विश्वासघात-गृहलक्ष्मी की कहानियां: Vishwashghat Hindi Story
Vishwashghat

Vishwashghat Hindi Story: रमेश के घर में घुसते ही मीनाक्षी का मन अंदर से दरक गया। हालांकि रमेश उसका पति था।परंतु जब से मीनाक्षी को लगा कि उसके प्रति अपने कर्तव्यों और दायित्वों का पूर्ण रुपेण निर्वाह नहीं कर रहे हैं तब से मीनाक्षी भी भर मुंह बात नहीं करती ।रात्रि का समय आने के साथ ही भारी थकान व बदन का पोर-पोर टूटने का नियमित जुमला सुनना पड़ता है। तब मीनाक्षी को ऐसा महसूस होता है कि कहीं दाल में जरूर कुछ काला है। जब वह पहली बार इस घर में आई थी उसके प्रति एक नई उमंग उत्साह का दरिया था वह बार-बार वह उसमें डूबती उतराती। और जब उसके पिता विदाई कराकर अपने घर लेकर गए तो रमेश ने कहा था-‘ मीनाक्षी कैसे रह पाऊंगा मैं ।’

इस पर मीनाक्षी ने कहा था-‘यही बात तो इधर भी है।जितनी तड़प तुम्हारे अंदर है उतना ही मेरे अंदर है। परन्तु ये तो दुनियादारी है।थोड़े समय की बात है।माह-दो-माह सरकने में कितना टाइम लगता है भला।

मीनाक्षी की अपनत्व भरी बातों से रमेश को काफी सुकून मिला था।दो महीने बाद जब मीनाक्षी इस घर में दूसरी बार आई थी तो उसके प्रति रमेश ने कोई खास दिलचस्पी व रुचि नहीं दिखाई।न आने की खुशी की इजहार कियाऔर न बिछड़ने की गम की परछाइयां ही थी।दांपत्य जीवन सुखमय खुशहाल व समृद्ध तभी होता है जब तन और मन दोनों तृप्त हो।आज उसे पंद्रह दिन आए हुए हो गए हैं परन्तु एक दिन भी पति का सुख नसीब नहीं हुआ।

‘क्या सोच रही हो मीनाक्षी।’रमेश रटा रटाया वाक्य बोला।

‘ कुछ नहीं ।’वह रूखेपन से बोली।उसकी बातों में तनिक भी अपनत्व वह स्नेह का भाव या रस नहीं था।जो रमेश को आकृष्ट कर सके अपनी ओर।क्योंकि यह जुमला इन पंद्रह दिनों में कई बार आजमा चुकी है।परंतु कभी भी संतोषजनक फल नहीं मिला।उसने दूसरा रुख अख्तियार कर लिया ताकि उसका पति कुरेदे और वह इतने दिनों का हिसाब मांगे।

‘उदास हो।’ रमेश तनिक मुस्कुराते हुए बोला-‘ मैं सब समझता हूं ।मीनाक्षी तुमको वह सुख नहीं मिल रहा है जो हर पत्नी अपने पति से अपेक्षा रहती हैं।’

रमेश के इतना कहते ही मीनाक्षी को जैसे छेड़ने का एक अवसर मिल गया।वह बोली-‘एक पर आश्रित रहते तब न!’

‘मीनाक्षी तुम होश में तो हो।’ रमेश को इतना कहते ही अबकी बार मीनाक्षी के सब्र का पैमाना सीमाओं के बांध तोड़कर बाहर आ गया-‘ तुम मर्द-मानुष एक ही थाली के चट्टे बट्टे हो।’

रमेश भौंचक्का हो टुकुर-टुकुर मीनाक्षी का चेहरा देखने लगा था।काफी क्षण के पश्चात बोला-‘तुम सरासर लांछन लगा रही हो मुझ पर।’

‘हकीकत को लांछन में क्यों बदल रहे हो।’मीनाक्षी का तेवर उत्तेजित होकर तीखेपन में बदल गया-‘आधी रात गुजरने के बाद घर आते हो।कहां रहते हो इतनी रात तक।कौन सौत है वह?’

अभी मीनाक्षी कुछ और कहती इसके पहले ही रमेश का हाथ हवा में लहराया और झटके के साथ तड़ाक के साथ मीनाक्षी के गाल पर पड़कर वापस लौट आया।

मीनाक्षी इस स्थिति के लिए तैयार नहीं थी।थप्पड़ लगते ही वह धड़ाम से जमीन पर गिर पड़ी।

‘ना समझ कहीं कि।रमेश गुर्राया-‘ बस सिर्फ अपना ही देखती हो।दूसरे के उपर क्या बीत रही है इसका तनिक भी ग़म नहीं तुमको।तुम ये पूछती आखिर मुझसे उपेक्षितों की तरह क्यों पेश आ रहे हो ?क्या कारण है तो मैं मानता कि भीतर से जितना मैं दुखी हूं उतना तुम भी दुखी हो।पर इंसान को गलत रास्ते ही अधिक सुझते हैं।’

मीनाक्षी तब तक उठकर सहमी सिकुड़ी खड़ी हो गई थी। हिचकियों का दौर अपने चरम पर था।चेहरे पर पश्चाताप की परछाइयां खींच गई थी।अभी उसने बोलने के लिए मुंह खोला ही था कि रमेश फिर शुरू हो गया-‘हृदय के अंतरण की गहराइयों में जो बात खलबली मचा रही थी।जुबान पर आ ही गई ।इतना कह रमेश वापस जाने के लिए मुड़ा ही था कि लालटेन की मद्धिम रोशनी में फर्श पर खून का धब्बा देख सहम गया।उसने नजरें उठाकर मीनाक्षी को देखा।सर फटा देखकर पूर्व की बातें भूल,उसने उसके जख्मों पर हाथ रख दिया था।

मीनाक्षी खामोश तब तक पूर्णरूपेण होश में आ गई थी।उसने अपनी जेब से रुमाल निकालकर मीनाक्षी के सर पर बांध दिया और दराज से मरहम ले आने दूसरे कमरे की ओर दौड़ा।मरहम लेकर आते ही उसने जख्म पर से रूमाल हटाकर मरहम लगा दिया।

मीनाक्षी खामोश दृष्टि से रमेश के चेहरे को निरंतर पढ़ती रही। वह मन-ही-मन सोचने लगी।क्या उसका पति उसे छोड़कर किसी दूसरे के साथ रंगरेलियां मना सकता है।जख्मों को सहला रहे हाथों में कितना प्यार अपनत्व वह स्नेह भरा था।जब रमेश ने मरहम लगाकर हाथ हटाया तो मीनाक्षी ने उसके हाथों को पकड़कर चूम लिया था।आंखों में ढेर सारे पश्चाताप का जो भाव छिपा था वह शनै-शनै अश्कों के रूप में ढ़लकर आंखों की राह से बहने लगा था।मुझे माफ कर दीजिए।

रमेश स्वच्छंद हंसी हंसते हुए कहा-‘तन का मिलन तभी संभव होता है जब मन तनाव रहित हो।मैं एक ऐसी मुसीबत में फंस गया हूं खाने-पीने तक की सुध नहीं।’

मीनाक्षी ने ढ़ाढ़स बंधाया।मुसीबतों का सामना डटकर करना चाहिए।भागते फिरते रहने से यदि समाधान हो जाता तो हर कोई यही रास्ताअख्तियार करता।’

रमेश अपलक मीनाक्षी को देखता रहा।उसे देखकर कभी ऐसा नहीं लगा कि थोड़ी देर पहले इस कमरे का वातावरण कितना तनावग्रस्त था।

रमेश बोला-‘भारी मुसीबत सामने आ पड़ी है।मेरे दफ्तर में मेरे हाथों से तकरीबन पचास हजार रूपये का गबन हो गया है। फाइनेंस कंपनी में हूं न पैसे का कारोबार तो होता ही रहता है। भूलवश किसी को अधिक पैसे दे दिए हो।

तब?’मीनाक्षी ने बात आगे बढ़ाई।

मेरे पास अब कोई फंड भी नहीं।सारे फंड व बैंक में जमा रुपए बहन की शादी में स्वाहा हो गया और यहां पचास हजार की बात है।पास में दस रूपए भी नहीं।’

‘तो मैं बाबूजी से पचास हजार ले लूं।सहूलियत अनुसार बाद में लौटा देंगे।’

नहीं मीनाक्षी।’रमेश ने चेताया-‘एक तो पहले से ही बाबूजी का मुझ पर कितना उधार चढ़ा हुआ है।जुबान कैसे खोलोगी तुम उनके पास?’

‘वह सब मुझ पर छोड़ दीजिए।मीनाक्षी ने कहा’ हम दो बहनों के सिवा कौन है उनका।सारी संपति तो हम दोनों बहनों का ही है न?’

खैर रमेश गंभीर हो गया-‘तुम्हारी छोटी बहन आरती के पति का क्या नाम है…हां आतिश।वह तो बड़ा ही कांइया स्वभाव का लगता है।मुझसे भी ढ़ंग से बात नहीं करता।कैसे आरती झेलती है उसको।लगता है बाबूजी को नींबू की तरह निचोड़ लेगा।अभी एक सप्ताह पहले दुकान खोलने के बहाने बाबू जी कुछ पैसे उधार ले गया है।जबकि उसको दुकान वगैरह कुछ खोलना नहीं है।’

‘झूठ से तो मुझे खासी नफरत है।’मीनाक्षी तमतमा गई -‘अच्छा कल जाती हूं बाबूजी के पास।’

‘ठीक है जैसी तुम्हारी मर्जी।’रमेश बोला-‘अब मन कुछ हल्का हो गया है।रात काफी बीत चुकी है।चलो दो-चार कौर खा लेते हैं ।वैसे मेरी तो तनिक भी खाने की इच्छा नहीं थी।परंतु तुम्हारी बातों से मुझे काफी हिम्मत बंधी हैऔर दिल को चैन व सुकून नसीब हुआ है।सच मीनाक्षी ऐसी पत्नी किस्मत वालों को ही नसीब होती है।’

‘धत!’इतना कह मीनाक्षी मुस्कुराती हुई दुगूने उत्साह से रसोई में समा गई थी।खाना खाकर सोते वक्त तक रात्रि के बारह बज गए थे ।आज रमेश भरपूर नींद सोया।मीनाक्षी भी आज पंद्रह दिनों से तनावग्रस्त थी और उसका प्रतिफल ज्वालामुखी के रूप में उसके सीने में उबल रहा था।धुआं रहितआग अंदर -ही-अंदर सुलग रही थी।उसकी तपीसआज शांत हो गई थी। और वह दोनों एक दूसरे के बाहों में समाए चैन की नींद सो रहे थे।

सुबह होते ही रमेश का बदन बुखार से गर्म तवे की तरह दहक रहा था।दर्द से बदन का पोर पोर पुट रहा था।

मीनाक्षी रसोई के कार्यों से निवृत्त होकर रमेश के पास आ गई थी।माथे पर हाथ रखा बुखार था।वह समय न गंवाते हुए चौमुहाने पर डा.लाल के चेंबर की ओर मुड़ गई।

इधर रमेश विस्तर से उठकर दराज से बुखार की दवा निकाली और पानी के साथ गटक कर वापस बिस्तर पर आ गया।घंटे भर के उपरांत रमेश का बुखार उड़न छू हो गया था।उसने कमरे से निकलकर पड़ोस के घर सेअपने दोस्तों को फोन करके बुला लिया था।

 मीनाक्षी के घर आते तो दिन का सूरज सर पे सवार होकर आग का गोला बरसाने लगा था।मीनाक्षी अकेले ही घर आ रही थी।क्योंकि मीनाक्षी जब डा.लाल के पास पहुंची थी उस समय उनके पास रोगियों की लंबी कतार थी।

डॉक्टर लाल ने मीनाक्षी के घर का पता लिखकर काम से निबटने ही आने की इतला देकर उसको वापस भेज दिया।

मीनाक्षी को जीने की सीढ़ियां चढ़ते वक्त रमेश का प्रफुल्लित स्वर उसके कानों से टकराया।वह काठ की तरह वही खड़ी हो गई।

रमेश अपने दोस्त सुरेश और कामेश से कुछ रहा था-‘यार कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है।एक पखवारा किस तरह काटा वह मैं ही जानता हूं।कलाकार वही सफल होता है जब चेहरे पर अभिनय के मुताबिक भाव लाता हो।सच यार मेरा अभिनय तो लाजबाव था।मेरी पत्नी बड़े ही नेक विश्वासी है। मेरे किसी भी बात पर विश्वास कर लेती है।

इधर मीनाक्षी दबे पांव मुख्य दरवाजे तक आ गई थी।रमेश कह रहा था-‘यार मेरी पत्नी तो सोने का अंडा देने वाली ऐसी मुर्गी है जो रोजाना तू नहीं पर वक्त पड़ने पर तो न्यारा-व्यारा कर देती है।बेचारी डा.लाल के पास गई है।उसे मालूम नहीं कि बुखार की दवा तो घर में मौजूद है।’

इस पर सुरेश बोला-‘बेचारी को नाहक धूप में दौड़ा दिया।खैर,छोड़ो पैसा कब तक लेकर आने वाली है।’

आ जाएगी तो कल लेकर आ जाएगी रमेश बोला-‘कितनी नासमझ है।कह दिया मुझसे कुछ पैसों का गबन हो गया।’

रमेश के इतना कहते ही कमरे में सम्मिलित ठहाका गूंज गया। 

    मीनाक्षी कुछ जबाव तलब किए बिना वापस मुड़ गई थी। क्योंकि उस समय वह कोई ठोस निर्णय लेने की स्थिति में नहीं थी।क्योंकि उसके विश्वास पर कोई और नहीं स्वयं उसके पति ने घात किया है।काश !वह रमेश को अच्छी तरह अपनी कसौटी के मापदंड पर गहराई से परखी होती तो ये नौबत नहीं आती।वह पहले ही वापस लौट जाती।जिंदगी के डगर पर गलत जगह कदम पड़ गया था।जिस पेड़ की अपनी छांव नहीं वह दूसरे को क्या छांव प्रदान करेगा।

फिर भी लौटते वक्त उसने इतना जरूर तो निर्णय तो ले लिया था कि जो घात उसके साथ हुआ है अब वह अपने पिता के साथ नहीं कर सकती।

मीनाक्षी को गए काफी वक्त हो गया था।इसलिए रमेश व उसके साथी कमरे से जैसे ही बाहर निकले सामने के लेटर बॉक्स पर मीनाक्षी के हाथों लिखा ताजा मरीन पर्चा देख रमेश के साथ -पांव फूल गए।

रमेश जिस कुल्हाड़ी से वार किया था उस वार से वह खुद घायल हो गया।जिस विश्वास पर आघात हुआ हो अब जिंदगी का बाकी रात काटना मुश्किल लग रहा था मीनाक्षी को।उसका लौटना असंभव नहीं नामुमकिन भी था।