saut by munshi premchand
saut by munshi premchand

पंडितजी बड़े ही सीधे आदमी थे। दफ्तर से आये, खाना खाया, पड़ कर सो रहे। वे एक साप्ताहिक पत्र मंगाते थे। उसे कभी-कभी महीनों खोलने की नौबत न आती थी। जिस काम में जरा भी कष्ट या परिश्रम होता, उससे वे कोसों दूर भागते थे। कभी उनके दफ्तर में थियेटर के ‘पास’ मुफ्त मिला करते थे। पर पंडितजी उनसे कभी काम नहीं लेते, और ही लोग उनसे मांग ले जाया करते। रामलीला या कोई मेला तो उन्होंने शायद नौकरी करने के बाद फिर कभी देखा वहीं। गोदावरी उनकी प्रकृति का परिचय अच्छी तरह पा चुकी थी। पंडित जी भी प्रत्येक विषय में गोदावरी के मतानुसार चलने में अपनी कुशल समझते।

पर रुई-सी मुलायम वस्तु भी दबकर कठोर हो जाती है। पंडितजी को यह आठों पहर की चह-चह असह्य सी प्रतीत होती, कभी-कभी मन में झुंझलाने भी लगते। इच्छा-शक्ति जो इतने दिनों तक बेकार पड़ी रहने से निर्बल-सी हो गयी थी, अब कुछ सजीव-सी होने लगी थी। पंडितजी यह मानते थे कि गोदावरी ने सौत को घर लाने में बड़ा भारी त्याग किया है। उसका यह त्याग अलौकिक कहा जा सकता है, परन्तु उसके त्याग का भार जो कुछ है, वह मुझ पर है, गोमती पर उसका क्या एहसान? यहां उसे कौन-सा सुख है जिसके लिए वह फटकार-पर-फटकार सहे? पति मिला है, वह बूढ़ा और सदा रोगी, घर मिला है वह ऐसा कि अगर नौकरी छूट जाये तो कल चूल्हा न जले। इस दशा में गोदावरी का यह स्नेह-रहित बर्ताव उन्हें बहुत अनुचित मालूम होता।

गोदावरी की दृष्टि इतनी स्थूल न थी कि उसे पंडितजी के मन के भाव नजर न आवें। उनके मन में जो विचार उत्पन्न होते थे, वे सब गोदावरी को उनके मुख पर अंकित-से दिखाई पड़ते। यह जानकारी उसके हृदय में एक ओर गोमती के प्रति ईर्ष्या की प्रचंड अग्नि दहका देती, दूसरी ओर पंडित देवीदत्त पर निष्ठुरता और स्वार्थप्रियता का दोषारोपण कराती। फल यह हुआ कि मनोमालिन्य दिन-दिन बढ़ता गया।

गोदावरी ने धीरे-धीरे पंडितजी से गोमती की बातचीत करनी छोड़ दी, मानो उसके निकट गोमती घर में थी ही नहीं। न उसके खाने-पीने की वह सुधि लेती, न कपड़े-लत्ते की। एक बार कई दिनों तक उसे जलपान के लिए कुछ भी न मिला। पंडितजी तो आलसी जीव थे। वे इन अत्याचारों को देखा करते, पर अपने शांति-सागर में घोर उपद्रव मच जाने के भय से किसी से कुछ न कहते। तथापि इस छिछले अन्याय ने उनकी महती सहन-शक्ति को भी मथ डाला। एक दिन उन्होंने गोदावरी से डरते-डरते कहा, क्या आजकल जलपान के लिए मिठाई-विठाई नहीं आती?

गोदावरी ने कुद्ध होकर जवाब दिया, तुम लाते ही नहीं तो आए कहां से! कोई नौकर बैठा है?

देवीदत्त को गोदावरी के ये कठोर वचन तीर-से लगे। आज तक गोदावरी ने उनसे ऐसी रोष-पूर्ण बात कभी न की थी।

वे बोले, धीरे बोलो, झुंझलाने की तो कोई बात बही है। गोदावरी ने आंखें नीची करके कहा, मुझे तो जैसा आता है वैसे बोलती हूं। दूसरी की सी मधुर बोली कहां से लाऊं। देवीदत्त ने जरा गरम होकर कहा, आजकल मुझे तुम्हारे मिज़ाज का कुछ रंग ही नहीं मालूम होता। बात-बात पर उलझती रहती हो।

गोदावरी का चेहरा क्रोधाग्नि से लाल हो गया। वह बैठी थी, खड़ी हो गई। उसके होंठ फड़कने लगे। वह बोली, मेरी कोई बात अब तुमको क्यों अच्छी लगेगी। अब मैं सिर से पैर तक दोषों से भरी हुई हूं, अब और लोग तुम्हारे मन का काम करेंगे। मुझसे नहीं हो सकता।यह लो संदूक की कुंजी! अपने रुपये-पैसे संभाली, यह रोज-रोज की झंझट मेरे मान की नहीं। जब तक निभा, निभाया। अब नहीं निभ सकता।

पंडित देवीदत्त मानो मूर्च्छित-से हो गए। जिस शांति-भंग का उन्हें भय था उसने अत्यंत भयंकर रूप धारण करके घर में प्रवेश किया। वह कुछ भी न बोल सके। इस समय उनके अधिक बोलने से बात बढ़ जाने का भय था। वह बाहर चले आए और सोचने लगे कि मैंने गोदावरी के साथ कौन-सा अनुचित व्यवहार किया है। उनके ध्यान में आया कि गोदावरी के हाथ से निकलकर घर का प्रबंध कैसे हो सकेगा? इस थोड़ी-सी आमदनी में वह न जाने किस प्रकार काम चलाती थी? क्या-क्या उपाय वह करती थी? अब न जाने नारायण कैसे पार लगाएंगे उसे मनाना पड़ेगा, और हो ही क्या सकता है। गोमती भला कर सकती है, सारा बोझ मेरे ही सिर पड़ेगा। मानेगी तो, पर मुश्किल से।

परंतु पंडितजी की ये शुभकामनाएं निष्फल हुई। संदूक की कुंजी विषैली नागिन की तरह वहीं आंगन में ज्यों-की-त्यों तीन दिन तक पड़ी रही। किसी को उसके निकट जाने का साहस न हुआ। चौथे दिन पंडितजी ने मानों जान पर खेलकर उस कुंजी को उठा लिया। उस समय उन्हें ऐसा मालूम हुआ मानो किसी ने उनके सिर पर पहाड़ उठकर रख दिया। आलसी आदमियों को अपने नियमित मार्ग से तिल भर भी हटना बड़ा कठिन मालूम होता है।

यद्यपि पंडितजी जानते थे कि मैं अपने दफ्तर के कारण इस कार्य को संभालने में असमर्थ हूं तथापि उनसे इतनी ठिठाई न हो सकी कि वह कुंजी गोमती को दें। पर यह केवल दिखावा ही भर था। कुंजी उन्हीं के पास रहती थी, काम सब गोमती को करना पड़ता था। इस प्रकार गृहस्थी के शासन का अंतिम साधन भी गोदावरी के हाथ से निकल गया। गृहिणी के नाम के साथ जो मर्यादा और सम्मान था वह भी गोदावरी के पास से उसी कुंजी के साथ चला गया। देखते-देखते घर की महरी और पड़ोस की स्त्रियों के बर्ताव में भी बहुत अंतर पड़ गया। गोदावरी अब पदच्युता रानी की तरह थी। उसका अधिकार अब केवल दूसरों की सहानुभूति पर ही रह गया था।

गृहस्थी के काम-काज में परिवर्तन होते ही गोदावरी के स्वभाव में भी शोकजनक परिवर्तन हो गया। ईर्ष्या मन में रहने वाली वस्तु नहीं। आठों पहर पास-पड़ोस के घरों में यही चर्चा होने लगी, देखो, दुनिया कैसे मतलब की है। बेचारी ने लड़-झगड़ कर ब्याह कराया, जान -बूझकर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी। यहां तक कि अपने गहने-कपड़े तक उतार दिए। पर अब रोते-रोते आंचल भीगता है। सौत तो सौत ही है, पति ने भी उसे आंखों से गिरा दिया। बस, अब दासी की तरह घर में पड़ी-पड़ी पेट जिलाया करे। यह जीना भी कोई जीना है?

ये सहानुभूति पूर्ण बात सुनकर गोदावरी की ईर्ष्याग्नि और भी प्रबल होती जाती थी। इसे इतना न सूझता था कि वह मौखिक संवेदनाएं अधिकांश में उस मनोविकार से पैदा हुई हैं जिससे मनुष्यों को हानि और दुःख पर हंसने में विशेष आनंद आता है।

गोदावरी की जिस बात का पूर्ण विश्वास और पंडितजी को जिसका बड़ा भय था, वह न हुई। घर के काम-काज में कोई विघ्न-बाधा, कोई रुकावट न पड़ी। हां, अनुभव न होने के कारण पंडितजी का प्रबंध गोदावरी के प्रबंध जैसा अच्छा न था। कुछ खर्च ज्यादा पड़ जाता था। पर काम भली-भांति चला जाता था। हां, गोदावरी को गोमती के सभी काम दोषपूर्ण दिखाई देते थे। ईर्ष्या में अग्नि है। परंतु अग्नि का गुण उसमें नहीं। वह हृदय को फैलाने के बदले और भी संकीर्ण कर देती है। अब घर में कुछ हानि हो जाने से गोदावरी को दुःख के बदले आनंद होता। बरसात के दिन थे। कई दिन तक सूर्यनारायण के दर्शन न हुए। संदूक में रखे हुए कपड़ों में फफूंदी लग गयी। तेल के अचार बिगड़ गए। गोदावरी को यह सब देखकर रत्ती भर भी दुःख न हुआ। हां, दो चार जली-कटी सुनाने का अवसर अवश्य मिल गया। मालकिन ही बनना आता है कि मालकिन का काम करना भी।

पंडित देवीदत्त की प्रकृति में भी अब नया रंग नजर आने लगा। जब तक गोदावरी अपनी कार्य-परायणता से घर का सारा बोझ संभाले थी तब तक उनको कभी किसी चीज की कमी नहीं खली। यहां तक कि शाक-भाजी के लिए भी उन्हें बाजार नहीं जाना पड़ा। पर अब गोदावरी उन्हें दिन में कई बार बाजार दौड़ते देखती। गृहस्थी का प्रबंध ठीक न रहने से बहुधा जरूरी चीजों के लिए उन्हें बाजार ऐन वक्त पर जाना पड़ता। गोदावरी यह कौतुक देखती और सुना-सुनाकर कहती, यही महाराज हैं कि एक तिनका उठाने के लिए भी न उठते थे। अब देखती हूं दिन में दस दफा बाजार में खड़े रहते हैं। अब मैं इन्हें कभी यह कहते नहीं सुनती कि मेरे लिखने-पढ़ने में हर्ज होगा।

गोदावरी को इस बात का एक बार परिचय मिल चुका था कि पंडितजी बाजार-हाट के काम में कुशल नहीं है। इसलिए जब उसे कपड़े की जरूरत होती तब वह अपने पड़ोस के एक बूढ़े लाला साहब से मंगवाया करती थी। पंडितजी को यह बात भूल-सी गयी थी कि गोदावरी को साड़ियों की भी जरूरत पड़ती है। उनके सिर से तो जितना बोझ कोई हटा दे उतना ही अच्छा था। खुद वे भी वही कपड़े पहनते थे जो गोदावरी मंगाकर उन्हें दे देती थी। पंडितजी को नए फैशन और नये नमूने से कोई प्रयोजन न था। पर अब कपड़ों के लिए भी उन्हीं को बाजार जाना पड़ता है। एक बार गोमती के पास साड़ियां न थी। पंडितजी बाजार गए तो एक बहुत अच्छा-सा जोड़ा उसके लिए ले आये। बजाज ने मनमाने दाम लिये। उधार सौदा लाने में पंडितजी जरा भी आगा-पीछा न करते थे। गोमती ने वह जोड़ा गोदावरी को दिखाया। गोदावरी ने देखा और मुंह फेर कर रुखाई से बोली, भला तुमने उन्हें कपड़े लाना तो सिखा दिया। मुझे तो सोलह वर्ष बीत गए, उनके हाथ का लाया हुआ एक कपड़ा स्वप्न में भी पहनना नसीब न हुआ।

ऐसी घटनाएं गोदावरी की ईर्ष्याद्वेष को और भी प्रज्ज्वलित कर देती थीं। जब तक उसे यह विश्वास था कि पंडित जी स्वभाव से ही रूखे है तब तक उसे संतोष था। परन्तु अब उनकी ये नयी-नयी तरंगें देखकर उसे मालूम हुआ कि जिस प्रीति को मैं सैकड़ों यत्न करके भी न पा सकी, उसे इस रमणी ने केवल अपने यौवन से जीत लिया। उसे अब निश्चय हुआ कि मैं जिसे सच्चा प्रेम समझ रही थी वह वास्तव में कपटपूर्ण था। वह निरा स्वार्थ था।

दैवयोग से इन्हीं दिनों गोमती बीमार पड़ी। उसे उठने-बैठने की भी शक्ति न रही। गोदावरी रसोई बनाने लगी, पर उसे इसका निश्चय नहीं था कि गोमती वास्तव में बीमार है। उसे यही ख्याल था कि मुझसे खाना पकवाने के लिए ही दोनों प्राणियों ने यह स्वांग रचा है। पड़ोस की स्त्रियों से कहती कि लौंडी बनने में इतनी ही कसर थी वह पूरी हो गयी।

पंडितजी को आजकल खाना खाते वक्त भाग-भाग सी पड़ जाती है। वे न जाने क्यों गोदावरी से एकांत में बातचीत करते डरते हैं। न मालूम कैसी कठोर और हृदय-विदारक बातें वह सुनाने लगे। इसीलिए खाना खाते वक्त वे डरते थे कि कहीं उस भयंकर समय का आगमन न हो जाये। गोदावरी अपने तीव्र नेत्रों से उनके मन का भाव ताड़ जाती थी, पर मन-ही-मन में ऐंठ कर रह जाती थी।

एक दिन उससे न रहा गया। वह बोली, क्या मुझसे बोलने की भी मनाही कर दी गयी है? देखती हूं कहीं तो रात-रात भर बातों का तार नहीं टूटता, पर मेरे सामने मुंह खोलने की भी कसम-सी खायी है। घर का रंग ढंग देखते हो न अब तो काम तुम्हारे इच्छानुसार चल रहा है न?

पंडितजी ने सिर नीचा किए हुए उत्तर दिया, उंह जैसे चलता है वैसे चलता है। उस फिक्र से क्या अपनी जान दे दूं? जब तुम यह चाहती हो कि घर मिट्टी में मिल जाये तब फिर मेरा क्या वश है?

इस पर गोदावरी ने बड़े कठोर वचन कहे। बात बढ़ गयी। पंडितजी चौके पर से उठ आये। गोदावरी ने कसम दिलाकर उन्हें बिठाना चाहा, पर वे क्षण भर भी न रुके, तब उसने भी रसोई उठा दी। सारे घर को उपवास करना पड़ा।

गोमती में एक विचित्रता यह थी कि वह कड़ी-से-कड़ी बात सहन कर सकती थी पर भूख सहन करना उसके लिए बड़ा कठिन था। इसलिए कोई व्रत भी न रखती थी। हां, कहने-सुनने को जन्माष्टमी रख लेती थी। पर आजकल बीमारी के कारण उसे और भी भूख लगती थी। जब उसने देखा कि दोपहर होने को आयी और भोजन मिलने के कोई लक्षण नहीं, तब विवश होकर बाजार से मिठाई मंगायी। सम्भव है उसने गोदावरी को जलाने के लिए ही खेल खेला हो, क्योंकि कोई भी एक वक्त खाना न खाने से मर नहीं जाता। गोदावरी के सिर से पैर तक आग लग गयी। उसने भी तुरंत मिठाइयां मंगवाईं। कई वर्ष के बाद आज उसने पेट भर मिठाइयां खायी। ये सब ईर्ष्या के कौतुक है।

जो गोदावरी दोपहर के पहले मुंह में पानी न डालती थी, वही अब प्रातःकाल ही कुछ जलपान किए बिना नहीं रह सकती। सिर में वह हमेशा मीठा तेल डालती थी, पर अब मीठे तेल से उसके सिर में पीड़ा होने लगती थी। पान खाने का उसे नया व्यसन लग गया। ईर्ष्या ने उसे नयी नवेली बहू बना दिया।

जन्माष्टमी का शुभ दिन आया। पंडितजी का स्वाभाविक आलस्य इन दो-तीन दिनों के लिए गायब हो जाता था। बड़े उत्साह से झांकी बनाने में लग जाते थे। गोदावरी यह व्रत बिना जल के रखती थी और पंडितजी तो कृष्ण के उपासक ही थे। अब उनके अनुरोध से गोमती ने भी निर्जल व्रत रखने का साहस किया, पर उसे बड़ा आश्चर्य हुआ जब महरी ने आकर उससे कहा, बड़ी बहू निर्जल न रहेगी उनके लिए फलाहार मंगा दो।

संध्या समय गोदावरी ने मान-मंदिर जाने के लिए इक्के की फरमाइश की। गोमती को यह फरमाइश बुरी मालूम हुई। आज के दिन इक्के का किराया बहुत बढ़ जाता था। मान-मंदिर कुछ दूर भी नहीं था। इससे वह चिढ़ कर बोली – व्यर्थ रुपया क्यों फेंका जाए? मंदिर कौन बड़ी दूर है। पांव-पांव क्यों नहीं चली जाती। हुक्म चला देना तो सहज है। अखरता उसे है जो बैल की तरह कमाता है।

तीन साल पहले गोमती ने इसी तरह की बातें गोदावरी के मुंह से सुनी थी। आज गोदावरी को भी गोमती के मुंह से सुननी पड़ीं। समय की गति!