thithuri hui khamoshi
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Hindi Kahani: ” शीतल हवाएं बहुत तेज चल रही थीं , रात का समय होने के कारण सभी जगह सुनसान थीं , किसी की कमरे की खिड़की खोलने की हिम्मत भी नहीं थी सब कुछ रुक गया था ऐसा अनुमान लगाया गया था कि इस बार की सर्दी बहुत खतरनाक होगी शायद यह अनुमान सही लगाया गया था क्योंकि अब तक खबरें कुछ ऐसी ही मिल रही थीं।

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देखते हैं आगे क्या होगा अभी तो सर्दियां शुरू ही हुई हैं ” राकेश अपने हाथों में लिए हुए उपन्यास पढ़ रहा था क्योंकि उसके यहां सर्दियों का मौसम था और रात में उसे नींद भी नहीं आ रही थी इसलिए बेचैनी से बचने के लिए उसने उपन्यास को पढ़ने का निश्चय कर लिया था राकेश अक्सर ” सर्द रात ” होने पर अपनी ” ठिठुरी हुई ख़ामोशी ” को एक नया रूप देने की कोशिश करता था। राकेश एक बैंक में मैनेजर की नौकरी करता है और शेष समय लिखने और पढ़ने की कोशिश करता है राकेश अपना स्वयं का उपन्यास लिखना चाहता है मगर अपने भय के कारण वह हिम्मत नहीं जुटा पाता है और उपन्यासकारों के उपन्यासों में वह अपनी छवि और सपने को देखकर संतुष्टि प्राप्त कर लेता है। राकेश के परिवार में उसकी बहन और माता – पिता हैं जो गांव में रहते हैं अपने वेतन से कुछ हिस्सा वह अपने घर भेज देता है , परिवार उसकी नौकरी से बहुत खुश मगर राकेश के अंदर की खुशी , प्रतिभा और सपनों से अनजान रहता है। 

इसकी जानकारी सिर्फ राकेश को थी मगर राकेश अपने परिवार से यह कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाया था कि वह उपन्यासकार बनना चाहता है वह यह बैंक में मैनेजर की नौकरी छोड़ना चाहता है , मगर परिवार में राकेश सिर्फ एक नौकरी करने वाला व्यक्ति है। घर की आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं थी। राकेश की ” सर्द रात ” में ” ठिठुरी हुई ख़ामोशी ” अब बहुत कुछ कहना चाहती थी। रात गहरी होने लगी थी राकेश उपन्यास को टेबल पर रखकर सोने के लिए चला जाता है। राकेश अब नींद की दुनिया में सपनों के शहर में घूमने लगता है वह स्वयं को एक उपन्यासकार के रूप में देखकर खुश होता है जो अपने उपन्यास को आगे ले जाने के लिए सोच रहा होता है। अलग – अलग प्रयोग करने के बाद राकेश एक जगह चाय की गुमटी पर रुक जाता है वहां कुछ लोग चाय की चुस्कियों के साथ में कभी राजनीति पर तो कभी समाज में अपराधों, कुरीतियों और अराजकता पर अपनी – अपनी राय रखते हुए चर्चा कर रहे थे। नींद की दुनिया में भी वह अपनी कलम को साथ लिए हुए था वह सब कुछ सुन रहा था और कलम से चाय की गुमटी पर उपस्थित लोगों की चर्चाओं को अपनी डायरी में लिख रहा था। कुछ देर बाद वह आगे चलने लगता है वहां उसे कुछ लोग मिलते हैं जो अपने रिश्तेदारों और सपनों के बीच में उलझी हुए अपनी भावनाओं को एक – दूसरे से कह रहे थे। राकेश इनकी भावनाओं को डायरी में लिखकर आगे चलने लगता है। 

राकेश अपनी नींद की दुनिया में सपनों के शहर में ही था मगर अचानक एक परिचित आवाज ने उसको जागृत अवस्था में लाकर उसकी यह उपन्यासकार की यात्रा को विराम दिया। राकेश अपने बिस्तर से उठकर दरवाजा खोलता है दूध वाले भईया उसे दूध देकर चले जाते हैं और कुछ ही पलों में अखबार वाले भईया उसे अखबार देकर कहते हैं – ” राकेश भईया हमारा इस महीने का हिसाब कर देते तो अच्छा होता “। यह सुनकर राकेश अपने पर्स से अखबार वाले भईया का हिसाब कर देता है। अखबार वाले भईया कहते हैं – ” जी धन्यवाद , राकेश भईया आपका उपन्यास कहां तक पहुंचा है हम कोई सहायता करें “। राकेश कहता है – ” जी उपन्यास अभी सफर पर है “। राकेश का मन ” सर्द रात ” में ” ठिठुरी हुई ख़ामोशी ” लिए हुए किसी वृद्ध शरीर की तरह हो गया था। मगर परिवार की जिम्मेदारियों के कारण वह एक झूठी मुस्कान लेकर बैंक के लिए तैयार होने लगता है। घर से बैंक का रास्ता राकेश के लिए बहुत डरावना था ऐसा लग रहा था जैसे राकेश कोई जुर्म करने जा रहा है। एक ऐसा जुर्म जिसकी कानून की किताब में कोई भी सजा नहीं है। उसकी सजा सिर्फ आत्मा की कानून रूपी किताब में ही थी। राकेश बैंक पहुंच चुका था वह बैंक की प्रतिदिन की औपचारिकता पूरी करके अपने मैनेजर के कक्ष में चला जाता है आज सप्ताह का पहला दिन है इसलिए काम सिर्फ औपचारिकताओं को पूरा करना ही था। 

बैंक में दोपहर के खाने का समय हो गया था सभी अपने कक्ष से बाहर आ जाते हैं और अपने – अपने खाने के डिब्बों को लेकर एक साथ भोजन करने लगते हैं मगर राकेश अपने कक्ष में ही बैठा रहता है उसके सहकर्मी उसे आवाज देकर भोजन करने के लिए बुला लेते हैं राकेश उनका दिल रखने के लिए उनके साथ भोजन कर लेता है भोजन करते समय सभी अपनी – अपनी जिंदगी की बातें भी करने लगते हैं जिनको राकेश बहुत ध्यान से सुनने लगता है और अपनी कल्पनाओं की दुनिया में इन्हें उपन्यास का रूप देने की कोशिश भी करने लगता है। तभी एक सहकर्मी राकेश से पूछता है – ” राकेश जी आप भी हमें बताएं कुछ अपनी जिंदगी के बारे में हमने सुना है आप उपन्यास लिख रहे हैं हमारी इन बातों को भी अपने उपन्यास में शामिल कर लीजिए “। राकेश के साथ में सभी मुस्कुराने लगते हैं। दोपहर के भोजन का समय पूरा हो जाता है और सभी अपने कक्ष में चले जाते हैं और अपने काम को पूरा करने लगते हैं। राकेश भी अपने कक्ष में चला जाता है और आज की ” सर्द रात ” में अपनी ” ठिठुरी हुई ख़ामोशी ” को छोड़कर अपनी सपनों की जिंदगी का आनन्द लेने के लिए अपने सहकर्मियों की बातों को अपनी डायरी में लिखने लगता है। कुछ पलों बाद वह बैंक से सभी सहकर्मियों के साथ में घर की ओर चल देता है। राकेश अपने कदमों के साथ में एक नई कहानी लिखने लगता है। 

राकेश घर आकर अपने सपने और बैंक में सुनी हुई सभी कहानियों और अनुभवों को एक साथ जोड़कर देखता है उनमें से कुछ कहानियां उसके व्यक्तिगत जीवन से जुडी हुई थीं उसने उन सभी कहानियों को आधार बनाकर अपने उपन्यास में शामिल करना शुरू कर दिया। अब उसकी जिंदगी बैंक और उपन्यास के बीच में चलने लगी थी उसने अपने परिवार को भी इस बारे में बताकर कोई अपराधबोध नहीं रखा। अब राकेश की ” सर्द रात ” में सिर्फ ” ठिठुरी हुई ख़ामोशी ” ही नहीं थी जो उसकी तकलीफ़ की साक्षी थी अब वातावरण में नया मौसम आने लगा था जो राकेश के जीवन में नए फूलों का स्वागत करने वाला था। परिवार को पहले जब उसके सपनों के बारे में पता चला तो उन्होंने राकेश के फैसलों को गलत माना। मगर समय के साथ में जब उन्होंने अपनी विचारधारा को नया रूप दिया तो उन्होंने अपने बेटे को आशीर्वाद दिया कि उनके बेटे का उपन्यास विश्व स्तर पर पहुंचकर सबको प्रेरणा देकर मानव का कल्याण करता रहे। राकेश अब ज्यादा से ज्यादा व्यक्तियों से मिलने लगा उनके साथ में बैठकर उनकी बातों को सुनने लगा और अपने उपन्यास में उनको स्थान देने लगा उसका व्यवहार अब बहुत बदलने लगा था पहले वह घर में सिर्फ उपन्यास ही पढ़ता था मगर अब वह उपन्यास लिखता है। राकेश पहले बैंक मे अपने कक्ष में बैठकर सिर्फ अपना काम ही करता था मगर अब वह बैंक में अपने सभी सहकर्मियों से मिलने लगा। उनसे बातें करने लगा और उनकी जिंदगी से जुड़े अनुभवों और किस्सों को डायरी में लिखने लगा। बैंक और घर में सभी उसके इस व्यवहार से बहुत खुश होते हैं। 

समय आगे बढ़ने लगता है राकेश का उपन्यास अब समापन की तरफ आगे बढ़ने लगता है। राकेश अपने उपन्यास को अंतिम रूप देने के बारे में विचार करने लगता है वह कुछ नए लोगों से मिलकर कुछ सवाल करता है मगर इन सवालों के उत्तर उसे अपने उपन्यास के लिए सही नहीं लगते हैं वह बहुत दिनों तक कुछ नहीं लिखता है कुछ ही दिनों बाद राकेश अपने परिवार के पास चला जाता है। वहां कुछ दिन रुककर राकेश परिवार की दैनिक दिनचर्या को देखता है पिताजी सुबह अपने खेत पर चले जाते हैं माता जी घर को साफ करने लगती हैं और बहन अपने कॉलेज के लिए तैयार होने लगती है परिवार एक साधारण जीवन का आनंद लेकर खुश था उन्हें किसी से आगे रहने की ख्वाहिश नहीं थी और किसी से पीछे रहने का अफ़सोस भी नहीं था। अपने परिवार की दैनिक दिनचर्या ने राकेश को बहुत प्रभावित किया। अपनी ” सर्द रात ” की ” ठिठुरी हुई ख़ामोशी ” को स्वीकार करके उसका परिवार अपने जीवन में कर्मों को महत्व देता है। यह सब देखकर राकेश अपने समाज और आधुनिकता की बातें करने वाली नई पीढ़ियों को एक संदेश देने के लिए उन्हें अपने उपन्यास में शामिल कर लेता है। कुछ समय बाद राकेश का उपन्यास प्रकाशित होकर विश्व में अपनी एक अलग पहचान बनाने लगता है।