सूर्य स्नान के लाभ: Surya Snaan Benefits
Surya Snaan Benefits

Surya Snaan Benefits: जल और वायु हमारे शरीर के लिए जितनी आवश्यक है, उतनी ही आवश्यक है सूर्य की रोशनी भी। सूरज की रोशनी हमारे शरीर के लिए विटामिन-डी का सबसे अच्छा स्रोत है। इसकी कमी से मनुष्य शरीर को कई तरह की बीमारियां जकड़ लेती हैं। सूर्य की रोशनी प्राप्त करने का सबसे अच्छा माध्यम सूर्य स्नान है। सूर्य स्नान के विभिन्न लाभों को जानें इस लेख से।

स र्यस्नान का प्रचलन आज भी ठंडे प्रदेशों में है, लेकिन अंग्रेज इसका भरपूर उपयोग करते हैं। समुद्र के किनारे तमाम क्षेत्रों में लाखों सैलानी आज भी बालू पर खुले बदन सोये हुए पाए जाते हैं। शरीर पर एक लंगोट मात्र रहती है और नीचे बालू पर करवट बदलते हुए वे घंटों सोते रहते हैं, इससे शरीर के रोम-रोम में सूर्य की ऊर्जा प्रवेश करती है, ऐसे लोगों को चर्म रोग नहीं होता। क्योंकि सूर्य की रोशनी से शरीर के अनावश्यक कीटाणु जल-भुनकर नष्ट हो जाते हैं। इस क्रिया में शरीर के रोम छिद्रों में सूर्य ऊर्जा को प्रवेश कराना महत्त्वपूर्ण है। आजकल हम ऐसे कपड़े पहन लेते हैं जिनसे रोम छिद्रों को हवा भी नहीं मिलती। विज्ञान कहता है कि हमारा शरीर भी सांस लेता है। नाक से हम शरीर के अन्त: भाग के लिए सांस लेते हैं और रोम छिद्रों से शरीर की बाहरी परत के लिए सांस लेते हैं, ताकि हमें चर्म रोग न हो और सूर्य की रश्मि, ऊर्जा, विटामिन एवं लाभदायक प्राण वायु शरीर में प्रवेश करती रहे।

कई लोग प्रात: काल भ्रमण पर निकलते हैं। सूर्य जब अपनी लालिमा बिखेर रहा हो, तो उस समय टहलना बहुत उपयोगी होता है, क्योंकि सूर्य के निकलते ही पेड़-पौधों से ऑक्सीजन निकलने लगती है। सूर्योदय के पहले पेड़ों से ऑक्सीजन नहीं निकलती। इसलिए सूर्योदय के पहले टहलना उपयोगी नहीं होता। अभी अमेरिका में एक पुस्तक प्रकाशित हुई है जिसका नाम है वेदरिंग, उसमें लेखक ने कहा है कि कभी-कभी वातावरण में ढ्ढद्यद्य 2द्बठ्ठस्रह्य भी बहती है, जो शरीर को बीमार और क्षतिग्रस्त कर देती है। इसलिए आज भी गांवों में मातायें कहती हैं कि- ‘बऊआ! खुलल देह बाहर न निकल, हवा लग जतौ। मुझे तो लगता है कि अमेरिका ने आज जिन बातों का पता लगाया है, हमारे गांवों में तो लोग लाखों वर्ष पहले ही इस बात को जान चुके थे।

सूर्य हमारी पृथ्वी से लगभग साढ़े नौ करोड़ (9,29,88,000) मील दूर है। अनुमान लगाया जाता है कि सूर्य पर लगभग एक करोड़ डिग्री सेल्सियस ताप रहता है, जिसका करोड़वां भाग ही पृथ्वी को मिलता है। हमारे शास्त्रों में तो सात परत लोक की चर्चा की गई है, लेकिन विज्ञान चार परत को ही स्वीकार करता है। सूर्य और पृथ्वी के बीच में ‘ट्रोपोस्फीयर जो 3500 फुट से ऊपर का क्षेत्र है, दूसरा स्ट्रैटोस्फीयर, तीसरा है ओजोनोस्फीयर, चौथा है एक्सास्फीयर। उन्हीं तलों से सूर्य की गर्मी छनकर पृथ्वी पर पहुंचती है। सूर्य के ऊपर निहारिका है, उससे ऊपर आकाशगंगा है। पृथ्वी से आकाशगंगा की दूरी लगभग 20 लाख प्रकाश वर्ष की है। एक वैज्ञानिक ने तो यहां तक कहा है कि अब तक आकाश में 8 करोड़ प्रकाश वर्ष पर केवल चार तारे ही खोजे जा सके हैं।

प्राण चिकित्सा विज्ञान हमारे देश की अद्भुत उपलब्धि है। आज विश्वविद्यालयों में प्राणीशास्त्र पढ़ाया जाता है, लेकिन उन्हें इस बात की कोई जानकारी नहीं है कि प्राण आखिर है क्या? जैसे हम अपने घरों में बिजली जलाते हैं, हम बिजली से बल्ब और पंखा चलाना तो जानते हैं, उसका उपयोग हमें पता है, लेकिन हम यह नहीं जानते कि बिजली है क्या? हम प्राणी अवश्य हैं लेकिन प्राण को नहीं पहचानते। प्राण शब्द में प्र उपसर्ग है, जिसमें अन् धातु लगी है और प्राण बना है। इसका मतलब है वह दिव्य शक्ति, जो जीव में रहती है। शरीर से वह दिव्य शक्ति जब निकल जाती है तो शरीर निष्प्राण हो जाता है। इसीलिए हम प्राण को न ही जाते देख पाते हैं और न ही आते।

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जब शरीर में प्राण ऊर्जा की प्रबलता रहती है तो मनुष्य प्रसन्न, उत्साही और आनन्दचित्त रहता है। उसकी कमी होते ही तनाव, चिन्ता और बीमारी बढ़ जाती है। इससे स्पष्ट होता है कि शरीर में प्राण घटता-बढ़ता रहता है। इसी को पूरा करने के लिए लोग पहाड़ी प्रदेशों एवं समुद्र के किनारे विश्राम के लिए जाते हैं। जहां सागर की लहरों के घर्षण से एवं हरी-भरी वादियों से ऋणायन तत्त्व निरंतर पैदा होकर शरीर को स्वस्थ बना देता है। हमारे शरीर के चारों ओर ऊर्जा क्षेत्र बना हुआ है, जिसको ‘आयनो प्लाज्मा कहते हैं। वातावरण में आयनोस्फेयर रहता है, जो पृथ्वी से 60 मील ऊपर तक फैला रहता है।

आजकल स्वास्थ्य लाभ के लिए लोग सैनिटोरियम में जाते हैं, इससे शरीर को बड़ा लाभ होता है। हमारे शरीर के चारों ओर जो ऊर्जा क्षेत्र है, उसे ‘क्लाउड ऑफ आयन्स कहते हैं। इसी से हमारे शरीर की जो महत्त्वपूर्ण 3 नाड़ियां हैं, इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना, संचालित होती रहती हैं। यूं तो हमारे शरीर में 3600 नाड़ियां हैं, जो हमारे शरीर के लगभग 20 लाख रोम छिद्रों से प्राण वायु ग्रहण करती रहती हैं। बाहर से प्राण ऊर्जा को हम सांस के माध्यम से भी ग्रहण करते हैं। हमारे फेफड़े में लगभग 7 करोड़ से ज्यादा स्पंज छेद होते हैं, जो वायु को फिल्टर करते हैं। आजकल जो लोग सांस की बीमारी से परेशान हो रहे हैं, उसका कारण यह है कि वे लोग भरपूर सांस नहीं लेते। सांस की कमी के कारण फेफड़े में टीबी जैसी बीमारी भी हो जाती है।

कहा जाता है कि जो लोग सूर्यभेदन प्राणायाम करते हैं उन्हें टीबी, कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी कभी नहीं होती। स्पष्ट है कि सूर्य ऊर्जा के कारण ही सम्पूर्ण जीव-सृष्टि जीवित है।

आजकल प्राय: सूर्य उपासना के लिए गायत्री मंत्र का जाप किया जाता है। यह अद्भुत प्रभाव देने वाला मंत्र है। इसीलिए 11 हजार से लेकर सवा लाख तक गायत्री मंत्र का जाप करके साधक अपना मनोवांछित फल प्राप्त करता है। कहा जाता है कि गायत्री एवं सावित्री मन्त्र का गान अगर नियमपूर्वक किया जाए तो भगवान सूर्य साधक के जीवन से सारे कष्टों का नाश करते हैं। शरीर को सुखी और स्वस्थ बनाते हैं, कठिन से कठिन रोग गायत्री मंत्र के तेज से जलकर नष्ट हो जाता है और साधक की बुद्धि और विवेक अत्यन्त ही प्रखर बन जाता है। कहते हैं- गायन्ति प्राणा: स: गायत्री: अर्थात् जिस मंत्र का गान हमारा प्राण करे, वही गायत्री है, क्योंकि सूर्य से ही हमें प्राण प्राप्त होता है।
गायत्री मन्त्र:- ऊं भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धीयो यो न: प्रचोदयात सावित्री मन्त्र: ऊं भू: ऊं भुव: ऊं स्व: ऊं मह: ऊं जन: ऊं तप: ऊं सत्यं ऊं तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धीयो यो न: प्रचोदयात।2मुनि पतंजलि यह भी कहते हैं- सूर्य प्राण के देवता हैं। विज्ञान को पता नहीं है कि प्राण क्या है और कहां से आता है, लेकिन अध्यात्म कहता है कि प्राणवायु सूर्य से आती है-
प्राणवायु अनंत से चलकर, सूर्यदेव तक आए।