Overview:उम्र से पहले बड़े होने लगे हैं बच्चे – कारण, खतरे और बचाव
आजकल भारत में बच्चे उम्र से 2-3 साल पहले प्यूबर्टी के लक्षण दिखाने लगे हैं। मोटापा, केमिकल युक्त खाना, स्क्रीन टाइम और तनाव इसके बड़े कारण हैं, जो बच्चों की शारीरिक-मानसिक सेहत पर गहरा असर डाल रहे हैं।
Precocious Puberty in Indian Children: आज के दौर में अगर आपकी 6-7 साल की बेटी में अचानक ब्रेस्ट डेवलपमेंट दिख रहा है या 8 साल का बेटा बॉडी ओडर और मुहांसे आने की शिकायत कर रहा है, तो यह सामान्य नहीं है। डॉक्टर इसे “प्रिकॉशियस प्यूबर्टी” कहते हैं – यानी उम्र से बहुत पहले प्यूबर्टी का आना। पहले यह दुर्लभ बीमारी मानी जाती थी, लेकिन अब दिल्ली-NCR के बड़े हॉस्पिटल्स में हर महीने दर्जनों नए केस आ रहे हैं। डॉ. पूनम सिदाना (सीके बिड़ला हॉस्पिटल) और डॉ. मेधा (मधुकर रेनबो चिल्ड्रेन हॉस्पिटल) दोनों मानती हैं कि यह अब महज जेनेटिक समस्या नहीं, बल्कि हमारी बदलती जीवनशैली का खतरनाक नतीजा है।
जल्दी प्यूबर्टी के पीछे छिपे आधुनिक कारण

मोटापा सबसे बड़ा ट्रिगर है – फैट सेल्स एस्ट्रोजन बनाती हैं, जिससे लड़कियों में प्यूबर्टी जल्दी शुरू होती है। प्रोसेस्ड फूड, प्लास्टिक की बोतलें, कॉस्मेटिक्स और यहां तक कि रसीद का कागज भी एंडोक्राइन डिसरप्टर्स (BPA, फ्थैलेट्स) से भरे हैं जो हार्मोन को बिगाड़ते हैं। रात में मोबाइल-टीवी की नीली रोशनी मेलाटोनिन हार्मोन दबाती है, जिससे प्यूबर्टी का “ऑफ स्विच” समय से पहले खुल जाता है। पढ़ाई का दबाव, सोशल मीडिया और कम नींद मिलकर कोर्टिसोल बढ़ाते हैं, जो फिर हार्मोनल बदलाव को तेज़ करते हैं। डॉ. मेधा कहती हैं, “आज का बच्चा बाहर खेलता नहीं, बस स्क्रीन के सामने बैठा रहता है – यही सबसे बड़ा बदलाव है।”
आगे के खतरे और तुरंत क्या करें
जल्दी प्यूबर्टी से कद जल्दी बढ़ता है, लेकिन हड्डियां जल्दी बंद हो जाती हैं – मतलब बच्चा बड़ा तो जल्दी दिखता है, लेकिन बाद में औसत से छोटा रह सकता है। लड़कियों में आगे चलकर पीसीओएस, डायबिटीज़, ब्रेस्ट कैंसर और एंडोमेट्रियल कैंसर का खतरा बढ़ जाता है। मानसिक रूप से बच्चा अपने दोस्तों से अलग महसूस करता है, बॉडी इमेज की चिंता, डिप्रेशन और कम आत्मविश्वास की शिकायत आम है। माता-पिता सतर्क रहें – अगर लड़की में 8 साल से पहले और लड़के में 9 साल से पहले कोई भी लक्षण (ब्रेस्ट बड्स, प्यूबिक हेयर, तेज़ हाइट बढ़ना, बॉडी ओडर) दिखे तो तुरंत पीडियाट्रिक एंडोक्राइनोलॉजिस्ट से मिलें। घर में प्लास्टिक की बजाय स्टील-कांच के बर्तन, ऑर्गेनिक खाना, रोज़ 1 घंटा खेल-कूद और 9-10 घंटे की नींद – ये छोटे बदलाव बड़े खतरे को रोक सकते हैं। समय रहते ध्यान दें, ताकि आपका बच्चा बचपन भी पूरा जी सके और बड़ा होकर स्वस्थ रहे।
Inputs by –डॉ. पूनम सिदाना, डायरेक्टर – नियोनेटोलॉजी और पीडियाट्रिक्स, सीके बिड़ला हॉस्पिटल®, दिल्ली
Inputs by- डॉ. मेधा – पीडियाट्रिशन, मधुकर रेनबो चिल्ड्रेन हॉस्पिटल, दिल्ली
