sacchi prarthana
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एक गाड़ीवान ने यहूदी धर्माचार्य रबी बर्डिक्टेव के पास आकर पूछा, “महाराज, मैं एक गाँव से दूसरे गाँव गाड़ी हाँका करता हूँ। यह पेशा मुझे पसंद नहीं, क्योंकि मैं भगवान् की प्रार्थना के लिए सेनेगाग (मंदिर) जाने को नियमित समय नहीं दे पाता। मुझे अब यह पेशा छोड़ देने के अलावा अन्य कोई रास्ता सूझ ही नहीं रहा है।”

इस पर रबी ने पूछा, “क्या तुम्हारी गरीब बूढ़े यात्रियों से कभी भेंट होती है?” “जी हाँ, मुझे गरीब, दीन-दुखी यात्री अवश्य दिखाई देते हैं और मैं उन्हें मुफ्त में सवारी भी दिया करता हूँ।”- गाड़ीवान ने जवाब दिया।

“तब तुम इस पेशे को कदापि न छोड़ो। तुम इस पेशे में रहकर ही भगवान् की प्रार्थना करते आ रहे हो, क्योंकि दीन-दुखियों की सेवा ही भगवान् की सेवा है और यही भगवान् की सच्ची प्रार्थना है।”

ये कहानी ‘इंद्रधनुषी प्रेरक प्रसंग’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएंIndradhanushi Prerak Prasang (इंद्रधनुषी प्रेरक प्रसंग)