Bhagwan Vishnu Katha: प्राचीन काल में बलाश्व नामक एक प्रसिद्ध राजा हुए । एक बार शत्रु राजाओं ने मिलकर उनके नगर को घेर लिया । शत्रुओं के आक्रमण से बलाश्व बड़े क्रोधित हुए । तब वे हाथों को मुख के आगे रखकर जोर-जोर से साँस लेने लगे । फिर तो उनके मुख की वायु से प्रेरित होकर उनके हाथों की उँगलियों से असंख्य सैनिक हाथी, रथ, घोड़े आदि निकलने लगे । तत्पश्चात् विशाल सेना से युक्त होकर उन्होंने शत्रुओं को पराजित कर दिया । कर का धमन करने (हाथों को फूँकने) से उन्होंने शत्रुओं का संहार करने वाली सेना उत्पन्न की थी, इसलिए राजा बलाश्व ‘करन्धम’ कहलाने लगे । करंधम का विवाह राजा वीर्यचन्द्र की पुत्री राजकुमारी वीरा से हुआ । विवाह के बाद वीरा ने एक सुंदर पुत्र को जन्म दिया । राजा करंधम ने ज्योतिषियों से पुत्र के ग्रह-नक्षत्रों के विषय में पूछा । ज्योतिष बोले -“राजन ! आपका पुत्र उत्तम मुहूर्त, श्रेष्ठ नक्षत्र और शुभ लग्न में उत्पन्न हुआ है । इसलिए यह वीर, पराक्रमी, भाग्यवान तथा बलशाली होगा । बृहस्पति, शुक्र, चन्द्रमा और बुध – इन श्रेष्ठ ग्रहों की इस पर विशेष कृपा दृष्टि है, जबकि सूर्य, मंगल और शनि की दृष्टि बालक पर नहीं है । इसलिए यह बालक अवीक्षित नाम से प्रसिद्ध होगा ।”
युवा होने पर करंधम ने अवीक्षित को ऋषि मेधातिथि के पुत्र कण्व मुनि के पास वेदों और अस्त्र विद्या सीखने के लिए भेजा । अवीक्षित तीव्र बुद्धि के कारण शीघ्र ही वेदों और अस्त्र विद्या में निपुण हो गया । संसार में कोई भी उसकी वीरता का सामना करने वाला नहीं था । इस प्रकार धीरे-धीरे अवीक्षित को अपनी वीरता पर अहंकार हो गया ।
एक बार की बात है, वैदिश राज्य के राजा विशाल ने अपनी पुत्री वैशालिनी के स्वयंवर का आयोजन किया । इसमें अनेक राजा तथा राजकुमार सम्मिलित हुए । अवीक्षित भी स्वयंवर में उपस्थित था । जैसे ही वैशालिनी वरमाला लेकर राजाओं की ओर बढ़ी, वैसे ही अवीक्षित ने उसका हरण कर लिया । उसके इस कार्य से वहाँ उपस्थित राजा स्वयं को अपमानित समझने लगे । उन्होंने म्यानों में से तलवारें निकाल लीं और रथों पर सवार होकर अवीक्षित से लोहा लेने जा पहुँचे ।
यद्यपि अवीक्षित अकेला था, तथापि उसने अपने बल और बुद्धि के कौशल से सभी राजाओं को विचलित कर दिया । तब शत्रु राजाओं ने सात सौ वीरों की एक सेना तैयार कर, उसे अवीक्षित के साथ युद्ध करने के लिए भेजा । वह सेना अवीक्षित से युद्ध करने लगी । अवीक्षित धर्मपूर्वक युद्ध करता रहा । उसने अपने बाणों से शत्रुओं के कवच और अस्त्र-शस्त्र काट दिए । तब राजाओं ने उसे घेर लिया और अधर्मपूर्वक घायल कर गिरा दिया । तत्पश्चात् बंदी बना लिया ।
उधर दूतों ने राजा करंधम और रानी वीरा को राजकुमार अवीक्षित के बंदी बनाए जाने का समाचार सुनाया । तब वीरा ने राजा करंधम से अवीक्षित को छुड़वाकर वापस लाने के लिए कहा । रानी वीरा के उत्साहित करने पर राजा करंधम ने सेना लेकर शत्रु राजाओं पर आक्रमण कर दिया । तीन दिनों तक दोनों पक्षों में भयंकर युद्ध चलता रहा । अंत में राजा करंधम के समक्ष सभी राजा पराजित हुए और अवीक्षित को बंधन मुक्त किया गया । तब राजा विशाल अपनी पुत्री वैशालिनी के साथ करंधम की शरण में उपस्थित हुआ और अवीक्षित का विवाह वैशालिनी के साथ करने की प्रार्थना करने लगा ।
किंतु राजकुमार अवीक्षित बोला“पिता श्री ! अब मैं इसे या किसी दूसरी कन्या को कभी स्वीकार नहीं करूँगा । मैं शत्रुओं से पराजित हो चुका हूँ । इसलिए इसे किसी ऐसे वीर राजकुमार से विवाह करना चाहिए जिसका बल पराक्रम और राजा विशाल ने वैशालिनी को किसी अन्य राजकुमार से विवाह करने का परामर्श दिया । वह विनम्र स्वर में बोली -“पिताश्री ! यद्यपि युद्ध में इनके पराक्रम और शौर्य की हानि हुई है, फिर भी ये धर्म के अनुसार युद्ध करते रहे । जब राजाओं ने इन्हें घेर लिया था, तब भी ये सिंह की भांति युद्धरत रहे । ये युद्ध में पराजित हुए हैं, किंतु उन कायर और शौर्यहीन राजाओं ने अधर्मपूर्वक इन पर विजय पाई थी । इनकी वीरता, पराक्रम और शौर्य के गुणों ने मेरे मन को मोहित कर दिया है । अब इनके अतिरिक्त दूसरा कोई व्यक्ति मेरा पति नहीं बन सकता ।”
राजा करंधम और विशाल ने अवीक्षित को समझाने का बहुत प्रयत्न किया, किंतु वह अपनी बात पर दृढ़ रहा । तब वैशालिनी बोली -“पिताश्री ! मैंने इन्हें पति मान लिया है । यदि ये मुझे स्वीकार नहीं करना चाहते तो मैं तपस्या करके इन्हें अपना पति बनाऊँगी ।” इतना कहकर राजकुमारी वैशालिनी ने भोगों का त्याग कर दिया और माता-पिता से आज्ञा लेकर तपस्या करने के लिए वन में चली गई । इधर राजा करंधम भी अपने पुत्र अवीक्षित के साथ अपने नगर को लौट गए ।
वैशालिनी निराहार रहकर कठोर तपस्या करने लगी । तीन महीनों तक उपवास करने के कारण उसके पेट में भयंकर पीड़ा उत्पन्न हो गई । किंतु वह इसका ध्यान छोड़ तपस्या में मग्न रही । धीरे-धीरे वह दुर्बल होकर मरणासन्न अवस्था में पहुँच गई । तब उसने शरीर त्याग देने का विचार किया ।
तभी एक देवदूत वहाँ प्रकट हुआ और वैशालिनी से बोला -“देवी ! मानव शरीर अत्यंत दुर्लभ है । तुम अकारण इसका त्याग मत करो । देवी! शीघ्र ही तुम्हें एक चक्रवर्ती राजा की जननी बनने का सौभाग्य प्राप्त होगा । तुम्हारा पुत्र शत्रुओं का संहार कर पृथ्वी पर अखण्ड राज्य स्थापित करेगा । उसके द्वारा अश्वमेध आदि यज्ञों का छः हजार बार अनुष्ठान होगा ।”
दूत की बात सुन वैशालिनी दु:खी स्वर में बोली -“देव ! पति ने मुझे त्याग दिया है, फिर मुझे पुत्र कैसे प्राप्त होगा? मैंने यह प्रतिज्ञा की है कि मैं राजा अवीक्षित के अतिरिक्त किसी दूसरे पुरुष की पत्नी नहीं बनूँगी । किंतु वे मुझे ग्रहण नहीं करना चाहते । फिर आपका वरदान किस प्रकार फलित होगा?“
देवदूत बोला -“कल्याणी ! देवताओं का यह वरदान अवश्य सिद्ध होगा । आगे क्या घटित होगा, यह भविष्य के गर्भ में छिपा है । विधान के अनुसार अवीक्षित ही तुम्हें पति रूप में प्राप्त होगा और उसी से तुम्हें पुत्र की प्राप्ति होगी । अब तुम अपने दुर्बल शरीर का पोषण करते हुए तप करो । तुम्हारा भला होगा ।” इस प्रकार वर देकर वह देवदूत चला गया ।
उधर एक दिन रानी वीरा अवीक्षित से बोली -“वत्स ! तुम्हारे पिता की आज्ञा से मैं किमिच्छक नामक व्रत करूँगी । लेकिन यह बड़ा कठिन व्रत है । यदि व्रत के समय तुम उपस्थित याचकों को अभिलषित वस्तुएँ प्रदान करने की प्रतिज्ञा करो तो मैं इस व्रत का अनुष्ठान आरम्भ कर दूँगी ।” अवीक्षित द्वारा प्रतिज्ञा करने पर रानी वीरा निश्चित होकर व्रत करने लगी ।
इधर राजा करंधम जानते थे कि रानी वीरा किमिच्छक व्रत कर रही है और अवीक्षित ने याचकों को इच्छित वस्तुएँ प्रदान करने की प्रतिज्ञा की । तब वे याचक के रूप में अवीक्षित के पास गए और उससे पौत्र प्रदान करने की याचना की । अवीक्षित अपने वचन में बँधा हुआ था । अतः वह पिता की आज्ञा स्वीकार कर विवाह के लिए सहमत हो गया ।
एक दिन अवीक्षित शिकार खेलने वन में गया । वन की सुंदरता देखकर उसका मन प्रसन्न हो उठा । तभी उसे एक भयानक दैत्य दिखाई दिया, जिसने एक सुंदर स्त्री को पकड़ रखा था । वह स्त्री रोते हुए बचाओ, बचाओ चिल्ला रही थी । अवीक्षित ने दैत्य को युद्ध के लिए ललकारा ।
ललकार सुनकर दैत्य दृढ़केश ने उस स्त्री को छोड़ दिया और अस्त्र लेकर अवीक्षित पर टूट पड़ा । अवीक्षित ने उसके सभी अस्त्रों को काट दिया । तब दृढकेश उस पर मुष्टि प्रहार करने के लिए दौड़ा । लेकिन अवीक्षित ने बाण मारकर उसकी जीवन लीला समाप्त कर दी । दैत्य के मरते ही अवीक्षित पर पुष्पों की वर्षा होने लगी और वहाँ देवराज इन्द्र ने प्रकट होकर अवीक्षित से वर माँगने के लिए कहा ।
अवीक्षित हाथ जोड़कर बोला -“देवेन्द्र ! पिताश्री द्वारा प्रतिज्ञा में बाँधे जाने के कारण मैं धर्मसंकट में फँस गया हूँ । पहले राजा विशाल की युवती वैशालिनी को मैंने त्याग दिया था । उसने मेरे अतिरिक्त किसी दूसरे को पति बनाने का विचार त्याग कर कठोर तपस्या का व्रत ले रखा है । अब उस देवी को छोड़कर मैं किसी दूसरी स्त्री से विवाह किस प्रकार कर सकता हूँ? आप ज्ञानी, विद्वान, बुद्धिमान और देवताओं के राजा हैं । कृपया मुझे इस धर्मसंकट से उबरने का उपाय बताएँ ।”
तब इन्द्र बोले -“वत्स ! तुम्हें प्राप्त करने के उद्देश्य से कठोर तपस्या करने वाली राजा विशाल की युवती वैशालिनी यही स्त्री है । तुम निस्संकोच होकर इससे विवाह कर सकते हो । शत्रुओं से पराजित होने पर तुमने इसका त्याग किया था, किंतु आज शत्रु पर विजय प्राप्त कर तुमने इसे पुन: प्राप्त कर लिया है । तुम इसे स्वीकार करो । इसके गर्भ से तुम्हें एक चक्रवर्ती पुत्र प्राप्त होगा, जो पृथ्वी का स्वामी बनकर तुम्हारे वंश को अमर कर देगा ।” यह कहकर इन्द्र अपने लोक लौट गए ।
अवीक्षित ने आगे बढ़कर त्यागमयी देवी वैशालिनी को गले से लगा लिया । बाद में इनके मरुत नाम के पुत्र उत्पन्न हुए जो विख्यात चक्रवती राजा हुए । उन्होंने अनेक यज्ञ करके खूब पुण्य कमाया ।
ये कथा ‘पुराणों की कथाएं’ किताब से ली गई है, इसकी और कथाएं पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं – Purano Ki Kathayen(पुराणों की कथाएं)
