एक बार धृतराष्ट्र ने विदुरजी से प्रश्न किया, “महात्मन मैंने यह पाया कि प्रायः सभी वेदों में पुरुष की आयु सौ वर्ष की बतायी गयी है, किन्तु मैंने यह अनुभव किया कि बिरले ही लोग इस आयु तक पहुँच पाते हैं। सौ वर्ष की आयु प्राप्त करने के पूर्व ही व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है। क्या इससे वेद में लिखा हुआ असंगत सिद्ध नहीं होता?” विदुरजी ने उसका उत्तर निम्न श्लोक में दिया
अतिमानोऽतिवादश्च तथा त्यागो नराधिप।
क्रोधश्चात्मविधित्सा च मित्रद्रोहश्च तानि षट्।।
एत एवासयस्तीक्ष्णाः कृन्तन्त्यायूंषि देहिनाम्।
एतानि मानवान् घ्नन्ति न मृत्युर्भद्रमस्तु ते।।
-‘हे राजन्! आपका कल्याण हो! अत्यन्त अभिमान, अधिक बोलना, त्याग का अभाव, क्रोध, अपना ही पेट पालने की चिन्ता (स्वार्थ) और मित्रद्रोह, ये छः तीखी तलवारें देहधारियों की आयु को काटती हैं। ये ही मनुष्यों का वध करती हैं, मृत्यु नहीं। जो मनुष्य इन छः बातों से बचकर रहे, निश्चय ही वह सौ वर्ष की आयु तक जी सकेगा।”
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