लक्ष्य के प्रति हो समर्पण - स्वामी विवेकानंद की कहानी
लक्ष्य के प्रति हो समर्पण - स्वामी विवेकानंद

स्वामी जी जीवन में लक्ष्य को बहुत मान देते थे। वे कहते थे कि लक्ष्य से हीन मनुष्य जीवन में कभी कुछ नहीं कर पाता। यदि हमने इस धरती पर जन्म लिया है तो निश्चित रूप से हमारा कोई न कोई लक्ष्य भी होगा। बस उसे पहचानने या जानने के लिए कोशिश करनी होगी।

स्वामी जी अपनी बात को साफ और सटीक शब्दों में कहने की क्षमता रखते थे। हम यह भी देख चुके हैं कि उन्होंने किस तरह अपना विरोध करने वालों को मुंहतोड़ जवाब दिया।

स्वामी जी यह भी कहते थे कि हमें अपनी बुराई या आलोचना सुनने के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए । जब हम दूसरों से अपनी बुराईयां सुन कर उन पर ध्यान देते हैं तो सुधार करना सरल हो जाता है। स्वामी विवेकानंद चाहते थे कि हमें अपने से दीन-हीन भारतवासियों की सेवा करें। उन्हें उनकी निर्धनता व दीनता के स्तर से ऊंचा उठाने की कोशिश करें। ऐसा करने से ईश्वर हमसे अधिक प्रसन्न होगा।

स्वामी जी केवल कथनी में ही विश्वास नहीं रखते थे। वे जो भी कहते थे, उस पर अमल भी करते। जब वे इक्कीस वर्ष के थे तो उनके पिता चल बसे। उन्होंने ऐसे वक्त में घर को संभाला और अपनी मां की सेवा की। वे सदा अपनी मां के स्वास्थ्य व घर की शोचनीय दशा के लिए चिंतित रहते किंतु जब देश की सेवा का प्रश्न आया तो वे मां की आज्ञा से सारी चिंताएं त्याग कर देश का हित साधने निकल पड़े।

लक्ष्य के प्रति हो समर्पण - स्वामी विवेकानंद की कहानी
लक्ष्य के प्रति हो समर्पण – स्वामी विवेकानंद

उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस जी कैंसर से पीड़ित थे। उन्हें बिस्तर पर ही नित्य कर्म करवाने होते थे। विवेकानंद ने कभी उनकी सेवा करते समय नाक- मुंह नहीं सिकोड़ा। वे उन्हें शौच करवाते, नहला – धुला कर कपड़े बदलवाते । दूसरों की निःस्वार्थ सेवा भी उनके लक्ष्य का ही एक हिस्सा थी, जिससे उन्होंने कभी मुंह नहीं मोड़ा।

इस बात का मतलब है कि हमें अपना लक्ष्य बनाने के बाद उसके बारे में सकारात्मक सोच रखनी चाहिए। कभी यह नहीं सोचना चाहिए कि हम सफल नहीं हो सकेंगे। जो लोग पूरी मेहनत, नियोजन और समय की पाबंदी के साथ काम करते हैं। उनकी जीवन में कभी हार नहीं होती।

लक्ष्य के प्रति हो समर्पण - स्वामी विवेकानंद की कहानी
लक्ष्य के प्रति हो समर्पण – स्वामी विवेकानंद

स्वामी विवेकानंद अंग्रेजी सहित अनेक भाषाओं के विद्वान थे। यदि चाहते तो परिवार के लिए आजीविका का प्रबंध करने के लिए कहीं नौकरी कर सकते थे। कोई व्यापार चला कर परिवार का पेट भर सकते थे पर इस तरह वे अपने व देश के लिए चुने गए लक्ष्य से परे हो जाते। इसलिए उन्होंने तय किया कि चाहे कितनी भी बाधाएं क्यों न आएं, वे वेदांत और सनातन धर्म के प्रचार के लक्ष्य को नहीं छोड़ेंगे। विश्व को धर्म की राह अवश्य दिखाएंगे। इतिहास साक्षी है कि स्वामी जी अपने लक्ष्य में सफल भी रहे।

लक्ष्य के प्रति हो समर्पण - स्वामी विवेकानंद की कहानी
लक्ष्य के प्रति हो समर्पण – स्वामी विवेकानंद