Overview: कौन हैं वे 7 चिरंजीवी जिनका कभी नहीं होगा अंत?
सात चिरंजीवियों की ये कथाएँ केवल धार्मिक मान्यताएँ ही नहीं, बल्कि जीवन के गहरे संदेश भी देती हैं। भक्ति, ज्ञान, धर्म, तप, त्याग और कर्म की शक्ति। चाहे वरदान से अमर हों या श्राप से, इन सभी के जीवन में एक गहरा उद्देश्य छिपा है, जो आज भी मानवता को सत्य और धर्म के मार्ग पर चलना सिखाते हैं।
Seven Chiranjeevi: हिंदू धर्म में कुछ ऐसे दिव्य पुरुषों का उल्लेख मिलता है, जिन्हें मृत्यु का स्पर्श भी नहीं छू सकता। ये वे महान चिरंजीवी हैं, जिनके अस्तित्व को कलयुग तक अमर माना गया है। इनके नाम ना केवल पौराणिक ग्रंथों में दर्ज हैं, बल्कि इनके जीवन की कथाएँ आज भी लोगों को मार्गदर्शन, शक्ति और प्रेरणा देती हैं। कहा जाता है कि इनमें से कुछ को देवताओं ने अमरत्व का वरदान दिया, जबकि कुछ को श्राप के फलस्वरूप अमर होना पड़ा। आइए इन सात चिरंजीवियों की अद्भुत कहानियों को सरल और रोचक भाषा में समझते हैं।
ये हैं वो 7 चिरंजीवी

परशुराम: शिवभक्ति से मिला अमरत्व
भगवान विष्णु के छठे अवतार परशुराम का जन्म सतयुग में हुआ। वे अद्भुत तपस्वी और भगवान शिव के प्रबल भक्त थे। कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर महादेव ने उन्हें दिव्य फरसा और अमरता का वरदान दिया। परशुराम की कथा रामायण से लेकर महाभारत तक फैली हुई है। कहा जाता है कि वे आज भी इस पृथ्वी पर साधना में लीन हैं और आने वाले कल्कि अवतार को शस्त्रविद्या सिखाने वाले हैं।
हनुमान जी: माता सीता का अमरता वरदान
हनुमान जी जैसा पराक्रमी और भक्तिभाव से भरा चरित्र भारतीय संस्कृति में दूसरा नहीं। जब वे अशोक वाटिका में माता सीता को श्रीराम का संदेश देने पहुँचे, तब उनकी निष्ठा और भक्ति से प्रसन्न होकर माता ने उन्हें अमरत्व का वरदान दिया। हनुमान जी का उल्लेख द्वापर युग में भी मिलता है। भीम का अभिमान तोड़ने से लेकर अर्जुन के रथ की रक्षा तक। मान्यता है कि वे आज भी रामनाम के जप में लगे हुए संसार में विचरण कर रहे हैं।
राजा बलि: वामन अवतार से प्राप्त चिरंजीवत्व
महादानी राजा बलि का नाम आज भी उदाहरण के रूप में लिया जाता है। जब भगवान विष्णु वामन स्वरूप में उनसे तीन पग भूमि माँगने पहुँचे, तब बलि ने अपना सबकुछ दान कर दिया। विष्णु जी ने दो पग में समस्त लोकों को नाप लिया और तीसरा पग बलि के समर्पण में उनके सिर पर रखा। उनके त्याग और दानशीलता से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें पाताल लोक का स्वामी बनाया और अमरता प्रदान की। माना जाता है कि राजा बलि आज भी वहीं निवास कर रहे हैं।
अश्वत्थामा: श्राप से मिला अमरत्व
महाभारत के युद्ध में द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा भी एक चिरंजीवी माने जाते हैं, लेकिन उनका अमरत्व वरदान नहीं बल्कि श्राप का परिणाम है। पिता की मृत्यु का प्रतिशोध लेने की लालसा में उन्होंने पांडवों के सोते हुए पुत्रों का वध किया। इस पापकर्म के बाद श्रीकृष्ण ने उन्हें भयंकर श्राप दिया कि वे युगों-युगों तक घायल शरीर के साथ पृथ्वी पर भटकते रहेंगे। माना जाता है कि अश्वत्थामा आज भी अकेलेपन और पीड़ा के साथ इस श्राप का भोग कर रहे हैं।
महर्षि वेदव्यास: ज्ञान के अमर स्तंभ
वेद, पुराण और महाभारत जैसी महान रचनाएँ जिस दिव्य ऋषि ने दुनिया को दीं, वे हैं महर्षि वेदव्यास। ज्ञान, तप और आध्यात्म की शक्ति से परिपूर्ण वेदव्यास को भी अमरता का वरदान प्राप्त है। उनकी रचनाएँ आज भी धर्म, नीति और अध्यात्म का आधार मानी जाती हैं। मान्यता है कि वे आज भी हिमालय के किसी दिव्य प्रदेश में ध्यानमग्न हैं।
कृपाचार्य: तप से प्राप्त अमरता
महाभारत काल के प्रख्यात ऋषि कृपाचार्य कौरवों और पांडवों दोनों के गुरु माने जाते हैं। युद्ध कौशल और धर्मशास्त्र के ज्ञाता कृपाचार्य ने महाभारत युद्ध में कौरवों का साथ दिया। उनकी कठोर तपस्या और संत जीवन से प्रसन्न होकर देवताओं ने उन्हें अमरत्व प्रदान किया। ऐसा कहा जाता है कि आज भी वे पृथ्वी पर जीवित हैं और सत्संग तथा तप में लीन रहते हैं।
विभीषण: धर्म के मार्ग पर अमरत्व का वरदान
रावण के छोटे भाई विभीषण ने धर्म के लिए अपने ही कुल के विरुद्ध जाना चुना और भगवान राम का साथ दिया। उनकी न्यायप्रियता और भक्ति से प्रसन्न होकर श्रीराम ने लंका का राज्य उन्हें सौंपा और दीर्घायु व अमरता का वरदान दिया। कहा जाता है कि विभीषण आज भी धर्म की रक्षा हेतु इस लोक में मौजूद हैं।
