भोर की लालिमा-गृहलक्ष्मी की कहानी: Hindi Kahaniya
Bhor Ki Lalima

Hindi Kahaniya: सतरंगी रथों पर सवार सूर्य देव धरती पर अपनी लालिमा जब बिखेरते हैं । भोर की किरणों के रूप में यह लालिमा इंसान के जीवन में भी इंद्रधनुषी छटा बिखेर देती है । इस भोर के साथ  ही नई उम्मीद और नई आशाएं जनजीवन में सतरंगी ख्वाब भरने लगते हैं। यह कहानी शुरू होती है गांव की एक चंचल ओर चुलबुली लड़की झुनझुनवाला से , जिसे लोग प्यार से झुन कहते हैं ……………………….।अपने चेहरे पर लालिमा लिए हुए सिंदूर सुहाग का देख मंद मंद मुस्कुराने लगती है झुनझुनवाला। खुद का ही चेहरा उसे आज अपने सर पर सजे हुए लाल रंग सिंदूर को देखकर खिला हुआ महसूस हो रहा है। और खिला हुआ महसूस हो भी तो क्यों नहीं ???????

यह सुहाग का लाल रंग  चेहरे पर जो सजा है सिंदूर के रूप में ।आज से यह हमारे जीवन का एक नया सवेरा है । हमारे  प्रेम का प्रतीक लाल रंग सुहाग के रूप में।

झुन सोचने लगती है कि कैसे उसकी मुलाकात प्रेम कुमार से होती है । काफी पढ़े-लखे और हैंडसम पर्सनालिटी के धनी हैं प्रेम कुमार । उन्होंने अपनी सारी पढ़ाई बाहर से ही की है। और कहां मैं , गांव से पढ़ी लिखी साधारण सी लड़की। कहते हैं ना कि जोड़ियां आसमानों में ही बनती हैं ।ईश्वर ही सब तय करते हैं कुछ ऐसा ही हुआ मेरे साथ भी ……….।

मैं अपनी बुआ के साथ उनके ससुराल गई हुई थी। उनकी देवर की शादी में, और उनके देवर के दोस्त हैं प्रेम कुमार । तो हमेशा मेरे घर आना जाना लगा हुआ रहता था , इसी बीच मैंने नोटिस किया कि ये लड़का मुझे बार-बार देख रहा है। जबकि ये हमसे काफी बड़े लग रहे थे । बड़े हो या ना हो नहीं पता लेकिन उम्र से कुछ ज्यादा ही लग रहे थे हेल्थी होने की वजह से। और मैं उसके विपरीत विशेष पतली होने की वजह से अपने उम्र से भी कम लग रही थी। मैंने देखा कि मेरी बुआ जी बार-बार उनको  प्रेम जी यह कर दीजिए, प्रेम जी वह कर दीजिए कह रही थीं। क्योंकि रिश्ते में वह  भी उनके देवर ही लगते थे। घर छोटा होने की वजह से मुझे भी उसी आसपास रहना पड़ता था। और प्रेम जी भी किसी ना किसी बहाने से मेरे इर्द-गिर्द मंडराते रहते थे ।मुझे थोड़ा अजीब सा एहसास लगने लगा। मुझे जब वह देखते तो मेरी भी दिल की धड़कने  तेज सी हो जाती …………….। थोड़ी सी घबराहट होने लगती, मैं खुद से सवाल करने लगी कहीं मुझे प्यार तो नहीं हो गया। मैं तो ज्यादा सुंदर भी नहीं हूं लेकिन कहते हैं ना प्यार अंधा होता है। वह कुछ भी नहीं सोचता और कुछ भी नहीं देखता| 

होता वही है जो मंजूरे खुदा होता है। सभी शादी के रस्मों में लगे हुए थे। मेरी नजरें बार-बार उन्हीं को ढूंढ रही थी, कहीं दिख जाए । तभी मेरी बुआ जी की बरी बेटी धरा  बोलती है जो मेरे ही हमउम्र थी क्या बात है?????????? नजरें किसी को ढूंढ रही है , मुझे सब पता है झुन दीदी ।आज तुम्हारा चुलबुला पन थोड़ा कम दिख रहा है। क्या बात है दीदी कुछ तो बात है मेरा मजाक बनाने लगी तुम प्रेम चाचा को ढूंढ रही हो ना ।  मैं थोड़ी शर्मा सी गई । लेकिन वह खुद बोलने लगी कि वह तो गए हैं …दूल्हे को ले जाने वाली गाड़ी सजाने ।उसके इतना बोलते ही जैसे  मुझे राहत की सांस मिली, चलो भाई गाड़ी लेकर तो आएंगे ही। मन को समझाते हुए । धरा बोलती है दीदी बारात चलोगी क्या?????  मैं बारात चलकर क्या करूंगी ।तभी पीछे से प्रेम जी बोलते हैं हां सभी चलेंगे बारात ।आवाज सुनकर ही जैसे लगा फिर से दिल की धड़कन तेज हो गई। मन तो हो रहा था पीछे मुड़ कर देख लें लेकिन, बहुत लोग बैठे हुए थे । मैं तो खड़ी की खड़ी रह गई धरा चिढ़ाते हुए अब तो चलोगी ही दीदी है ना…………………..।

सभी बारात जाने की रस्मों में  लगे हुए थे।मैं भी तैयार हो गई। धरा बोलती है दीदी हम सभी एक ही गाड़ी में चलेंगे ।हमसभी मतलब क्या????????थोड़ा चिढ़ाते हुए धरा बोलती है दूल्हे वाली गाड़ी में दूल्हे के दोस्त भी रहेंगे। मन तो मेरा खुश हो रहा था, लेकिन ऊपर से कुछ भी नहीं बोली। बारात नियत समय पर चली रास्ते में हम लोगों की बातचीत की शुरुआत हो गई। पूरे रास्ते खूब इंजॉय करते बातचीत करते हुए गए ।बारात में भी खूब मस्ती किए फिर वापस दुल्हनिया ले कर घर आए सारी रस्में समाप्त हुई। ना मैंने कुछ बोला ना उन्होंने कुछ कहा हो गया वह अपने घर मैं अपने घर। सभी रिश्तेदार अपने अपने घर चले गए। मेरी बुआ जी बोली कि होली है होली भर रुक जाती तो अच्छा होता। मेरा मन तो नहीं लग रहा था लेकिन रुक गई।

जैसे तैसे करके एक सप्ताह  बीता। आज होली है  लेकिन मेरा मन नहीं लग रहा था । मैं छत पर धरा के साथ कुछ बातें कर रही थी। थोड़ी देर में धरा नीचे चली जाती है। होली के दिन प्रेम जी अपनी नई भाभी  से होली खेलने आए। मैं अकेले छत पर थी  मेरा मन नहीं लग रहा था। तभी पीछे से प्रेम जी ने लाल गुलाल लगाते हुए ……. आज यह हक सिर्फ आपकी सुर्ख गालों पर लगाने का है । वह भी आपकी मौन स्वीकृति से मुझे पता है कि आप भी मुझे चाहने लगे हैं। लेकिन एक दिन अपने प्रेम का लाल रंग आपकी मांग में सजाऊंगा ।मैं आपसे प्यार करने लगा हूं। इनके ये  शब्द सुनकर मैं डर गई थी । मैं एक बार उनकी नजरों में नजरें उठाकर देखी ,फिर नजरें झुका ली और झुकती नजर से मैंने कहा हमारी समाज इसकी इजाजत नहीं देता…………..।

इधर धरा मेरी इन बातों को सुन चुकी थी। मैं अपने घर वापस आ गई और अपनी दिनचर्या में लग गई ।फोन तो था नहीं मेरे पास , ना ही उतनी हिम्मत जो किसी तरह बातें होती । या कोई बात बढ़ती दिल में कसक लिए जिंदगी अपनी रफ्तार से चलने लगी। लगभग 6 महीने बाद…………………इधर मेरे पापा भी मेरी शादी को लेकर चिंतित रहने लगे इधर-उधर लड़का ढूंढते रहे लेकिन अभी तक कहीं बात आगे नहीं बढ़ी थी। छुट्टियों में मेरी बुआ और धरा दोनों मेरे घर आए हुए थे ।तभी बातों ही बातों में धरा कहती है कि, मामू जी इतना परेशान हो रहे हैं ।क्यों नहीं प्रेम चाचा से झुन दीदी की शादी करवा देती हो,क्या दिक्कत है। मां तुम चाहोगी तो हो जाएगा यह रिश्ता । बातों ही बातों में बातें आगे बढ़ गई और हमारा रिश्ता पक्का हो गया। सभी खुश और उससे भी ज्यादा हम दोनों खुश। आज विवाह के बंधन में बंध भी गए और अपने चेहरे पर यह लाल रंग देखकर मन ही मन मुस्कुराते हुए जाने कहां पीछे की यादों में खो गई थी। अचानक ही पीछे से ये टोकते हैं मुंह दिखाई का रस्म भी करना है। आप अपना चेहरा खुद ही देखिएगा ।और खुद से ही बातें करते रहिएगा। हमें भी दिखाइएगा अपना चेहरा मंगलसूत्र पहनाते हुए। भोर की लालिमा हो चुकी है। तभी झुन कहती है नई उम्मीद और नई आशाओं के साथ नए जीवन की शुरुआत करते हैं आपके द्वारा सजाए गए अपनी मांग के सिंदूर की लालिमा से….…