vedon ka kathan
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नेत्रहीन महाराज धृतराष्ट्र के मन में जो भी शंका होती या प्रश्न उठता, वह उसका उत्तर पाने के लिए अपने दिमाग पर अधिक बोझ नहीं डाला करते। वह तो महामंत्री विदुरजी से पूछ लेते। उन्हें संतोषजनक उत्तर मिल जाया करता। आज भी धृतराष्ट्र के मन में एक प्रश्न उठा।

उन्होंने विदुरजी को बुलवाकर पूछा-आप उच्च कोटि के ज्ञानी और महात्मा हैं। मेरे हर प्रश्न का उचित उत्तर देते हैं। आज मैं जानना चाहता हूँ कि वेदों में व्यक्ति की आयु सौ वर्ष बताई गई है। मनुजी ने भी इन सौ वर्षाे को चार आश्रमों में विभक्त कर दिया किंतु मनुष्य सौ तक पहुँचता ही नहीं उससे काफी पहले मर जाता है। क्या इसका अर्थ यह है कि वेदों में गलत लिखा है? वेदों में जो लिखा है महाराज, वह तो अक्षरशः सत्य है। किसी भी कसौटी पर क्यों न परख लें।

यह तो आदमी ही है, जो कम आयु में मरने के लिए जिम्मेदार है। पूरे सौ साल नहीं जी पाता। इसमें आदमी का क्या कसूर? धृतराष्ट्र ने पूछा। जिन कारणों से मृत्यु पहले आ जाती है, वे ये है- बहुत ज्यादा अभिमान करना, जरूरत से ज्यादा बोलना, व्यक्ति में त्याग की कमी, गुस्सा, स्वार्थ और मित्रद्रोह। यही छह तेज खंजर व्यक्ति की आयु कम कर देते हैं।

जो जितना अधिक दोषपूर्ण जीवन जीता है, वह उतनी जल्दी मरता है। इसमें परमात्मा का कोई कसूर नहीं, न ही वेदों का उल्लेख गलत है। जो व्यक्ति सतर्क रहकर इन सभी दोषों से बचा रहेगा, वह निश्चित रूप से सौ वर्ष तक जीवित रह पाएगा।

ये कहानी ‘इंद्रधनुषी प्रेरक प्रसंग’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएंIndradhanushi Prerak Prasang (इंद्रधनुषी प्रेरक प्रसंग)