पंडित देवीदत्त का विवाह हुए बहुत दिन हुए, पर उनके संतान न हुई। जब तक उनके मां-बाप जीवित थे तब तक वे उनसे सदा दूसरा विवाह कर लेने के लिए आग्रह किया करते थे पर वे राजी न हुए। उन्हें अपनी पत्नी गोदावारी से अटल प्रेम था। संतान से होने वाले सुख के निमित्त वे अपना वर्तमान पारिवारिक सुख नष्ट न करना चाहते थे। इसके अतिरिक्त वे कुछ नए विचार के मनुष्य थे। कहा करते थे कि संतान होने से मां-बाप की जिम्मेदारियां बढ़ जाती हैं। जब तक मनुष्य में यह सामर्थ्य न हो कि वह उसका भली प्रकार पालन पोषण और शिक्षण आदि कर सके तब तक उसकी संतान से देश, जाति और निज का कुछ भी कल्याण नहीं हो सकता। पहले तो कभी-कभी बालकों को हंसते-खेलते देखकर उनके हृदय पर चोट भी लगती थी, परंतु अब अपने अनेक देश-भाइयों की तरह वे भी शारीरिक व्याधियों से ग्रस्त रहने लगे। अब किस्से कहानियों के बदले धार्मिक काव्यों से उनका अधिक मनोरंजन होता था। अब संतान का खयाल करते ही उन्हें भय-सा लगता था।
पर, गोदावरी इतनी जल्दी निराश होने वाली न थी। पहले तो वह देवी देवता, गंडे-ताबीज और यंत्र-मंत्र आदि की शरण लेती रही, परंतु जब उसने देखा कि ये औषधियां कुछ काम नहीं करती तब वह एक महौषधि की फिक्र में लगी जो कायाकल्प से कम नहीं थी। उसने महीनों, बरसों इसी चिंता-सागर में गोते लगाते काटे। उसने दिल को बहुत समझाया, परन्तु मन में जो बात समा गयी थी वह किसी तरह न निकली। उसे बड़ा भारी आत्मत्याग करना पड़ेगा। शायद पति-प्रेम के सदृश अनमोल रत्न भी उसके हाथ से निकल जाये, पर क्या ऐसा हो सकता है? पंद्रह वर्ष तक लगातार जिस प्रेम के वृक्ष की उसने सेवा की है क्या वह हवा का एक झोंका भी न सह सकेगा।
गोदावरी ने अंत में अपने प्रबल विचारों के आगे सिर झुका दिया। अब सौत का शुभागमन करने के लिए वह तैयार हो गयी थी।
पंडित देवीदत्त गोदावरी का यह प्रस्ताव सुनकर स्तम्भित हो गये। उन्होंने अनुमान किया कि या तो यह प्रेम की परीक्षा कर रही है या मेरा मन लेना चाहती है। उन्होंने उसकी बात हंसकर टाल दी। पर जब गोदावरी ने गंभीर भाव से कहा, तुम इसे हंसी मत समझो, मैं अपने हृदय से कहती हूं कि संतान का मुंह देखने के लिए मैं सौत से छाती पर मूंग दलवाने के लिए भी तैयार हूं तब तो उनका संदेह जाता रहा। इतने ऊंचे और पवित्र भाव से भरी हुई गोदावरी को उन्होंने गले से लिपटा लिया। वे बोले, मुझसे यह न होगा। मुझे संतान की अभिलाषा नहीं।
गोदावरी ने जोर देकर कहा, तुमको न हो, मुझे तो है। अगर अपनी खातिर से नहीं तो तुम्हें मेरी खातिर से यह काम करना ही पड़ेगा।
पंडितजी सरल स्वभाव के आदमी थे। हामी तो उन्होंने न भरी, पर बार-बार कहने से वे कुछ-कुछ राजी अवश्य हो गये। उस तरफ से इसी की देर थी। पंडित जी को कुछ भी परिश्रम न करना पड़ा। गोदावरी की कार्य-कुशलता ने सब काम उनके लिए सुलभ कर दिया। उसके इस काम के लिए आपने पास से केवल रुपए ही नहीं निकाले, किंतु अपने गहने और कपड़े भी अर्पण कर दिए। लोक-निंदा का भय इस मार्ग में सबसे बड़ा कांटा था। देवीदत्त मन में विचार करने लगे कि जब मैं मौर सजा कर चलूंगा। तब लोग मुझे क्या कहेंगे? मेरे दफ्तर के मित्र मेरी हंसी उड़ायेंगे और मुस्कुराते हुए कनखियों से मेरी ओर देखेंगे। उनके वे कटाक्ष छुरी से भी ज्यादा तेज होंगे। उस समय मैं क्या करूंगा?
गोदावरी ने अपने गांव में जाकर इस कार्य को आरम्भ कर दिया और इसे निर्विघ्न समाप्त कर डाला। नयी बहू घर में आ गयी। उस समय गोदावरी ऐसी प्रसन्न मालूम हुई मानों वह बेटे का ब्याह कर लायी हो। वह खूब गाती बजाती रही। उसे क्या मालूम था कि शीघ्र ही उसे इस गाने के बदले रोना पड़ेगा।
कई मास बीत गये। गोदावरी अपनी सौत पर इस तरह शासन करती थी मानो वह उसकी सास हो, तथापि वह यह बात कदापि न भूलती थी कि मैं वास्तव में उसकी सास नहीं हूं। उधर गोमती को अपनी स्थिति का पूरा ख्याल रहता था। इसी कारण सास के शासन की तरह कठोर न रहने पर भी गोदावरी का शासन उसे अप्रिय होता था। उसे अपनी छोटी-मोटी जरूरतों के लिए भी गोदावरी से कहते संकोच होता था।
कुछ दिनों बाद गोदावरी के स्वभाव में एक विशेष परिवर्तन दिखाई देने लगा। वह पंडितजी को घर में आते-जाते बड़ी तीव्र दृष्टि से देखने लगी। उसकी स्वाभाविक गंभीरता अब मानो लोप-सी हो गयी, जरा-सी बात भी उसके पेट में नहीं पचती। अब पंडितजी दफ्तर से आते तब गोदावरी उनके पास घंटे बैठी गोमती का वृत्तांत सुनाया करती। वृत्तांत-कथन में बहुत-सी ऐसी छोटी-मोटी बातें भी होती थी कि जब कथा समाप्त होती तब पंडितजी के हृदय से बोझ-सा उतर जाता। गोदावरी क्यों इतनी मृदुभाषिणी हो गयी थी, इसका कारण समझना मुश्किल है। शायद अब वह गोमती से डरती थी। उसके सौंदर्य से, उसके जीवन से, उसके लज्जायुक्त नेत्रों से शायद वह अपने को पराभूत समझती। बांध को तोड़कर वह पानी की धारा को मिट्टी के ढेलों से रोकना चाहती थी।
एक दिन गोदावरी ने गोमती से मीठा चावल पकाने को कहा। शायद वह रक्षाबंधन का दिन था। गोमती ने कहा, शक्कर नहीं है। गोदावरी यह सुनते ही विस्मित हो उठी। उतनी शक्कर इतनी जल्दी कैसे उठ गयी। जिसे छाती फाड़कर कमाना पड़ता है, उसे अखरता है, खाने वाले क्या जाने?
जब पंडितजी दफ्तर से आये तब जरा-सी बात बड़ा विस्तृत रूप धारण करके उनके कानों में पहुंची। थोड़ी देर के लिए पंडितजी के दिल में भी यह शंका हुई कि गोमती को कहीं भस्मक रोग तो नहीं हो गया।
ऐसी ही घटना एक बार फिर हुई। पंडितजी को बवासीर की शिकायत थी। लाल मिर्च वह बिलकुल न खाते थे। गोदावरी जब रसोई बनाती थी तब वह लाल मिर्च रसोई घर में लाती ही न थी। गोमती ने एक दिन दाल में मसाले के साथ थोड़ी-सी लाल मिर्च भी डाल दी। पंडितजी ने दाल कम खायी। पर गोदावरी गोमती के पीछे पड़ गई। ऐंठ कर वह बोली – ऐसी जीभ जल क्यों नहीं जाती?
