मां सिर्फ एक अक्षर का छोटा सा शब्द नहीं है, मां तो पूरी एक संस्कृति और भावनाओं के पुंज का नाम है। मुझे क्या उन सबको ही जो मध्यम वर्ग के परिवारों से आए हैं, अपने बचपन के वे दिन याद होंगे, जब सुबह मुंह अंधेरे ही, जाने कब हमारे उठने से पहले ही मां रसोई की तैयारी में लग जाती थी। लकड़ी के चूल्हे या कोयले या बुरादे वाली अंगीठी को बड़े ही जतन से सुलगाती थी। आंखें धुएं से कड़ुवाने लगती थीं, लेकिन पिताजी के काम पर जाने से पहले, कब नाश्ता और दोपहर का खाना बन कर तैयार हो जाता था, पता ही नहीं चल पाता था। हम भाई बहनों की खींचातानी, छोटे-मोटे झगड़ों को वह ऐसे चुटकियों में सुलझा देती थीं, कि किसी को पता ही नहीं चलता था। हम बच्चों की छोटी-मोटी शैतानियों पर इस तरह पर्दा डालती थी कि बाहर वालों की बात क्या घर में दादा-दादी तक भी बात नहीं पहुंच पाती थी। निश्चय ही समय के साथ-साथ सुविधाएं बढ़ी, चूल्हे अंगीठी की जगह गैस कुकर और आधुनिक रसोई के संसाधन आ गए, लेकिन सच यह है कि मां की भूमिका में कोई विशेष बदलाव नहीं आया। अब आर्थिक दबावों के चलते जॉब करना और जॉब पर जाने से पहले किसी ना किसी तरह नाश्ता, लंच, स्कूलिंग प्रॉब्लम्स, बच्चों को संभालना यह सब उसकी जिम्मेदारियों में शामिल हो गए। बाहर से बेशक मां की तस्वीर बदली हो, लेकिन अंदर से उस पर भार और बढ़ गया। लेकिन वह मां है, वह सब कुछ संभालना ही नहीं बल्कि अच्छे से संभालना जानती है। आईये मां को समर्पित मदर्स डे, अर्थात मातृ दिवस, जो इसी मई माह में 9 तारीख को मनाया जाने वाला है, इस अवसर पर मां के बारे में ही विस्तार से कुछ बातें करते हैं।

मदर्स डे अर्थात मां को समर्पित एक दिन

इधर पिछले कुछ वर्षों से जिस मदर्स डे को मनाने की परंपरा ने पश्चिम से प्रवेश कर भारत के  युवा वर्ग पर अच्छा-खासा प्रभाव डाला है, माना जाता है कि इस मदर्स डे का प्रारंभ, एक अमेरिकन एक्टिविस्ट एना जारविस ने सन उन्नीस सौ आठ में ‘सेकंड संडे (मई माह का दूसरा रविवार) के रूप में किया। जीवन भर अविवाहित रही जारविस ने अपनी मां के गुजर जाने के बाद, उनके प्रति प्यार जताने के लिए इसकी शुरुआत की थी। 9 मई 1914 को अमेरिकी राष्ट्रपति वुड्रो विल्सन ने एक कानून पास कर इसकी घोषणा भी कर दी। अब यह प्रतिवर्ष मई के दूसरे रविवार को मनाया जाता है। व्यवसायिक कंपनियों ने वैलेंटाइन डे जैसे अन्य दिनों के समान अपने व्यवसायिक हितों के लिए इसे प्रोत्साहित भी खूब किया है, लेकिन सच यह है कि मां को सम्मानित करने की ही नहीं, मातृ पूजन की परंपरा भी संपूर्ण विश्व के देशों में, किसी न किसी रूप में प्राचीन काल से ही चली आ रही है।

विश्व में मां के पूजन की परंपरा

प्राचीन ग्रीस में मातृ पूजा का प्रारंभ ग्रीक देवताओं की मां साईं बेली के सम्मान में साइबेली उत्सव के रूप में आयोजित किया जाता था। वह आज भी मार्च के महीने में 15 से 18 मार्च के मध्य आयोजित किया जाता है। यूरोप में मदरिंग संडे और कैथोलिक कैलेंडर में लाईटेरी संडे को वर्जिन मैरी के सम्मान में मनाने की परंपरा है। अरब देशों में इस परंपरा को मुस्तफा अमीन ने इजिप्ट में शुरू किया। यह 21 मार्च को आयोजित किया जाता है। अफगानिस्तान में यह उत्सव जून में तथा आस्ट्रेलिया, ब्राजील एवं बांग्लादेश में मई में आयोजित किया जाता है। नेपाल में मातृतीर्थ पखवारे का आयोजन होता है और संपूर्ण भारतवर्ष में वर्ष में दो बार नवरात्रि पूजन (अक्टूबर एवं अप्रैल माह) वस्तुत: मातृ पूजन की परंपरा का ही सुनियोजित रूप है। संपूर्ण विश्व के देशो में मां का सम्मान किया जाता है, मां ने सदैव ही निर्माण एवं उन्नयन में सकारात्मक भूमिका निभाई है और अपनी असीम सहनशीलता, अपार संघर्ष क्षमता एवं अभूतपूर्व साहस का परिचय दिया है।

भारत और मां

भारत की बात करें तो मां के रूप में पौराणिक चरित्र देवी दुर्गा ने विश्व के संकट को महिषासुर का नाश करके दूर किया। पूर्व रामायण काल में शकुंतला ने जिस प्रकार दुष्यंत के तिरस्कार को साहस के साथ सहनकर भरत का पालन पोषण किया उसकी तुलना में कोई भी पुरुष चरित्र ढूंढने से नहीं मिलता और लगभग यही स्थिति रामायण की नायिका मां सीता की भी है, जिन्होंने 14 वर्ष का वनवास, लोकनिंदा और पति की भीरुता के   à¤ªà¥à¤°à¤¤à¥à¤¯à¥à¤¤à¥à¤¤à¤° में न केवल वन में जाकर रहना तथा लव-कुश को जन्म देना स्वीकार किया, वरन उन्हें इस योग्य भी बनाया कि वे श्री राम जैसे योद्धा का सामना कर सकें।

मदर टेरेसा

त्याग एवं प्रेम की मूर्ति के रूप में मदर टेरेसा इस आधुनिक युग में ऐसी मां के रूप में स्थापित हो चुकी हैं, जिनके स्वरूप में करुणा ही करुणा है। 26 अगस्त सन 1910 को Aenxha Bojaxhiv in skopje à¤®à¥‡à¤‚ जन्मी मदर टेरेसा को 12 वर्ष की उम्र में ही यह महसूस होने लगा था कि ईश्वर की पुकार उन्हें बुला रही है और उनका कार्यक्षेत्र कुछ और ही है। 18 वर्ष की उम्र में उन्होंने मानव सेवा की राह में घर छोड़ दिया। भारत में उन्होंने आईरिश समुदाय की ननों के एक संगठन सिस्टर्स आफ लोरेंटो के साथ काम करना प्रारंभ किया। सन 1931 से 1948 तक कोलकाता में उन्होंने सेंट मेरी स्कूल में अध्यापन कार्य किया और उसके बाद मानवता की सेवा के लिए उन्होंने नौकरी से इस्तीफा दे दिया। उन्हें लगा कि शक्षा संभवत: सबसे महत्वपूर्ण सेवा प्रकल्प है, अत: उन्होंने झुग्गी-झोपड़ी के बच्चों के लिए एक स्कूल की स्थापना की। फंड की कमी की वजह से स्कूल खुले आकाश के नीचे चलने लगा, लेकिन बाद में साधन संपन्न लोगों ने इसके लिए धन जुटा दिया।

सन 1950 में मदर टेरेसा ने मिशनरीज आफ चैरिटी की स्थापना की। इस संस्था के माध्यम से साधनहीन एवं निराश्रितों को स्वेह, सुरक्षा और संरक्षण देने के लक्ष्य को ही मदर टेरेसा ने अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया। सन 1990 तक इस संस्था से विश्व के 1 करोड़ से अधिक कार्यकर्ता जुड़ चुके थे। इस संस्था का कार्य क्षेत्र 40 से अधिक देशों तक फैल चुका था। बाढ़, भूकंप और अकाल जैसी प्राकृतिक आपदाओं के समय इस संस्था ने सेवा के नए कीर्तिमान स्थापित किए। मदर टेरेसा की इस सेवा भावना का सम्मान करते हुए, सन 1970 में उन्हें शांति पुरस्कार, सन 1972 में नेहरू पुरस्कार और सन 1979 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। शांति, प्रेम, करुणा, सेवा और सहज वात्सल्य की देवी मदर टेरेसा ने 5 सितंबर सन 1997 को इस संसार में अंतिम सांस ली, लेकिन वे जीवन भर मां शब्द की सार्थकता का निर्वाह करती रहीं।

श्री मां

के नाम से विख्यात श्री अरविंद सोसाइटी के पांडिचेरी आश्रम को वास्तव में एक आध्यात्मिक केंद्र बनाने वाली मीरा एईफासा का जन्म सन 1878 में पेरिस में हुआ था। सिद्धहस्थ पियानोवादक, कुशल चित्रकार, मौलिक लेखक,  तंत्र विज्ञान एवं आत्मिक विकास में गहन रुचि रखने वाली, मीरा सन 1914 में 36 वर्ष की उम्र में पहली बार जब पांडिचेरी आकर श्री अरविंद से मिलीं तो उन्हें महसूस हुआ मानो श्री अरविंद ही वह मानस दिशा निर्देशक थे, जो परोक्ष रूप से उन्हें चिंतन एवं दर्शन की गूढ़ गहरी घाटियों में उंगली पकड़कर ले जाते थे और मार्ग को प्रकाशित करते थे। वे उनके सानिध्य में 11 माह तक रहीं और फिर वापस चली गईं, 6 वर्ष बाद पुन: पांडिचेरी वापस आईं और अपना शेष जीवन अरविंद दर्शन को ही समर्पित कर दिया। सन 1926 में जब आश्रम पूर्ण रूप से बनकर तैयार हुआ, तो उसका संपूर्ण भाग श्री मां को ही सौंप दिया गया। अगले 50 वर्षों में उन्होंने आश्रम को एक प्रतिष्ठित आध्यात्मिक समुदाय के रूप में स्थापित कर डाला। सन 1952 में उन्होंने अरविंद इंटरनेशनल सेंटर की स्थापना की और सन 1968 में इसे इंटरनेशनल टाउनशिप के रूप में विकसित कर दिया। 17 नवंबर सन 1973 को श्री अरविंद दर्शन एवं अपने मौलिक चिंतन से विश्व को मानसिक शांति और सफलता की राह दिखाने वाली इस ज्योतिपुंज का देहांत हो गया।

मदर मैंरी 

विश्व स्तर पर मां के नाम से विख्यात तीसरा महत्वपूर्ण नाम जीसस की मां एवं मदर आफ चर्च, मदर मैरी को माना जाता है। मान्यता है कि वे कुंवारी थीं और ईश्वर की इच्छा से उन्होंने जीसस क्राइस्ट को जन्म दिया। संपूर्ण विश्व में जहां-जहां ईसाई धर्म की मान्यता है, वहां चर्चों में मदर मैरी की करुणा एवं दया बरसाती प्रतिमाएं श्रद्धा का केंद्र हैं।

साहित्य में भी मिला है मां को स्थान

मां को साहित्य में भी पूर्ण स्थान मिला। रूसी उपन्यासकार गोर्की का ‘मां शीर्षक से लिखा गया उपन्यास विश्व साहित्य की निधि माना जाती है। विश्व स्तर पर हॉलीवुड की फिल्मों की बात करें, तो मां की भूमिका के विविध आयाम पर केंद्रित इरिन वॉकविच, द इंक्रेडिबल्स, मिसेज मिनीवर, स्टेप मॉम, साउंड ऑफ म्यूजिक, माय बिग फैट ग्रीक वेडिंग, प्लीज डोंट ईट द डायसिस, चॉकलेट, विह्पइट और डिवाइन सिक्रेटस ऑफ द या -या सिस्टर हुड और हाल ही में प्रदर्शित मामस मूवीस का उल्लेख बार-बार किया जाता है।

फिल्मो में माँ का किरदार 

बॉलीवुड ने भी इस किरदार को अनदेखा नहीं किया है। औरत का रीमेक महबूब खान की मदर इंडिया एक नारी के मां के रूप को जिस प्रकार और जिस पूर्णता के साथ प्रदर्शित करती है, उसी ने इसे भारत की 10 सुपरहिट क्लासिक्स में स्थान दिलवाया है। हजार चौरासी की मां, ममता, दादी मां वे अन्य महत्वपूर्ण फिल्में हैं जिनमें मां की भूमिका ही केंद्र में रही और अगर फिल्मों में मां की भूमिका के निर्वाह की बात की जाए तो मुगलेआज़म में सलीम की मां जोधा बाई की भूमिका में दुर्गा खोटे, मदर इंडिया की केंद्रीय भूमिका में नरगिस, 50 से अधिक फिल्मों में क्रूर सास एवं ममतामई मां की भूमिका की पर्याय ललिता पवार, लीला मिश्रा, लीला चिटनिस और मनोज कुमार की फिल्मी मां कामिनी कौशल ने तो इतिहास रचा ही है, लेकिन ‘खूबसूरत की नियम कायदे की पाबन्द दीना पाठक, दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे की लविंग मां फरीदा जलाल, कर्मा की देशभक्त मां नूतन, त्रिशूल की बेबस मां वहीदा रहमान, आराधना की अपने बेटों को पूर्णतया समर्पित मां शर्मिला टैगोर, मैंने प्यार किया की प्यारी मां रीमा लागू और बागवान की तेजतर्रार मां हेमा मालिनी ने भी मां की भूमिकाओं में जान डालने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है।

छोटे पर्दे की मेघा मलिक (अम्माजी- ना आना इस देश लाडो) और सुरेखा सीकरी (दादी सा- बालिका वधू) भी कुछ कम नहीं बैठतीं। मां का चरित्र इतनी विशेषताओं को समेटे हुए हैं कि इसने हरेक लेखकों, चित्रकारों और इतिहास को प्रभावित किया है, फिर भी दुनिया के इस सबसे पवित्र रिश्ते को शब्दों, सेल्यूलाइड या कैनवास समेटना कठिन ही है। इस कारण सिर्फ इतना कह कर बात को समाप्त करना पड़ेगा कि ‘मां शब्द का विश्लेषण सिर्फ मां ही हो सकता है या इसे मां के हृदय में उतर कर ही समझा जा सकता है। सचमुच एक संपूर्ण संसार का नाम है

यह भी पढ़ें- à¤˜à¤° में आती है बहुत ज्यादा धूल तो ये हैक्स करेंगे सफाई में मददसिर्फ एक अक्षर का छोटा सा

शब्द नहीं है, मां तो पूरी एक
संस्कृति और भावनाओं के पुंज
का नाम है। मुझे क्या उन सबको ही जो मध्यम
वर्ग के परिवारों से आए हैं, अपने बचपन के वे
दिन याद होंगे, जब सुबह मुंह अंधेरे ही, जाने
कब हमारे उठने से पहले ही मां रसोई की तैयारी
में लग जाती थी। लकड़ी के चूल्हे या कोयले या
बुरादे वाली अंगीठी को बड़े ही जतन से
सुलगाती थी। आंखें धुएं से कड़ुवाने लगती थीं,
लेकिन पिताजी के काम पर जाने से पहले, कब
नाश्ता और दोपहर का खाना बन कर तैयार हो
जाता था, पता ही नहीं चल पाता था।
हम भाई बहनों की खींचातानी, छोटे-मोटे
झगड़ों को वह ऐसे चुटकियों में सुलझा देती थीं,
कि किसी को पता ही नहीं चलता था। हम
बच्चों की छोटी-मोटी शैतानियों पर इस तरह
पर्दा डालती थी कि बाहर वालों की बात क्या घर
में दादा-दादी तक भी बात नहीं पहुंच पाती थी।
निश्चय ही समय के साथ-साथ सुविधाएं बढ़ी,
चूल्हे अंगीठी की जगह गैस कुकर और
आधुनिक रसोई के संसाधन आ गए, लेकिन सच
यह है कि मां की भूमिका में कोई विशेष बदलाव
नहीं आया। अब आर्थिक दबावों के चलते जॉब
करना और जॉब पर जाने से पहले किसी ना
किसी तरह नाश्ता, लंच, स्कूलिंग प्रॉब्लम्स,
बच्चों को संभालना यह सब उसकी जिम्मेदारियों
में शामिल हो गए। बाहर से बेशक मां की तस्वीर
बदली हो, लेकिन अंदर से उस पर भार और बढ़
गया। लेकिन वह मां है, वह सब कुछ संभालना
ही नहीं बल्कि अच्छे से संभालना जानती है।
आईये मां को समर्पित मदर्स डे, अर्थात मातृ
दिवस, जो इसी मई माह में 9 तारीख को मनाया
जाने वाला है, इस अवसर पर मां के बारे में ही
विस्तार से कुछ बातें करते हैं।
मदर्स डे अर्थात मां को समर्पित एक दिन
इधर पिछले कुछ वर्षों से जिस मदर्स डे को
मनाने की परंपरा ने पश्चिम से प्रवेश कर भारत के 
युवा वर्ग पर अच्छा-खासा प्रभाव डाला है, माना
जाता है कि इस मदर्स डे का प्रारंभ, एक
अमेरिकन एक्टिविस्ट एना जारविस ने सन उन्नीस
सौ आठ में ‘सेकंड à¤¸à¤‚à¤¡à¥‡Ó (मई माह का दूसरा
रविवार) के रूप में किया। जीवन भर
अविवाहित रही जारविस ने अपनी मां के गुजर
जाने के बाद, उनके प्रति प्यार जताने के लिए
इसकी शुरुआत की थी।
9 मई 1914 को अमेरिकी राष्ट्रपति वुड्रो
विल्सन ने एक कानून पास कर इसकी घोषणा
भी कर दी। अब यह प्रतिवर्ष मई के दूसरे
रविवार को मनाया जाता है।
व्यवसायिक कंपनियों ने वैलेंटाइन डे जैसे
अन्य दिनों के समान अपने व्यवसायिक हितों के
लिए इसे प्रोत्साहित भी खूब किया है, लेकिन
सच यह है कि मां को सम्मानित करने की ही
नहीं, मातृ पूजन की परंपरा भी संपूर्ण विश्व के
देशों में, किसी न किसी रूप में प्राचीन काल से
ही चली आ रही है।
विश्व में मां के पूजन की परंपरा
प्राचीन ग्रीस में मातृ पूजा का प्रारंभ ग्रीक
देवताओं की मां साईं बेली के सम्मान में
साइबेली उत्सव के रूप में आयोजित किया जाता
था। वह आज भी मार्च के महीने में 15 से 18
मार्च के मध्य आयोजित किया जाता है। यूरोप में
मदरिंग संडे और कैथोलिक कैलेंडर में लाईटेरी
संडे को वर्जिन मैरी के सम्मान में मनाने की
परंपरा है। अरब देशों में इस परंपरा को मुस्तफा
अमीन ने इजिप्ट में शुरू किया। यह 21 मार्च को
आयोजित किया जाता है। अफगानिस्तान में यह
उत्सव जून में तथा आस्ट्रेलिया, ब्राजील एवं
बांग्लादेश में मई में आयोजित किया जाता है।
नेपाल में मातृतीर्थ पखवारे का आयोजन होता है
और संपूर्ण भारतवर्ष में वर्ष में दो बार नवरात्रि
पूजन (अक्टूबर एवं अप्रैल माह) वस्तुत: मातृ
पूजन की परंपरा का ही सुनियोजित रूप है।
संपूर्ण विश्व के देशो में मां का सम्मान किया
जाता है, मां ने सदैव ही निर्माण एवं उन्नयन में
सकारात्मक भूमिका निभाई है और अपनी असीम
सहनशीलता, अपार संघर्ष क्षमता एवं अभूतपूर्व
साहस का परिचय दिया है।
भारत और मा
भारत की बात करें तो मां के रूप में पौराणिक
चरित्र देवी दुर्गा ने विश्व के संकट को महिषासुर
का नाश करके दूर किया। पूर्व रामायण काल में
शकुंतला ने जिस प्रकार दुष्यंत के तिरस्कार को
साहस के साथ सहनकर भरत का पालन पोषण
किया उसकी तुलना में कोई भी पुरुष चरित्र ढूंढने
से नहीं मिलता और लगभग यही स्थिति रामायण
की नायिका मां सीता की भी है, जिन्होंने 14 वर्ष
का वनवास, लोकनिंदा और पति की भीरुता के 
प्रत्युत्तर में न केवल वन में जाकर रहना तथा
लव-कुश को जन्म देना स्वीकार किया, वरन
उन्हें इस योग्य भी बनाया कि वे श्री राम जैसे
योद्धा का सामना कर सकें।
मदर टेरेसा
त्याग एवं प्रेम की मूर्ति के रूप में मदर टेरेसा इस
आधुनिक युग में ऐसी मां के रूप में स्थापित हो
चुकी हैं, जिनके स्वरूप में करुणा ही करुणा है।
26 अगस्त सन 1910 को ्रद्गठ्ठ3द्धड्ड क्चशद्भड्ड3द्धद्ब1
द्बठ्ठ ह्यद्मशश्चद्भद्ग में जन्मी मदर टेरेसा को 12 वर्ष की
उम्र में ही यह महसूस होने लगा था कि ईश्वर की
पुकार उन्हें बुला रही है और उनका कार्यक्षेत्र कुछ
और ही है। 18 वर्ष की उम्र में उन्होंने मानव
सेवा की राह में घर छोड़ दिया। भारत में उन्होंने
आईरिश समुदाय की ननों के एक संगठन सिस्टर्स
आफ लोरेंटो के साथ काम करना प्रारंभ किया।
सन 1931 से 1948 तक कोलकाता में उन्होंने
सेंट मेरी स्कूल में अध्यापन कार्य किया और
उसके बाद मानवता की सेवा के लिए उन्होंने
नौकरी से इस्तीफा दे दिया। उन्हें लगा कि शक्षा
संभवत: सबसे महत्वपूर्ण सेवा प्रकल्प है, अत:
उन्होंने झुग्गी-झोपड़ी के बच्चों के लिए एक
स्कूल की स्थापना की। फंड की कमी की वजह
से स्कूल खुले आकाश के नीचे चलने लगा,
लेकिन बाद में साधन संपन्न लोगों ने इसके लिए
धन जुटा दिया। सन 1950 में मदर टेरेसा ने
मिशनरीज आफ चैरिटी की स्थापना की। इस
संस्था के माध्यम से साधनहीन एवं निराश्रितों को
स्वेह, सुरक्षा और संरक्षण देने के लक्ष्य को ही
मदर टेरेसा ने अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया।
सन 1990 तक इस संस्था से विश्व के 1 करोड़
से अधिक कार्यकर्ता जुड़ चुके थे। इस संस्था का
कार्य क्षेत्र 40 से अधिक देशों तक फैल चुका
था। बाढ़, भूकंप और अकाल जैसी प्राकृतिक
आपदाओं के समय इस संस्था ने सेवा के नए
कीर्तिमान स्थापित किए। मदर टेरेसा की इस
सेवा भावना का सम्मान करते हुए, सन 1970 में
उन्हें शांति पुरस्कार, सन 1972 में नेहरू पुरस्कार
और सन 1979 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित
किया गया।
शांति, प्रेम, करुणा, सेवा और सहज वात्सल्य
की देवी मदर टेरेसा ने 5 सितंबर सन 1997 को
इस संसार में अंतिम सांस ली, लेकिन वे जीवन
भर मां शब्द की सार्थकता का निर्वाह करती रहीं।
श्री मां के नाम से विख्यात श्री अरविंद सोसाइटी
के पांडिचेरी आश्रम को वास्तव में एक
आध्यात्मिक केंद्र बनाने वाली मीरा एईफासा का
जन्म सन 1878 में पेरिस में हुआ था। सिद्धहस्थ
पियानोवादक, कुशल चित्रकार, मौलिक लेखक, 
तंत्र विज्ञान एवं आत्मिक विकास में गहन रुचि
रखने वाली, मीरा सन 1914 में 36 वर्ष की उम्र
में पहली बार जब पांडिचेरी आकर श्री अरविंद से
मिलीं तो उन्हें महसूस हुआ मानो श्री अरविंद ही
वह मानस दिशा निर्देशक थे, जो परोक्ष रूप से
उन्हें चिंतन एवं दर्शन की गूढ़ गहरी घाटियों में
उंगली पकड़कर ले जाते थे और मार्ग को
प्रकाशित करते थे। वे उनके सानिध्य में 11 माह
तक रहीं और फिर वापस चली गईं, 6 वर्ष बाद
पुन: पांडिचेरी वापस आईं और अपना शेष जीवन
अरविंद दर्शन को ही समर्पित कर दिया। सन
1926 में जब आश्रम पूर्ण रूप से बनकर तैयार
हुआ, तो उसका संपूर्ण भाग श्री मां को ही सौंप
दिया गया। अगले 50 वर्षों में उन्होंने आश्रम को
एक प्रतिष्ठित आध्यात्मिक समुदाय के रूप में
स्थापित कर डाला। सन 1952 में उन्होंने अरविंद
इंटरनेशनल सेंटर की स्थापना की और सन 1968
में इसे इंटरनेशनल टाउनशिप के रूप में विकसित
कर दिया। 17 नवंबर सन 1973 को श्री अरविंद
दर्शन एवं अपने मौलिक चिंतन से विश्व को
मानसिक शांति और सफलता की राह दिखाने
वाली इस ज्योतिपुंज का देहांत हो गया।
विश्व स्तर पर मां के नाम से विख्यात तीसरा
महत्वपूर्ण नाम जीसस की मां एवं मदर आफ
चर्च, मदर मैरी को माना जाता है। मान्यता है कि
वे कुंवारी थीं और ईश्वर की इच्छा से उन्होंने
जीसस क्राइस्ट को जन्म दिया। संपूर्ण विश्व में
जहां-जहां ईसाई धर्म की मान्यता है, वहां चर्चों में
मदर मैरी की करुणा एवं दया बरसाती प्रतिमाएं
श्रद्धा का केंद्र हैं।
मां को साहित्य में भी पूर्ण स्थान मिला। रूसी
उपन्यासकार गोर्की का ‘à¤®à¤¾à¤‚Ó à¤¶à¥€à¤°à¥à¤·à¤• से लिखा
गया उपन्यास विश्व साहित्य की निधि माना जाती
है। विश्व स्तर पर हॉलीवुड की फिल्मों की बात
करें, तो मां की भूमिका के विविध आयाम पर
केंद्रित इरिन वॉकविच, द इंक्रेडिबल्स, मिसेज
मिनीवर, स्टेप मॉम, साउंड ऑफ म्यूजिक, माय
बिग फैट ग्रीक वेडिंग, प्लीज डोंट ईट द
डायसिस, चॉकलेट, विह्पइट और डिवाइन
सिक्रेटस ऑफ द या -या सिस्टर हुड और हाल
ही में प्रदर्शित मामस मूवीस का उल्लेख बार-बार
किया जाता है।
बॉलीवुड ने भी इस किरदार को अनदेखा नहीं
किया है। औरत का रीमेक महबूब खान की मदर
इंडिया एक नारी के मां के रूप को जिस प्रकार
और जिस पूर्णता के साथ प्रदर्शित करती है, उसी
ने इसे भारत की 10 सुपरहिट क्लासिक्स में
स्थान दिलवाया है। हजार चौरासी की मां, ममता,
दादी मां वे अन्य महत्वपूर्ण फिल्में हैं जिनमें मां
की भूमिका ही केंद्र में रही और अगर फिल्मों में
मां की भूमिका के निर्वाह की बात की जाए तो
मुगलेआज़म में सलीम की मां जोधा बाई की
भूमिका में दुर्गा खोटे, मदर इंडिया की केंद्रीय
भूमिका में नरगिस, 50 से अधिक फिल्मों में क्रूर
सास एवं ममतामई मां की भूमिका की पर्याय
ललिता पवार, लीला मिश्रा, लीला चिटनिस और
मनोज कुमार की फिल्मी मां कामिनी कौशल ने
तो इतिहास रचा ही है, लेकिन ‘à¤–à¥‚à¤¬à¤¸à¥‚à¤°à¤¤Ó à¤•à¥€
नियम कायदे की पाबन्द दीना पाठक, दिलवाले
दुल्हनिया ले जायेंगे की लविंग मां फरीदा
जलाल, कर्मा की देशभक्त मां नूतन, त्रिशूल की
बेबस मां वहीदा रहमान, आराधना की अपने
बेटों को पूर्णतया समर्पित मां शर्मिला टैगोर, मैंने
प्यार किया की प्यारी मां रीमा लागू और
बागवान की तेजतर्रार मां हेमा मालिनी ने भी मां
की भूमिकाओं में जान डालने में कोई कोर कसर
नहीं छोड़ी है। छोटे पर्दे की मेघा मलिक
(अम्माजी- ना आना इस देश लाडो) और
सुरेखा सीकरी (दादी सा- बालिका वधू) भी
कुछ कम नहीं बैठतीं। मां का चरित्र इतनी
विशेषताओं को समेटे हुए हैं कि इसने हरेक
लेखकों, चित्रकारों और इतिहास को प्रभावित
किया है, फिर भी दुनिया के इस सबसे पवित्र
रिश्ते को शब्दों, सेल्यूलाइड या कैनवास समेटना
कठिन ही है। इस कारण सिर्फ इतना कह कर
बात को समाप्त करना पड़ेगा कि ‘à¤®à¤¾à¤‚Ó à¤¶à¤¬à¥à¤¦ का
विश्लेषण सिर्फ मां ही हो सकता है या इसे मां
के हृदय में उतर कर ही समझा जा सकता है।
सचमुच एक संपूर्ण संसार का नाम है मां।
मदर मैरी
साहित्य में भी मिला है मां को स्थान
फिल्मों में मां के किरदार
अदावत वह नहीं करती।
$िखलाफत वह नहीं करती।
वह मां है इसलिए कोई
शिकायत वह नहीं करती।
कहीं उसके ही बच्चों पर
ना कोई आंच आ जाए,
इसी कारण रिवाज़ों से
बगावत वह नहीं करती।
दिया क्या और पाया क्या
उसे चिंता नहीं इसकी
किसी रिश्ते में भी कोई
तिजारत वह नहीं करती।
उसे वृद्ध आश्रम भेजो
अकेला छोड़ दो रोता
मगर औलाद को दु:ख हो
यह चाहत वह नहीं करती।
बुराई उसके बच्चों की
$खुदा के मुंह से गर निकले
तो फिर ऐसे $खुदा की भी
इबादत वह नहीं करती।
वो हो जन्नत भले ही पर
न हों बच्चे वहां उसके
तो उस जन्नत की भी दिल से
हिफाज़त वो नहीं करती।
वो बेशक दूर है मुझसे
मगर नजदीक लगती है
मैं कैसे यह कहूं मुझसे
मोहब्बत वो नहीं करती।
Aenxha Bojaxhiv
in skopje