Goddess Durga Power: सृष्टि में जब-जब अधर्म बढ़ता है और असुरों का आतंक फैलता है, तब ईश्वर कोई न कोई रूप लेकर उनका नाश करते हैं। ऐसी ही एक कहानी है माँ दुर्गा और असुरों के विनाश की, जिसमें महिषासुर, रक्तबीज, और शुंभ-निशुंभ जैसे राक्षसों के अहंकार का अंत हुआ। यह कथा सिर्फ एक पौराणिक गाथा नहीं, बल्कि यह दर्शाती है कि शक्ति, धैर्य और साहस से हर अन्याय का अंत संभव है।
महिषासुर का अत्याचार और माँ दुर्गा की प्रतिज्ञा
महिषासुर एक शक्तिशाली असुर था जिसने कठोर तपस्या कर ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त किया कि कोई पुरुष उसे नहीं मार सकेगा। वरदान के अहंकार में उसने स्वर्ग पर आक्रमण कर देवताओं को पराजित कर दिया। इंद्रदेव सहित सभी देवता उससे भयभीत होकर भगवान विष्णु, शिव और ब्रह्मा के पास पहुँचे।
तब सभी देवताओं ने अपनी-अपनी शक्तियों को एकत्रित किया, जिससे दिव्य तेज उत्पन्न हुआ। उसी तेज से माँ दुर्गा प्रकट हुईं। उनका सौंदर्य अनुपम था, परंतु उनका रूप अत्यंत तेजस्वी और शक्तिशाली भी था। सभी देवताओं ने उन्हें अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए शिवजी का त्रिशूल, विष्णु का चक्र, वरुण का शंख, वायु का धनुष और अग्नि का बाण।
जब महिषासुर ने माँ दुर्गा के बारे में सुना, तो उसने विवाह प्रस्ताव भेजा। माता ने हँसकर कहा, ‘अगर तुम मुझसे विवाह करना चाहते हो, तो पहले युद्ध में मुझे पराजित करो।’ इस चुनौती को स्वीकार करते हुए महिषासुर और माँ दुर्गा के बीच नौ दिनों तक भयंकर युद्ध हुआ। महिषासुर बार-बार अपने रूप बदलता, कभी सिंह, कभी हाथी, और कभी विशाल भैंसा बन जाता। दसवें दिन, माँ दुर्गा ने अपना त्रिशूल महिषासुर के हृदय में भोंक दिया, जिससे उसका अंत हो गया। तभी से विजयादशमी पर असत्य पर सत्य की विजय का उत्सव मनाया जाता है।
रक्तबीज का संहार
महिषासुर के मारे जाने के बाद, अन्य असुरों ने एक और भयंकर राक्षस रक्तबीज को युद्ध के लिए बुलाया। रक्तबीज को यह वरदान प्राप्त था कि उसकी रक्त की हर बूंद से एक नया रक्तबीज जन्म लेगा।
जब माँ दुर्गा ने उस पर वार किया और उसका रक्त गिरा, तो उसकी हर बूंद से हजारों रक्तबीज उत्पन्न हो गए। असुरों की सेना बढ़ती जा रही थी।
तब माँ दुर्गा ने माँ काली को प्रकट किया। माँ काली ने विकराल रूप धारण किया और अपना विशाल मुख खोल लिया। जैसे ही माँ दुर्गा ने रक्तबीज को घायल किया, काली ने उसके रक्त को अपनी जिह्वा से पी लिया, जिससे नए रक्तबीज जन्म ही नहीं ले सके। इस तरह माँ काली ने रक्तबीज का अंत किया।
शुंभ और निशुंभ का वध
अब असुरों के राजा शुंभ और निशुंभ ने माँ दुर्गा को युद्ध के लिए ललकारा। वे माँ दुर्गा की दिव्य सुंदरता से मोहित होकर उन्हें अपने महल में ले जाना चाहते थे। उन्होंने पहले चंड और मुंड नामक असुरों को भेजा। माँ दुर्गा ने अपने काली रूप में चंड और मुंड का वध किया, जिसके कारण माँ काली को चामुंडा कहा गया। अब स्वयं शुंभ और निशुंभ युद्ध करने आए। निशुंभ पहले आगे बढ़ा, लेकिन माँ दुर्गा के प्रहार से वह धराशायी हो गया। शुंभ ने क्रोधित होकर पूरी असुर सेना को भेजा, लेकिन माँ दुर्गा ने अपनी विभिन्न शक्तियों से सभी का संहार कर दिया। अंत में शुंभ ने कहा, ‘हे देवी! तुम अकेली नहीं हो, इतनी देवियाँ तुम्हारी सहायता कर रही हैं!’ माँ दुर्गा हँसी और उत्तर दिया, ‘मैं अकेली ही हूँ, ये सभी मेरी ही शक्तियाँ हैं!’ इसके बाद माँ दुर्गा ने शुंभ पर त्रिशूल से प्रहार किया और उसका अंत कर दिया।
