Geeta Gyan: महाभारत युद्ध में बिना अस्त्र-शस्त्र उठाए भी भगवान श्रीकृष्ण की अहम भूमिका रही। द्वापर युग के दौरान श्रीकृष्ण ने पांडवों को कलयुग से जुड़ी ऐसी बातें बताई थीं, जोकि आज पूरी तरह से सच साबित हो रही हैं। महाभारत युद्ध के दौरान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्म, अर्थ और जीवन से जुड़ा अद्भुत ज्ञान दिया, जिसे हम सभी गीता ज्ञान या गीता उपदेश के नाम से जानते हैं। आइए जानते हैं उन बातों के बारे में जो श्रीकृष्ण ने द्वापर युग के अंत में बताई थी और आज शत प्रतिशत सच साबित हो रही हैं।
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥4-7॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥4-8॥
यह श्लोक गीता के अध्याय 6 के श्लोक 7 और 8 में आता है, जिसका अर्थ है- हे भारत! जब- जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होगी तब तब मैं लोगों के सम्मुख अपना रूप रचता हूं। सज्जन की रक्षा के लिए, दुष्टों के विनाश के लिए, धर्म की स्थापना के लिए मैं आता हूं और युग-युग में जन्म लेता हूं।
कलयुग को लेकर भगवत गीता में श्रीकृष्ण ने कही से बातें

ततश्चानुदिनं धर्मः सत्यं शौचं क्षमा दया।
कालेन बलिना राजन् नङ्क्ष्यत्यायुर्बलं स्मृतिः॥
इसका अर्थ है कि- कलियुग में अर्थ, धर्म, सत्यवादिता, स्वच्छता, सहिष्णुता, दया, जीवन की अवधि, शारीरिक शक्ति और स्मृति ये सभी चीजें धीरे-धीरे कम होती जाएंगी। अगर आप ध्यान से इन बातों पर गौर करेंगे तो पाएंगे कि श्रीकृष्ण की ये बातें आज पूरी तरह से सच हो रही है।

वित्तमेव कलौ नॄणां जन्माचारगुणोदयः।
धर्मन्याय व्यवस्थायां कारणं बलमेव हि॥
अर्थ है कि- कलयुग में जिस व्यक्ति के पास जितना अधिक धन होगा वह उतना ही गुणी माना जाएगा। धर्म, कानून और न्याय व्यवस्था भी ऐसे लोगों के पक्ष में होंगे।
दाम्पत्येऽभिरुचिर्हेतुः मायैव व्यावहारिके।
स्त्रीत्वे पुंस्त्वे च हि रतिः विप्रत्वे सूत्रमेव हि॥
अर्थ है कि- कलयुग में पुरुष और स्त्री बिना विवाह के ही एक दूसरे साथ पति-पत्नी की तरह रहेंगे। यह बात भी पूरी तरह से सच है, जिसे आज हम लिविंग रिलेशनशिप के तौर पर देख रहे हैं।
लिङ्गं एवाश्रमख्यातौ अन्योन्यापत्ति कारणम्।
अवृत्त्या न्यायदौर्बल्यं पाण्डित्ये चापलं वचः॥
इस श्लोक के अर्थ क अनुसार- जो व्यक्ति किसी वस्तु या कार्य के लिए धन खर्च करने में असमर्थ होगा, उसे उचित न्याय नहीं मिलेगा। वहीं जो चतुर और स्वार्थी होगा वही कलयुग विद्वान माना जाएगा।

दूरे वार्ययनं तीर्थं लावण्यं केशधारणम्।
उदरंभरता स्वार्थः सत्यत्वे धार्ष्ट्यमेव हि॥
इस श्लोक का अर्थ है कि- लोग दूर के नदी और तालाबों को तो ही तीर्थ मान लेंगे, लेकिन अपने माता-पिता की निंदा करेंगे। इस युग में सिर्प पेट भरना ही लोगों का अहम लक्ष्य होगा।
अनावृष्ट्या विनङ्क्ष्यन्ति दुर्भिक्षकरपीडिताः।
शीतवातातपप्रावृड् हिमैरन्योन्यतः प्रजाः॥
इस श्लोक के मुताबिक- कलयुग में बारिश न के बराबर होगी, जिससे सूखा पड़ जाएगा। लोग कभी कड़ाके की सर्दी तो कभी भीषण गर्मी से परेशान रहेंगे। कभी आंधी आएगी तो कभी बाढ़ आ जाएगी। इन जलवायु परिवर्तन के कारण धीरे-धीरे लोग नष्ट हो जाएंगे।
अनाढ्यतैव असाधुत्वे साधुत्वे दंभ एव तु।
स्वीकार एव चोद्वाहे स्नानमेव प्रसाधनम्॥
श्लोक का अर्थ है कि- कलयुग में जिस व्यक्ति के पास धन नहीं होगा वही अधर्मी, अपवित्र और बेकार माना जाएगा। विवाह का पवित्र बंधन तो केवल दो लोगों के बीच एक समझौते की तरह होगा। स्नान करके ही लोग स्वयं को ऐसा समझेंगे कि वो अंतरात्मा से शुद्ध हो गए।
