त्रुटि हो तो सुधार लो - स्वामी विवेकानंद की कहानी
त्रुटि हो तो सुधार लो - स्वामी विवेकानंद

खेतड़ी में एक ऐसी घटना घटी, जिसने स्वामी जी के जीवन को नई दिशा देने में अहम भूमिका निभाई। वे आजीवन उस घटना को याद करते रहे। वे अक्सर अपने भाषणों में भी इस घटना का वर्णन करते थे। जब वे खेतड़ी पहुंचे तो वहां के राजा ने प्रणाम किया और मानस्वरूप पच्चीस रूपए भेंट में दिए, जो उस समय के हिसाब से बहुत बड़ी राशि मानी जाती थी ।

राजा ने स्वामी जी को हाथी की सवारी करवाई और अपने भव्य महल में ले गए। अगले दिन शाम को वहां एक नर्तकी के नाच-गाने का कार्यक्रम था। जब स्वामी जी को वहां बुलवाया गया तो वे बोले, “ मैं तो एक संन्यासी हूं। क्या मेरा वहां जाना ठीक होगा?”

उनकी ये दुविधा नर्तकी तक भी पहुंची और वह दुखी हो कर भजन गाने लगी।

प्रभु मेरे अवगुण चित्त न धरौ !

समदर्शी है नाम तिहारो ।

अब मुझे पार करो ।

इक लोहा पूजा में राखत !

इक घर बधिक परे !

पारस गुण अवगुण नहीं चित्तवे

कंचन करत खरो !!

त्रुटि हो तो सुधार लो - स्वामी विवेकानंद की कहानी
त्रुटि हो तो सुधार लो – स्वामी विवेकानंद

स्वामी जी के कानो में यह भजन गया तो वे व्याकुल हो गए। उन्हें लगा कि उस गणिका ने उनके ज्ञान को ही चुनौती दे दी है। इस संसार के प्रत्येक प्राणी में उस ईश्वर का ही वास है, चाहे वह संन्यासी हो या पुरुष या फिर कोई गणिका । वे उनमें भेद करने वाले कौन होते हैं। एक संन्यासी होने का मतलब यह तो नहीं कि वे उस नाचने-गाने वाली से खुद को ऊंचा मानने लगें ? गणिका के गाए भजन ने स्वामी जी की सोच बदल दी और उन्हें यह मानने पर मजबूर कर दिया कि प्राणी मात्र से भेदभाव करना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं माना जा सकता।

वे भागे-भागे सभा में जा पहुंचे, जहां वह नर्तकी आंखों में आंसू लिए भजन गा रही थी। वे उसके चरणों में गिर पड़े और क्षमा याचना की। वह दृश्य जिसने भी देखा, वह भाव-विभोर हो उठा। एक संन्यासी गणिका के चरणों में गिर कर क्षमा मांग रहा था ।

गणिका के भजन के एक-एक शब्द को स्वामी जी ने अपने भीतर बसा लिया। नर्तकियों के बारे में उनके मन में बसी धारणा हमेशा के लिए बदल गई।

त्रुटि हो तो सुधार लो - स्वामी विवेकानंद की कहानी
त्रुटि हो तो सुधार लो – स्वामी विवेकानंद

स्वामी जी को लगा था कि उन्होंने नर्तकी का गाना सुनने का निमंत्रण ठुकरा कर गलती की थी, उसके दिल को चोट पहुंचाई थी। उन्होंने उससे मिल कर उसके प्रति सम्मान दर्शाया और अपने किए की क्षमा चाही । उनका संदेश था-

‘जीवन में अज्ञानतावश की गई गलतियों को स्वीकार करने में कोई हर्ज नहीं है।’

हमें अपने भीतर सहजता से गलतियों को मान लेने की क्षमता विकसित करनी चाहिए। शायद ऐसी ही खूबियों के बल पर स्वामी जी चालीस वर्ष से भी कम उम्र में ही एक महान संत बने ।

त्रुटि हो तो सुधार लो - स्वामी विवेकानंद की कहानी
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