tamas manu
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Bhagwan Vishnu Katha: प्राचीन समय की बात है – पृथ्वी पर स्वराष्ट्र नामक एक प्रसिद्ध राजा हुआ । वह अत्यंत पराक्रमी था । भगवान् सूर्य ने प्रसन्न होकर उसे दीर्घायु प्रदान की थी । स्वराष्ट्र की सौ रानियाँ थीं, किंतु समयानुसार सभी मृत्यु को प्राप्त हुईं । इसी प्रकार राजा स्वराष्ट्र के मंत्री और सेवक भी काल का ग्रास बनते गए । उनके बिना राजा स्वराष्ट्र दु:खी रहने लगा । धीरे-धीरे उसकी शक्ति क्षीण होती गई । तब विमर्द नामक राजा ने आक्रमण कर उसके राज्य पर अधिकार कर लिया और स्वराष्ट्र दु:खी होकर वन में चला गया ।

एक बार कई दिनों तक लगातार वर्षा होने के कारण नदी में भीषण बाद आ गई । स्वराष्ट्र भी नदी के जल में बहने लगा । चारों ओर घना अंधकार छाया हुआ था । बहते-बहते संयोगवश उसे नदी में बहती एक मृगी मिल गई । उसने मृगी की पूँछ पकड़ी और इधर-उधर भटकते हुए किनारे पर पहुँच गया ।

मृगी के स्पर्श से उसे आनन्द का अनुभव होने लगा । कामदेव के अधीन होकर उसने उसके साथ समागम किया । तब वह मृगी मनुष्य-स्वर में बोली – “राजन ! पूर्वजन्म में मैं राजा दृढ़धन्वा की पुत्री और आपकी पटरानी उत्पलावती थी । आज आपके स्पर्श से मैं शाप-मुक्त हो गई । “

स्वराष्ट्र आश्चर्यचकित होकर बोला – “उत्पलावती ! तुम तो बड़ी पतिव्रता और धर्मपरायण नारी थी फिर भी तुम्हें मृग-योनि में जन्म लेना पड़ा?”

मृगी बोली – “राजन ! जब मैं बालिका थी, तब एक दिन मैं सखियों के साथ वन में घूमने गई । वहाँ मैंने मृग-मृगी के एक जोड़े को प्रेम में मग्न देखा । मैं मृगी के निकट ही खड़ी थी । मुझसे डरकर मृगी वहाँ से भाग गई और जो मृग था वह वास्तव में निवृति चक्षु नामक मुनि का पुत्र था । मृगी के जाने से वह कुपित हो गया और उसने मुझे मृगी बनने का शाप दे दिया । तब मैं उससे अपने अपराध की क्षमा माँगने लगी । प्रसन्न होने पर उसने कहा कि मृत्यु के बाद मैं मृगी की योनि में जन्म लूंगी, जहाँ एक तेजस्वी व्यक्ति के संसर्ग से मुझे एक पुत्र प्राप्त होगा । मुनि-स्पर्श के बाद मैं मनुष्य की भांति बोलने लगूंगी । पुत्र के जन्म के बाद इस योनि से मुक्त होकर मुझे मोक्ष प्राप्त होगा । वह बालक अपने पिता के शत्रुओं का नाश करके सम्पूर्ण पृथ्वी को अधिकार में कर लेगा । तत्पश्चात् वह मनु-पद पर प्रतिष्ठित होगा ।”

स्वराष्ट्र को सारी बात बताकर मृगी चुप हो गई । इसे भाग्य का खेल मानकर दोनों साथ-साथ रहने लगे ।

उचित समय आने पर मृगी ने एक पुत्र को जन्म दिया । पुत्र को जन्म देने के बाद मृगी परलोक सिधार गई । तामसी योनि में पड़ी हुई माता के गर्भ से जन्म लेने के कारण बालक का नाम तामस रखा गया । स्वराष्ट्र उसका पालन करने लगा । युवा होने पर तामस ने अपने पराक्रम के बल पर पिता के शत्रुओं को परास्त कर सम्पूर्ण पृथ्वी पर अधिकार कर लिया और चौथे मनु पद पर आसीन हुआ ।

इस मन्वंतर में शिखी नामक इन्द्र हुए । पृथु, काव्य, अग्नि, धाता, कपीवान्, जहु और अकपीवान् – ये सप्तर्षि थे । इस मन्वंतर में भगवान् विष्णु हरिमेधा नामक ऋषि की पत्नी हरिणी के गर्भ से हरि नाम से अवतरित हुए । इस अवतार में उन्होंने ग्राह (मगरमच्छ) से गजेन्द्र (हाथी) की रक्षा की थी ।

ये कथा ‘पुराणों की कथाएं’ किताब से ली गई है, इसकी और कथाएं पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं Purano Ki Kathayen(पुराणों की कथाएं)