Are there any temples dedicated to Ganesha?

पार्वती नंदन गणपति के देश में कई मंदिर हैं। जिनकी अपनी ही महिमा है। कहीं गणपति के आगे नतमस्तक होने से ही मुरादें पूरी हो जाती हैं तो कहीं अपनी गलतियों की माफी मांगने भर से ही गणेशजी मन की सारी मुरादें पूरी कर देते हैं। तो आइए आपको गणपति के ऐसे ही 8 मंदिरों के दर्शन करवाते हैं।

सिद्धिविनायक मंदिर, मुंबई

यह प्रसिद्ध मंदिर महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई में स्थित है। यह शहर के वैभवशाली मंदिरों में से एक है। इस मंदिर का निर्माण 1801 में लक्ष्मण विठु और देउबाई पाटिल ने कराया था। इस मंदिर के अंदर एक छोटे मंडपम में भगवान गणेश के सिद्धिविनायक रूप की प्रतिमा प्रतिष्ठापित की गई है। सूक्ष्म शिल्पाकारी से परिपूर्ण गर्भगृह के लकड़ी के दरवाजों पर अष्टविनायक को प्रतिबिंबित किया गया है, जबकि अंदर की छतें सोने की परत से सुसज्जित हैं। गर्भ गृह में भगवान गणेश की प्रतिमा अवस्थित हैण् उनके ऊपरी दाएं हाथ में कमल और बाएं हाथ में अंकुश है और नीचे के दाहिने हाथ में मोतियों की माला और बाएं हाथ में मोदक लड्डुओं भरा कटोरा है। गणपति के दोनों ओर उनकी दोनों पत्नियां रिद्धि और सिद्धि मौजूद हैं जो धन, ऐश्वर्य, सफलता और सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने का प्रतीक है। मस्तक पर अपने पिता शिव के समान एक तीसरा नेत्र और गले में एक सर्प हार के स्थान पर लिपटा है। सिद्धिविनायक का विग्रह ढाई फीट ऊंचा होता है और यह दो फीट चौड़े एक ही काले शिलाखंड से बना होता है। सिद्धिविनायक मंदिर तक एक संकरी गली जाती है जिसे फूल गली के नाम से जाना जाता है। यहां बड़ी संख्या में पूजन सामग्री से पटी दुकानें स्थित हैं। यहां दुकानदार पूजन सामग्री तुलसी मालाए नारियल, मिष्ठान इत्यादि बेचते हैं।

श्रीमंत दग्दूसेठ हलवाई मंदिर, पुणे

श्रीमंत दग्दूसेठ हलवाई मंदिर महाराष्ट्र का दूसरा लोकप्रिय गणेश मंदिर है, जो पुणे में स्थित है। यह मंदिर अपने वास्तु कला के लिए भी प्रसिद्ध है। पुणे के दग्दूसेठ हलवाई के बेटे की प्लेग से मौत होने के बाद उसने इस मंदिर को 1893 में बनवाया था। इस मंदिर में देशकृविदेश से लोग भगवान गणेश के दर्शन के लिए आते हैं।

उच्ची पिल्लयार कोइल मंदिर, तमिलनाडु

तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली में त्रिचि नाम के स्थान पर रॉक फोर्ट पहाड़ी की चोटी है जहां भगवान गणेश का उच्ची पिल्लयार नाम का प्रसिद्ध मंदिर बसा हुआ है। यह मंदिर लगभग 273 फुट की ऊंचाई पर है और मंदिर तक पहुंचने के लिए लगभग 400 सिढ़ियों की चढ़ाई करनी पड़ती है। इस मंदिर की स्‍थापना का कारण रावण के भाई विभीषण से जुड़ा हुआ है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, रावण के वध के बाद श्रीराम ने विभीषण को भगवान रंगनाथ की मूर्ति भेंट की थी। श्रीराम ने विभीषण से कहा था कि इस बात का ध्यान रखना कि एक बार जहां भी यह मूर्ति रखोगे, वहीं यह स्थापित हो जाएगी। विभीषण उस मूर्ति को लंका ले जाना चाहते थे। रास्ते में विभीषण की इच्छा कावेरी नदी में स्नान करने की हुई, लेकिन वह मूर्ति को जमीन पर नहीं रखना चाहते थे। तभी भगवान गणेश चरवाहे का रूप धारण कर वहां आए और बोले कि तुम स्नान कर लो तब तक वे मूर्ति अपने पास रखेंगे। विभीषण मूर्ति देकर स्नान करने गए तभी गणेश जी ने भगवान रंगनाथ की मूर्ति को वहीं जमीन पर रख दिया।

रणथम्बौर गणेश मंदिर, राजस्थान

यहां त्रिनेत्री गणेश मंदिर है। पूरे देश से लोग मांगलिक कार्य के दौरान सपरिवार गणेश निमंत्रण के लिए त्रिनेत्री गणेश जी को बकायदा चिट्ठी लिखकर निमंत्रण देते हैं। घर में शादी ब्याह हो तो गणेश निमंत्रण अक्सर आसपास के प्रसिद्ध मंदिर में दिया जाता है लेकिन परम्परा है कि लोग शादी कार्ड रणथम्बौर में डाक या कुरियर से भिजवाते हैं। यहां भेजे जाने वाले कार्ड्स या चिट्ठियों पर बस इतना ही लिखना काफी होता है श्री गणेज जी रणथम्बौर। यहां पहुंचने वाले कार्ड्स को बाकायदा गणेश जी प्रतिमा के सामने लाकर उनके कान में पढ़कर सुनाया जाता है। साथ ही साथ गणेश जी के चरणों में कार्ड रख मांगलिक कार्य निर्विघ्न होने की कामना की जाती है।  हर वर्ष गणेश चतुर्थी के दिन मंदिर के पास गणेश मेला का आयोजन होता हैए जहां लाखों लोग आते हैं।

कनिपकम विनायक मंदिर, चित्तूर

यह विनायक मंदिर आंध्र प्रदेश में चित्तूर जिले में कनिपकम में स्थित है। कुलोथुंग चोला ने इस मंदिर का निर्माण कराया था। बाद में 14वीं सदी के प्रारंभ में विजयनगर साम्राज्य के शासकों ने इस मंदिर का विस्तार कराया। भगवान गणेश की पूजा अर्चना के लिए लाखों की संख्या में भक्त आते हैं। अधिकतर भक्त ब्रह्मोत्सवम फेस्टिवल के दौरान गणेश चतुर्थी को विनायक के दर्शन के लिए आते हैं।

मधुर महागणपति

श‍िव.पार्वती पुत्र गणेशजी का एक व‍िशेष मंद‍िर केरल में मधुरवाहिनी नदी के तट पर स्थित है। मंदिर का नाम मधुर महागणपति है। इसका न‍िर्माणकाल 10वीं शताब्दी का माना जाता है। कहते हैं क‍ि प्रारंभ में यह भोलेनाथ का मंदिर था। लेकिन एक द‍िन मंदिर के पुजारी का नन्‍हा सा बेटा मंदिर पहुंचा और मंदिर की दीवार पर गणेशजी की आकृति बना दी। कहते हैं मंदिर के गर्भगृह की दीवार पर बनाई हुई गणपति की आकृति धीरे.धीरे अपना आकार बढ़ाने लगी। धीरे.धीरे वह काफी बड़ी हो गई। तब से ही यह मंदिर गणपति का व‍िशेष मंदिर कहलाने लगा। कहते हैं क‍ि मधुर महागणपति मंदिर में एक बार टीपू सुलतान आया और मंदिर को ध्वस्त करना चाहा। लेकिन अचानक ही उसका दिमाग बदल गया और वह बिना मंदिर को क्षति पहुंचाए ही वापस चला गया। मान्‍यता है क‍ि गणपति अपने द्वार से कभी भी क‍िसी को भी खाली नहीं जाने देते।

बड़ा गणेश मंदिर

उज्जैन के प्रसिद्ध महाकालेश्वर मंदिर के पास स्थित बड़े गणेशजी का मंदिर बेम‍िसाल है। इस मंद‍िर में स्‍थाप‍ित गणपतिजी की प्रत‍िमा विश्‍वभर में स्‍थापित विशाल मूर्तियों में से एक है। जानकारी के अनुसार मंद‍िर में स्‍थापित गणेश प्रतिमा की स्थापना महर्षि गुरु महाराज सिद्धांत वागेश पं नारायणजी व्यास ने करवाई थी। आपको जानकर हैरानी होगी क‍ि बप्‍पा की इस मूर्ति में सीमेंट का नहीं बल्कि इसमें गुड़ और मेथी दानों का प्रयोग क‍िया गया है। साथ ही इस मूर्ति के निर्माण में ईंट, चूने, बालू और रेत का प्रयोग क‍िया गया है। मूर्ति को बनाने में सभी पवित्र तीर्थ स्थलों का जल और सात मोक्षपुरियों मथुरा, द्वारिका, अयोध्या, कांची, उज्जैन, काशी और हरिद्वार से लाई हुई मिट्टी भी मिलाई गई है। सभी पव‍ित्र तीर्थ स्‍थलों के जल और मोक्षपुर‍ियों की मिट्टी के चलते इस स्‍थान को और भी अध‍िक महत्‍वपूर्ण माना गया है।

चिंतामन गणेश मंदिर

भोपाल से 2 किलोमीटर दूर सीहोर में स्थित चिंतामन गणेश मंदिर का निर्माण राजा विक्रमादित्य ने कराया था। इस मंदिर में स्थापति मूर्ति  स्वयं गणेश जी राजा को प्रदान की थी और उनसे मंदिर निर्माण को कहा था। दंतकथा के अनुसार  एक बार राजा के स्वप्न में गणपति आए और पार्वती नदी के तट पर पुष्प रूप में अपनी मूर्ति होने का संकेत दिया और कहा कि इसे मंदिर में स्थापति कर दें। राजा विक्रमादित्य को पार्वती नदी के तट पर वह पुष्प मिला तो वह लेकर लौट रहे थे कि रास्ते में रात हो गई औ वह पुष्प वहीं रखकर विश्राम करने लगे और तभी वह पुष्प गणपति की मूर्ति में परिवर्तित होकर जमीन में धंस गया। अंगरक्षकों ने जंजीर से रथ को बांधकर मूर्ति को जमीन से निकालने की बहुत कोशिश की पर मूर्ति निकली नहीं। तब विक्रमादित्य ने गणमति की मूर्ति वहीं स्थापित कर इस मंदिर का निर्माण कराया।

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