी थी कि उसे हमेशा शहर में रखना, कभी भूलकर भी इस गांव में न लाना।’

‘जाने कैसा है वह भेद?’

‘अभी उस भेद के खुलने का समय नहीं आया है। तुम्हें कल ही राज को लेकर शहर लौट जाना होगा, समझे। वहां जाकर सावधानी से रहना। वह बड़ा हो गया है, अतः मैं खर्च में वृद्धि कर दूंगा—।’ वैदराज ने कहा और जाकर गद्दी पर बैठ गए।

‘तुम जैसा कहोगे वैसा ही करूंगा, भैया।’

‘यह भी याद रखो, तुम जितना उसे सरल और सनकी समझते हो, उतना वह है नहीं। मेरा विश्वास है कि पुलिस ने उसे झूठ-मूठ नहीं फांसा है, इसलिए हमेशा निगाह चौकस रखना और यह भी ध्यान रखना कि यह लड़का मेरे लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है।’

‘परंतु यह तो अबोध बालक-जैसा है भैया!’

‘देखो, रामसिंह! तुम उसे जो कुछ भी समझो, मगर मैं निश्चयपूर्वक कह सकता हूं कि इस डाके में उसका हाथ जरूर था। वह युवक है, पढ़ा-लिखा है। जवानी के जोश में आकर बहक सकता है। उसका इस गांव में रहना ठीक नहीं, क्योंकि बड़े ठाकुर का लड़का शहर में राज के साथ ही पढ़ता था। वह राज को देखते ही पहचान लेगा। वह देखो, न जाने कहां से चला जा रहा है?’ वैदराज कहते-कहते रुक गए।

उसी समय छरहरे बदन के एक प्रतिभा-सम्पन्न खद्दर धारी युवक ने वहां प्रवेश किया।

‘कहां गये थे, राज?’ पूछा वैदराज ने।

‘कहीं नहीं, मामा! यूं ही आपके गांव में घूम रहा था।’

‘सोचा, आज पहले-पहल आपके गांव में आया हूं, थोड़ा घूम-फिर लूं। वह पीपल के पेड़ के पास वाला तालाब मुझे बहुत पसंद आया है।’ युवक सरलतापूर्वक बोला। उसकी मुखाकृति पर मुस्कान न थी, गम्भीरता थी।

‘हूं—!’ वैदराज तेज निगाह से राज को घूरते हुए बोले—‘तुम्हारी टोपी भीग कैसे गईं?’

‘ओह! यह तो पानी में गिर गईं थी, मामा! एक लड़की ने इसे पानी से निकालकर मुझे दी। क्या बताऊं, तैरना मुझे आता नहीं। तैरना जानते हुए भी वह बहाना बना गया।

वैदराज चुप रहे।

‘आपका गांव बहुत अच्छा है, मामा! अब तो कुछ दिन यहीं रहूंगा…।’ युवक राज ने कहा।

‘नहीं कल तुम्हें यहां से जाना होगा, राज! तुम भागे हुए कैदी हो। शहर में जाकर छद्म-वेश में लुक-छिपकर रहना।’ वैदराज बोले।

‘पिताजी की भी यही राय है?’

पिताजी से राज का मतलब रामसिंह से था। बेचारे युवक को क्या मालूम था कि वह उसका पिता नहीं है। वह क्या जाने कि उसकी जन्म कथा रहस्यमय है, जिसकी गुत्थी वैदराज के हाथों में है।

‘हां, कल किसी समय हम लोग यहां से चल देंगे।’ रामसिंह ने कहा।

युवक राज नारायण सिर झुकाकर बैठ गया और कुछ सोचने लगा। उसकी मुखाकृति गम्भीर हो गईं।

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