Smritiyan
Smritiyan

Hindi Social Story: पल्लवी रोज की तरह सुबह आफिस जाने के लिए निकल रही थी , और सासु मां के पैर छू उनसे विदा लेकर सीढियां उतरने वाली ही थी कि मां ने आवाज दी,”पल्लो बेटा भाजी लानी है बाजार से पैसे देती जाती कुछ”। पल्लवी,”हां मां सही याद दिलाया आपने, आप परेशान न होना शाम को आफिस से आते समय ले आऊंगी मैं।”
इसपर मां बोलीं नहीं,”तूझे फिर समय लगेगा और तू थकी भी होगी मैं धीरे धीरे निकल जाऊंगी घूमना भी हो जाएगा और भाजी भी ले आऊंगी,
पल्लवी,”मुस्कुराते हुए बोली मां आप कितना ख्याल रखती हो न”
मां,”हां हां रूलाने का बहाना चाहिए तुझे तो बस पैसे दे भाजी के लिए और जल्दी जा नहीं तो आफिस में बास डांटेगा और कहेगा,”अहो बाई आज फिर से लेट। इतना बोलते ही दोनों खिलखिला कर हंस पड़ी।
और हंसी रोकते हुए पल्लवी बोली,”मां पैसे,आपके बेटे की जेब में रखे हैं आप ले लेना। कहकर निकल गई।टप टप सीडियां उतरने की आवाज आई।मां उसके जाते ही कुछ उदास हो गई, जैसे हंसने का एक कुशल अभिनय करने के बाद, कलाकार अपनी वास्तविक परिस्थितियों में लौट आता है।
मां धीरे-धीरे सोचते हुए दरवाजा बंद कर, कमरे की ओर बढ़ी,घर में बस केवल वहीं थी, अलमारी खोली और अपने बेटे की शर्ट की जेब से पैसे निकालने लगी कि आंखों से आंसूओं का एक सैलाब उमड़ पड़ा। उन्होंने शर्ट को सुंघा उन्हें लगा जैसे बेटा ही है सामने और कुछ पल के लिए जड़ बन वहीं खड़ी रहीं।
स्मृतियों के सागर में गोते लगाते हुए वह उसी में खो गईं। लहरें उन्हें डुबोने का प्रयास कर रहीं थीं और वह उसमें स्वयं को असहाय महसूस कर रही थी जैसे वहां से निकलने का भरपूर प्रयास,एक असमर्थता भरा प्रयास, असमर्थता इसलिए क्योंकि मूलरूप में वह वहीं खो जाना चाहतीं थीं। उन्हें वो यादें मूल जीवन से अधिक सुहानी प्रतीत हो रही थीं।पर यादों से बाहर आना आवश्यक होता है,कई बार हमारा शरीर साथ नहीं देता है वह भी खड़े खड़े थक गई तो यादों में से स्वयं को निकाल,अलमारी बंद कर बेड पर बैठ गई। वहीं बैड पर बेटे की तस्वीर भी रखी थी, जिसमें बेटा बहू और उसके दोनों बच्चे खड़े थे। अभी एक बरस पहले ही तो खींची थी यह तस्वीर,सब कितने खुश हैं इसमें । परिस्थितियों बस पिछले एक साल में सब बदल गया,उनका एक ही बेटा था मोहन ,मोहन के पिता कुछ बरस पहले हार्ट अटैक से चले गए,मोहन की शादी हो चुकी थी, उसने और बहू ने सब बड़े अच्छे से संभाल लिया पिता की कमी को पूरा करने के लिए दोनों मां का बहुत ध्यान रखते थे। फिर दोनों बच्चे आए मोहन को जुड़वां बच्चे पैदा हुए एक बेटा कृष्णा और बेटी सुभद्रा अब दोनों 8 बरस के हो गए हैं। मां (जानकी) के चेहरे पर कभी मुस्कान आ जाती तो कभी आंसूओं से गाल गीले हो जाते। अतीत का हर पन्ना मानों अपना परिचय स्वयं देने लगा था। बच्चों के सातवें जन्मदिन पर घर में पूजा अर्चना कराई थी तब यह तस्वीर खींचवाई थी। उन्हें क्या पता था आज बस तस्वीर में ही बेटे को देख पाएंगी।
वो बरसात की काली रात जब मोहन रोज की तरह आफिस से घर आ रहा था तभी अचानक रास्ते की सड़क धंस गई और मोहन की मोटरसाइकिल का बहुत बड़ा ऐक्सीडेंट हो गया।
जिसमें मोहन उन्हें हमेशा के लिए छोड़कर चला गया।जानकी जी और पल्लवी दोनों ही पूरी तरह टूट चुके थे। लेकिन जीवन रूकता नहीं उसे रोका भी नहीं जा सकता उसे हर क्षण बस चलते जाना है।शरीर को भूख लगती है और भी जरूरतें पूरी करने के लिए स्वयं समेटना ही पड़ता है।जानकी जी और पल्लवी ने भी खुद को संभाला और दोनों एक दूसरे का साहस बन गई। पल्लवी को मोहन की जगह नौकरी मिल गई तो वह आफिस जाने लगी आफिस जाने से पहले घर सभी कार्य पूरे करती बच्चों को स्कूल भेज , दोपहर का भोजन भी तैयार कर वह आफिस निकल जाती लेकिन उसने परिवार में आज भी मोहन की मौजूदगी को जिंदा रखा था।वह रोज खर्च के पैसे मोहन की शर्ट की जेब में रख देती थी,जब भी बच्चे किसी भी चीज के लिए पैसे मांगते तो वो यही कहती रूको तुम्हारे पापा की जेब से देती हूं। स्वयं कमाती थी पर नाम सब मोहन के था।