Osho Life Lesson: दूसरे ही पृष्ठ पर सर्वप्रथम मेरा चेहरा देखकर आपका हैरान होना लाजमी है क्योंकि मेरा चेहरा इस विशेषांक के साथ न तो निर्णय करता है, न ही कोई तालमेल बिठाता है। क्योंकि न तो मैं कोई प्रसिद्ध हस्ती हूं न ही बुद्धिजीवियों की श्रेणी में मेरा कहीं कोई स्थान है। तो क्या मैं पत्रिका का संपादक होने के नाते पद और पन्नों का फायदा उठा रहा हूं? नहीं। न तो ऐसी मेरी कोई मंशा है, न ही कोई चाल। सच कहूं तो यह मेरी मजबूरी है। पर मेरी इस मजबूरी का संबंध किसी लाचारी या असहाय जैसी नकारात्मक अवस्था से नहीं है। मेरे लिए मजबूरी का मतलब उस विवशता से है जिसके लिए मेरा लिखना ही एक मात्र विकल्प है और यही विकल्प इस अंक का कई हद तक आधार भी है।
इस पृष्ठ को लिखने का मेरा पहले बस एक कारण था और वह यह कि यह अंक क्यों? क्योंकि हमारे समाज में सिर्फ बुद्धिजीवी ही नहीं अति बुद्धिजीवी भी रहते हैं जिनके सीने में सांस चले न चले पर दिमाग में खुजली जरूर चलती है विशेषकर ऐसे लोग जिन्हें अपना बुद्धत्व दर्शाने के लिए फेसबुक का सहारा लेना पड़ता है। मुझे हैरानी है कि जहां कई ओशो प्रेमी उत्सुक हैं यह पढ़ने-जानने को कि हस्तियां क्या कहती हैं या क्या राय रखती हैं ओशो के बारे में तो कुछ ऐसे भी हैं जो इस निंदा या आलोचना में जुटे हैं कि ओशो के बारे में यह सेलिब्रिटी हमें क्या बताएंगे? इनकी राय या नजरिए से क्या फायदा? इन बुद्धिजीवियों ने कभी ध्यान नहीं किया? या फिर यह कोशिश मैंने अपनी पत्रिका की बिक्री को बढ़ाने के लिए की है, आदि-आदि। हालांकि मेरा यह प्रयास उन कुछ लोगों को गलत या स्वयं को सही साबित करने का कत्तई नहीं है क्योंकि यह जो ‘कुछ लोगों’ का आंकड़ा है वह हर समय और हर युग में सदा विद्यमान रहता है जो वक्त और हालात का नहीं खुद की समझदारी का शिकार होता है।
बहरहाल बात इस वर्ष 2017 अगस्त की है मैं ‘मानसून फेस्टिवल’ के लिए पूना उतरा ही था कि जब मैंने कम्यून के लिए टैक्सी की, तो मुझसे पूर्व जो सज्जन टैक्सी में बैठे थे उनके उतरने और मेरे बैठने के दौरान सिर्फ एक प्रश्न भर की बात हुई जिसमें उन्होंने पूछा ‘आप कम्यून जा रहे हो, फिर तो वहां सेक्स करोगे?’ सुनते ही मेरे चेहरे पर एक मुस्कान आई और दिमाग में ख्याल कि ‘आज भी ये हाल है।’ खैर मेरे अनुभव में कुछ और भी शामिल होना बाकी था। मुझे कम्यून में दो दिन बाद एक ऐसा मित्र भी मिला जो खूबसूरत ऊर्जा और उत्सव के माहौल में भी दुखी था, क्योंकि वह घर बहुत खुशी-खुशी बता कर आया था कि वह पूना ‘ओशो कम्यून’ जा रहा है पंरतु पीछे से उसकी पत्नी ने इंटरनेट पर ओशो व ओशो कम्यून के बारे में सब कुछ खंगाल डाला। और जैसा अमूमन होता है अपनी भावना और नेट पर उपलब्ध सामग्री को देखकर वह ओशो व ओशो के लोगों के प्रति नकारात्मक भाव से भर गई और बात तलाक तक आ पहुंची।
इतना ही नहीं जिस जबलपुर शहर में ओशो ने इतना वक्त गुजारा है वहां के आम आदमी से मुझे ओशो के बारे में पूछने पर यह उत्तर मिला है कि ‘ओशो अंग्रेजी का एक प्रोफेसर था, जो अंग्रेजी महिलाओं के साथ रहता था। जिन्हें लेकर वह विदेश भाग गया था पर विदेशियों ने भी उन्हें वहां से निकाल दिया।’ यह सब बातें मुझे हैरान करती हैं, मुंह चिढ़ाती हैं और एक गैर जिम्मेदार होने का एहसास कराती हैं क्योंकि मैं मात्र एक ओशो प्रेमी या संन्यासी ही नहीं हूं एक लेखक-संपादक भी हूं। मुझे दुख होता है आज भी लोगों तक ओशो की असली छवि नहीं पहुंच पा रही है। मैं यह सोचकर हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठ सकता कि, सबकी अपनी-अपनी समझ है, तल है, यात्रा है, हमने किसी को समझाने का ठेका नहीं लिया…। ठेका मैंने भी नहीं लिया पर कोशिश नहीं करूंगा ऐसा भी नहीं है। ओशो के इतने प्रवचन, पुस्तकें, उनमें कैद इतने पात्र, कहानियां, उदाहरण, विधियां सब आदमी को जगाने की कोशिशें ही तो हैं तो फिर मैं हार क्यों मानूं। हालांकि ओशो अपने आप में प्रमाण हैं उन्हें किसी वकील या वकालत की आवश्यकता नहीं है। हर दलील और दलाल उनके वजूद के आगे बौना और बेमानी है परंतु फिर भी कुछ है जो जरूरी है, जो किया जा सकता है और किया जाना चाहिए और यह अंक उसी का छोठा सा प्रयास है।
बहरहाल 2017 में भी ओशो व ओशो के संन्यासियों के प्रति लोगों की यह सोच है, जब मैंने इस बात पर गंभीरता से सोचा तो मुझे आदमी का जो सीधा सा, सस्ता मनोविज्ञान है, वह हाथ लगा और वह है उसका भेड़ चाल चलना। यानी वह वहां चल देता है जहां भीड़ होती है। वह खुद की नहीं भीड़ की सुनी-सुनाई बातों पर अपने आपको तैयार करता है। साथ ही आदमी की बचपन से आदत होती है कि कोई बड़ा, प्रतिष्ठिïत आदमी कुछ कह दे तो उसको वह सरलता से मान लेता है फिर वह घर-परिवार का बड़ा-बुजुर्ग हो या समाज का कोई जाना-माना सेलिब्रिटी चेहरा। आदमी के इस मनोविज्ञान को विज्ञापन जगत बहुत आराम से समझता है तभी तो छोटी से छोटी या नयी चीज को लोगों तक पहुंचाने के लिए वह हस्तियों के चेहरों व उनके कमेंट का उपयोग करते हैं।
आदमी की यह आदत है कि वह उस बात पर भरोसा कर लेता है जिस पर मीडिया या प्रसिद्ध हस्तियां अपनी मोहर लगा देते हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि मैंने इस अंक में मौजूद हस्तियों को जबरन कोई प्रलोभन या पैसा देकर ओशो पर बोलने के लिए तैयार किया है। नहीं जो लोग ओशो के बारे में कुछ नहीं जानते या आधा अधूरा जानते हैं उन्हें बता दूं कि ओशो को हर फील्ड का सेलेब्रिटी पढ़ता है फिर वह नेता हो या अभिनेता, संत हो या शायर, नृत्यकार हो या गायक, ज्योतिषी हो या मनोवैज्ञानिक, आर्टिस्ट हो या खिलाड़ी। सुलझे हुए, बुद्धिमान लोग जहां भी हैं वह ओशो को पसंद करते हैं । बस वह कभी सामने नहीं आ पाए हैं।
इस अंक के जरिए मैं चाहता हूँ कि लोग देखें कि ओशो को किस कदर, किस कद के लोग, किस हद तक चाहते हैं व प्रेरणा पाते हैं। मुझे फक्र है यह बताते हुए कि यह पत्रिका सिर्फ एक नमूना मात्र है। इस अंक के माध्यम से मैं अधिक से अधिक हस्तियों व बुद्धिजीवियों के साक्षात्कारों को आपके समक्ष लाना चाहता था इसलिए मुझे बेहद अफसोस है कि मुझे आधे से ज्यादा विचारों को संपादित करना पड़ा। यदि मैं संपादित नहीं करता तो कम से कम तीन अंक और प्रकाशित किए जा सकते थे। पर आप निराश न हों बहुत जल्द इसका पुस्तक रूप भी प्रकाशित होगा, जिसमें आप अन्य हस्तियों के साथ अंक में प्रकाशित अधूरे साक्षात्कारों को भी पूरा पढ़ सकेंगे। ओशो से व इस पत्रिका से जुड़े पुराने पाठकों को थोड़ी निराशा हो सकती है कि इसमें किसी ओशो संन्यासी को शामिल क्यों नहीं किया गया, क्या वह बुद्धिजीवियों की श्रेणी में नहीं आते? नहीं, ऐसा नहीं है वह निश्चित ही आते हैं। एक बात तो यह है उनके विचार पूर्व में इस पत्रिका में छपते रहे हैं और दूसरा आदमी बहुत चालाक है वह जानता है कि ओशो का संन्यासी तो ओशो की तारीफ करेगा ही, उनका वोट डालेगा ही तो ऐसे में उनकी बात जरा हल्की हो जाती है। वो सोचता है बात तो वो है जब कोई दूसरा जो ओशो संन्यासी नहीं है वो ओशो की तारीफ करे।
मुझे यकीन है जो लोग ओशो की छवि के कारण ओशो को पढ़ने का या उनके शिविर-आश्रम में जाने का साहस नहीं जुटा पाते वह पत्रिका में मौजूद विचारों को पढ़ने के बाद थोड़ा सकारात्मकता से भरेंगे। समाज का वह वर्ग जो आज भी दूसरे के कंधे पर बंदूक चलाने की आदत से मजबूर है उसे इस अंक में दर्जनों नए कंधे मिलेंगे। वह गर्व के साथ ओशो की पुस्तकें पढ़ेगा, उन्हें सेक्स गुरु के अलावा भी कुछ और समझेगा। ढोल-नगाड़ों के साथ ओशो के शिविरों और आश्रमों में दाखिल होगा और पूरे स्वीकार के साथ, सीने को छत्तीस से चालीस करके बोलेगा कि ‘मैं उस ओशो को पढ़ता हूं जिससे यह दुनिया सम्मानित हुई है, दुनिया के इतने सम्मानित लोग सम्मानित हुए हैं।’ इसलिए यानी जो ओशो से चूका वह जीने से चूक गया।
शब्द शस्त्र हो गए, नाम ट्रेडमार्क बन गया खड़ा-खड़ा बाजार में, बुद्धत्व प्रॉडक्ट बन गया
पत्रिका के आरंभ में अपनी बात को रखने का मेरा दूसरा मुख्य कारण ओशो नाम का ट्रेडमार्क बन जाना भी है। जी हां जो लोग नहीं जानते उन्हें बता दूं कि यूरोपीय कोर्ट के अनुसार ओशो नाम एक ट्रेडमार्क बन गया है जिसका स्वामित्व अब ‘ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन’ के पास है।
इस स्वामित्व से बहुतों को शिकायत है क्योंकि इस ट्रेडमार्क के चलते वो ओशो से जुड़ा काम नहीं कर पा रहे हैं। इतना ही नहीं उनके सोशल नेटवर्किंग साइट्स और यू-ट्ïयूब से ओशो से संबंधित पेज, पोस्ट, वीडियो और वेबसाइट्स आदि को हटाया जा रहा है।’ जिसके चलते मुझे हजारों मैसेज व ई-मेल निवेदन के रूप में आये हैं कि मैं इस पर कुछ लिखूं।
हालांकि इस विषय में मेरी बात दोनों दलों यानी जो इस निर्णय से सहमत और असहमत है, से हुई है। ताज्जुब की बात यह है कि दोनों ही दलों के पास अपने-अपने तर्क व दलीलें हैं और दोनों ही दल अपने-अपने तर्कों के साथ सही मालूम होते हैं पर उससे भी बड़ी हैरानी की बात यह है कि दोनों के तर्क ओशो के प्रवचनों में बोले गये वाक्यों पर आधारित हैं। यानी ओशो ने तब ऐसा कहा, वैसा कहा…। अपनी समझ के हिसाब से ओशो को, ओशो के ही शब्दों से, सही गलत साबित करने की कोशिश की जा रही है। अजीब स्थिति है, सारा खेल शब्दों के इर्द गिर्द उसी में उलझकर रह गया है। शब्द ही गुनेहगार और शब्द ही गवाह बन गए हैं।
ऐसी स्थिति में मैं इतना ही कहूंगा-
‘ओशो ने इतने सारे प्रवचन, इतने विभिन्न शब्द स्वयं को ज्ञानी साबित करने के लिए नहीं दिए थे। वह हमें शब्दों के माध्यम से नि:शब्द में ले जाना चाहते थे। वह चाहते थे कि हम शब्दों के जरिये शब्दों के पार अनहद तक की यात्रा करें। इतना ही नहीं, हम उनके किसी रूप या नाम से न बंधें इसके लिए वह अपने नामों को भी बदलते रहे। उनका प्रयास हमें नाम से अनाम की ओर ले जाने का था। पर जिस ओशो ने मनुष्य को हर तरह के बंधन से मुक्त करने की कोशिश की, आज उसका नाम अंग्रेजी के चार अक्षर ‘ह्रस्॥ह्र’ में ट्रेडमार्क बनकर कैद हो गया है। उनकी सारी मेहनत शब्द और नाम के बीच आकर अटक गई है। आज ओशो किसी सम्बुद्ध, रहस्यदर्शी सद्गुरु या महाचेतना का नाम नहीं रह गया। ओशो नाम एक बाजार में बिकने वाले अन्य प्रॉडक्ट की तरह एक प्रोडक्ट का नाम बन गया है। एक ब्रैंड बन गया है जिसके मालिक भी हैं और खरीदार भी। दुकानें भी है और बाजार भी। इस नाम का इस्तेमाल कब, कहां, कैसे और कितना करना है उसके नियम भी हैं और कानून भी, दाम भी हैं और दलाल भी।
किसी भी उच्च कोटि के संत या बुद्ध पुरुष से उसके नाम या पहचान के बारे में पूछो तो वह कहता है ‘नाम में क्या रखा है’ पर इस घटना के बाद तो और साफ हो जाता है कि नाम में ही सब रखा है। जबकि ओशो नाम को ट्रेडमार्क बनाने वालों का कहना है कि ‘यह सब उन निर्देशों के अनुसार हो रहा है जो स्वयं ओशो ने उन्हें जाने से पूर्व दिए थे।’ वह ओशो के कार्य को चौबीस कैरट सोने की तरह शुद्ध रखना चाहते हैं। क्या ओशो का नाम और योगदान इतना हल्का और सस्ता है जिसे कोई भी खराब कर सकता है? नहीं, ओशो का तेज इतना गहन और प्रखर है कि दुनिया की कोई ताकत उसे मैला और दूषित नहीं कर सकती। सोना यदि वास्तव में सोना है तो वह कीचड़ में पड़ा हो या नाले में, सोना सोना ही रहता है, उसके वजूद और अस्तित्व पर कोई आंच नहीं आ सकती, बल्कि वह तो आंच से और भी निखरता और संवरता है। मुझे समझ नहीं आता ओशो को ट्रेडमार्क बनाने वालों को चिंता सोने की है या कीचड़ की? उन्हें फिक्र ओशो की है या स्वयं की?
प्रेम से प्रहार उपज रहा है और हृदय से हुकूमत। शब्द शस्त्र बन गए हैं और ध्यान ध्वंस में जुटा है ये किस स्तर का सबूत है, कौन से लक्षण हैं संन्यासी के, उसके प्रेम और ध्यान के, कि ओशो नाम की पावन और दिव्य ध्वनि आज उन्हीं के लोगों द्वारा कोर्ट-कचेहरियों में घिसट रही है, तथाता की तरह नहीं तमाशे की तरह उठ रही है? न जाने इसमें किसकी और कैसी जीत है, यह सोचने वाली बात है? क्योंकि-
शब्द ही शिकार है और शब्द ही औजार
शब्द ही पतवार है और शब्द ही मजझधार।
