Overview: प्यूबर्टी में गर्ल्स को होती हैं ये समस्याएं, पेरेंट्स ना करें पैनिक
प्यूबर्टी के दौरान लड़कियों को शारीरिक बदलाव, मुंहासे और बॉडी इमेज से जुड़ी समस्याएं होती हैं। ऐसे में पेरेंट्स बच्चों का बनें सपोर्ट सिस्टम।
Puberty Problems in Girls: प्यूबर्टी एक ऐसा समय है जो बच्चों और उनके माता-पिता के लिए कई चुनौतियां लाता है। इस दौरान होने वाले शारीरिक और भावनात्मक बदलाव टीनेजर्स को भ्रमित कर सकते हैं, लेकिन प्यार और समर्थन से इस प्रक्रिया को आसान बनाया जा सकता है। प्यूबर्टी को समझना और उसकी चुनौतियों से निपटने के लिए तैयार रहना महत्वपूर्ण है। लेकिन कई बार बच्चों में आ रहे बदलाव खासतौर पर गर्ल्स को समझना और उन्हें हैंडल करना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में पेरेंट्स का पैनिक होना स्वाभाविक है। प्यूबर्टी के दौरान लड़कियों को किन समस्याओं का सामना करना पड़ता है और पेरेंट्स को इस दौरान क्या करना चाहिए चलिए जानते हैं इसके बारे में।
प्यूबर्टी के लक्षण

हर व्यक्ति का विकास अपनी गति से होता है। आमतौर पर, लड़कियों में प्यूबर्टी 8 साल की उम्र से शुरू हो सकती है, हालांकि कुछ में यह पहले या बाद में भी हो सकता है। इस दौरान होने वाले बदलाव तेजी से या धीरे-धीरे हो सकते हैं। प्यूबर्टी के प्रमुख लक्षणों में शामिल हैं:
– स्तनों का विकास
– पसीने के पैटर्न में बदलाव
– शरीर से गंध
– मुंहासे
– प्यूबिक और अंडरआर्म बालों का बढ़ना
– पहला मासिक धर्म
– लंबाई में वृद्धि
– कूल्हों का चौड़ा होना
– कमर का पतला होना
बॉडी इमेज से जुड़ी समस्याएं
हर टीनेजर प्यूबर्टी को अलग-अलग तरीके से अनुभव करता है। कुछ को बड़े दिखने की खुशी होती है, जबकि अन्य अपनी शारीरिक छवि को लेकर असुरक्षित महसूस करती हैं, खासकर अगर वे अपने साथियों से पहले या बाद में विकसित होती हैं। शोध बताते हैं कि जल्दी प्यूबर्टी का अनुभव करने वाली लड़कियों में चिंता और नकारात्मक शारीरिक छवि का स्तर अधिक होता है।
वजन: प्यूबर्टी के दौरान वजन बढ़ना सामान्य है, लेकिन समाज के दबाव में यंगर्स्टस असुरक्षित महसूस करते हैं।
स्तन का आकार: पतलेपन या बड़े स्तनों का दबाव शारीरिक छवि को प्रभावित करता है। जल्दी परिपक्व होने वाली लड़कियां इस दबाव को अधिक महसूस करती हैं।
मानसिक स्वास्थ्य: नकारात्मक शारीरिक छवि से अवसाद, सामाजिक वापसी और खाने के विकार जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
शारीरिक बदलाव से डर

प्यूबर्टी के दौरान हार्मोनल बदलाव कई समस्याओं का कारण बनते हैं। ये बदलाव भावनाओं, मुंहासों और शरीर की गंध को प्रभावित करते हैं। शरीर में होने वाले ये बदलाव बच्चों को चिड़चिड़ा और गुस्सैल बना देते हैं। कई बार चेहरे पर निकलने वाले मुहांसे और अनचाहे बाल बच्चों का आत्मविश्वास भी कम कर देते हैं। बच्चों में होने वाले ये बदलाव बच्चे में डर की भावना विकसित कर सकते हैं। ऐसे में पेरेंट्स को अनके गुस्से और चिड़चिड़ेपन को समझना चाहिए न कि उनपर गुस्सा करना चाहिए।
शारीरिक और भावनात्मक प्रभाव
जल्दी मासिक धर्म केवल पीरियड्स की शुरुआत नहीं है, बल्कि इसके दीर्घकालिक प्रभाव भी हो सकते हैं। 12 साल से पहले मासिक धर्म शुरू होने वाली लड़कियों में अवसाद, चिंता और नशीले पदार्थों के उपयोग का जोखिम अधिक होता है। शारीरिक रूप से, इससे वयस्कता में छोटा कद और मेटाबोलिक सिंड्रोम, हृदय रोग और स्तन कैंसर का खतरा बढ़ सकता है।
पेरेंट्स क्या करें
खुला संवाद: आश्वासन और मासिक धर्म की शिक्षा महत्वपूर्ण है। पहले पीरियड्स से कई लड़कियां डर जाती हैं। माताओं को इसे सामान्य प्रक्रिया के रूप में समझाना चाहिए।
पर्सनल हाइजीन: पेरेंट्स बच्चे को हर चार से छह घंटे में पैड बदलने, रोज नहाने और सुगंधित उत्पादों से बचने की शिक्षा दें। मासिक धर्म को अशुद्ध न मानें।
बनें सपोर्ट: समर्थनकारी पेरेंटिंग से लड़कियों का आत्मविश्वास बढ़ता है। बातचीत और तैयारी से शुरुआत करें।
मुंहासे से बचाएं: अगर मुंहासे बेकाबू हो जाएं और सामान्य क्लींजर या दवाएं काम न करें, तो त्वचा विशेषज्ञ से सलाह लें। अनियंत्रित मुंहासे चिंता और कम आत्मसम्मान का कारण बन सकते हैं।
शारीरिक गंध का निवारण : इस दौरान अंडरआर्म में पसीना और शरीर की गंध बढ़ सकती है। डियोड्रेंट का उपयोग शुरू करना और नियमित रूप से नहाने की सलाह दें।
बढ़ाएं आत्मविश्वास: माता-पिता को चाहिए कि वे अपनी बेटी की शारीरिक बनावट के बजाय उनके चरित्र, दयालुता और मेहनत जैसे गुणों पर ध्यान दें। आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए उनकी शारीरिक क्षमताओं की सराहना करें।
