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Swami Chinmayaanand: हम पहले देख चुके हैं कि किस प्रकार कोई साधक पूर्ण एवं सचेतन विश्रान्ति की युक्ति द्वारा बाह्यï इन्द्रिय वस्तुओं से विरक्त होकर अपने ध्यान को काफी सीमा तक भौतिक शरीर से खीच कर आत्मकेन्द्रित कर लेता है। जितनी सफलतापूर्वक साधक विश्रान्ति ले सकता है उतनी ही आसानी से वह शरीर से अपने आवश्यकता से अधिक ध्यान को हटा सकता है। कुछ सीमा तक विश्रान्ति मिलते ही साधक को अपने अन्दर शान्ति एवं आनन्द का इस प्रकार अनुभव होगा मानों यह विक्षिप्त मन की मरुभूमि से आती हुई गर्म आंधी को शीतल करने के लिए कोई वारिधारा हो।

हमें भली-भांति समझ लेना चाहिए कि समस्या से ऊपर उठ जाना ही समस्या का हल है। जब तक हम समस्या में उलझे रहते हैं, तब तक कोई समस्या हल नहीं हो सकती। समस्याओं की उत्पत्ति परिस्थितियों वश होती है। जब तक हम परिस्थिति-निरपेक्ष नहीं बनते, तब तक समस्या का हल संभव नहीं है। शरीर से तादात्म्य के कारण अपना ध्यान उसकी ओर चले जाने की समस्या का हल तभी हो सकता है, जब हम उस तादात्म्य से अपने को अलग कर लें। गीता में इस प्रक्रिया का सविस्तार उल्लेख श्रीकृष्ण भगवान के मुखारविन्दु से हुआ है।

मानसिक और बौद्धिक सीमा के अन्दर अपनी चेतनावस्था में प्रवेश करके हम शारीरिक क्षेत्र से विरत हो सकते हैं। जीवन में यह सर्वसाधारण अनुभव है कि जब हम अपने भावों या विचारों के कारण विक्षिप्त होते हैं, तब हमें शरीर की सुधि नहीं रहती। कोई अत्यन्त विलासी एवं भावुक व्यक्ति अपने चुनाव अभियान में सर्दी-गर्मी की परवाह किये बिना अनेक शारीरिक कष्टï सहन करता है। चुनाव जीतने के उत्साह में वह अपने मानसिक और बौद्धिक व्यक्त्त्वि का अधिकाधिक उपयोग करता है। अत: उस सीमा तक अपनी शारीरिक इकाई का तिरस्कार करता है।

आध्यात्मिक साधना का ध्यान-साधक अपने मानसिक और बौद्धिक क्षेत्र में अधिकाधिक व्यस्त होने के कारण भौतिक शरीर से अपना समस्त ध्यान सावधानीपूर्वक हटा लेता है। इष्टï देवता का ध्यान तथा जपयोग की क्रियाओं द्वारा साधक अपने को सूक्ष्म शरीर में केन्द्रित करता है और उस समय तक के लिये शरीर एवं उसके परिवेश को पूर्णतया भूल जाता है। शास्त्रों के अनुसार सूक्ष्म शरीर (अन्त:करण) चार प्रकार के कार्य करता है। उपादान वही रहता है परन्तु सूक्ष्म शरीर की संकल्प-विकल्प और भावना स्थिति ही मन कहलाती है। उसी मन की दृढ़ और निश्चयात्मक वृत्ति को बुद्धि कहते हैं।

मन के संकल्प एवं तदुपरान्त बुद्धि के विवेकपूर्ण निश्चय जब तक प्रकाशित नहीं होते तब तक हम उनका अनुभव नहीं कर सकते। परन्तु हम सबको अपने विचारों का ज्ञान रहता है तथा हम यह भी देखते हैं कि प्रत्येक क्षण हमारे मानसिक धरातल पर निश्चयात्मक बुद्धि उदित होती है। मानसिक जगत में व्याप्त प्रकाश को चित्त कहते हैं जो बुद्धि की बुद्धिमत्ता है। चित्त द्वारा विचारों और निर्णयों के प्रकाशित होने पर भी वे अपने आप में पूर्ण अनुभव का रूप नहीं ले सकते, जब तक कि उसमें कोई तारतम्यता न हो। हमें अपने दैनिक अनुभवों में एकात्मकता का अनुभव होता है, क्योंकि हम अपनी शंकाओं को बुद्धि द्वारा निर्मूल होते देखते हैं।

हम उसे और स्पष्टï कर सकते हैं। मेरा मित्र जीवन की किसी समस्या में उलझा हुआ है और इस समय बुद्धिसाम्य के अभाव में वह निर्णय ले सकने में असमर्थ है। परंतु मैं उसकी शंकाओं को सुनता हूं और विवेकपूर्ण निर्णय लेता हूं। यहां हम देखते हैं कि एक व्यक्ति के हृदय में स्तब्धकारी शंकाएं हैं और दूसरे के हृदय में उनके स्पष्टï उत्तर। परन्तु यहां हम यह नहीं कह सकते कि मेरे मित्र को समस्या सुलझ जाने की खुशी होगी, क्योंकि उसका हल पराई बुद्धि में है। स्पष्ट ही है कि जब तब उसकी अहं बुद्धि में यह बात न आये कि शंकायें भी उसकी हंै तथा उनका हल भी उसी के पास है, तब तक वह आन्तरिक जीवन की पूर्णता का अनुभव नहीं कर सकता। हममें से प्रत्येक व्यक्ति को अपनी विचारशीलता का आभास होता है। अत: हम यह सहज कल्पना कर सकते हैं कि हमारे भीतर विचारों और निर्णयों की एक संयोजक सत्ता भी है। यह संयोजक सत्ता ही स्थायी अहंकार है जो ‘मेरे विचार’ और ‘मेरे निर्णय’ को एकीकृत करता है। जब अन्त:करण ‘मैं’ और ‘मेरे पन’ के भाव से कार्यरत होता है, तब इसे ही अहंकार कहते हैं।

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