सारंधा ने कहारों से कहा – ‘डोली रोक लो। बुंदेला सिपाहियों ने भी तलवारें खींच ली। राजा की अवस्था बहुत शोचनीय थी, किन्तु जैसे दबी हुई आग हवा लगते ही प्रदीप्त हो जाती है, उसी प्रकार संकट का ज्ञान होते ही उनके जर्जर शरीर में वीरात्मा चमक उठी। वे पालकी का पर्दा उठाकर बाहर निकल आये। धनुष-बाण हाथ में ले लिया, किन्तु वह धनुष जो उनके हाथ में इंद्र का वज्र बन जाता था, इस समय जरा भी न झुका। सिर में चक्कर आया, पैर थर्रथर्राये और वे धरती पर गिर पड़े। भावी अमंगल की सूखना मिल गयी। उस पंख रहित, पक्षी के सदृश, जो सांप को अपनी तरफ आते देखकर ऊपर के उचकता है और फिर गिर पड़ता है, राजा चम्पतराय फिर संभल कर उठे और फिर गिर पड़े। सारंधा ने उन्हें संभाल कर बिठाया और रोकर बोलने की चेष्टा की, परन्तु मुंह से केवल इतना निकला- ‘प्राणनाथ!’ इसके आगे मुंह से एक शब्द भी न निकल सका। आन पर मरने कली सारंधा इस समय साधारण स्त्रियों की भांति शक्तिहीन हो गयी, लेकिन एक अंश तक यह निर्बलता स्त्री जाति की शोभा है।
चम्पतराय बोले – ‘सारन, देखो, हमारा एक वीर जमीन पर गिरा। शोक! जिस आपत्ति से यावज्जीवन डरता रहा, उसने इस अंतिम समय आ घेरा। मेरी आंखों के सामने शत्रु तुम्हारे कोमल शरीर पर हाथ लगाएंगे, और मैं जगह से हिल भी न सकूंगा। हाय! मृत्यु, तू कब आयेगी! यह कहते-कहते उन्हें एक विचार आया। तलवार की तरफ हाथ बढ़ाया, मगर हाथों में दम न था। तब सारंधा से बोले – ‘प्रिये,- तुमने कितने ही अवसरों पर मेरी आन निभायी है।’
इतना सुनते ही सारंधा ने मुरझाये हुए मुख पर लाली दौड़ गयी। आंसू सूख गये। इस आशा में कि, मैं पति के कुछ काम आ सकती हूं उसके हृदय में बल का संचार कर दिया। वह राजा की ओर विश्वासोत्पादक भाव से देखकर बोली – ‘ईश्वर ने चाहा तो मरते दम तक निभाऊंगी।’
रानी ने समझा, राजा मुझे प्राण देने का संकेत कर रहे हैं।
चम्पतराय – ‘तुमने मेरी बात कभी नहीं टाली।’
सारंधा – ‘मरते दम तक न टालूंगी।’
सारंधा ने तलवार को निकालकर अपने वक्ष-स्थल पर रख लिया और कहा – ‘यह आपकी आज्ञा नहीं है। मेरी हार्दिक अभिलाषा है कि मरु तो यह मस्तक आपके पद-कमलों पर हो।’ चम्पतराय – ‘तुमने मेरा मतलब नहीं समझा। क्या तुम मुझे इसलिए शत्रुओं के हाथ में छोड़ जाओगी कि मैं बेड़ियां पहने हुए दिल्ली की गलियों में निंदा का पात्र बनूं।’
रानी ने जिज्ञासा की दृष्टि से राजा को देखा। वह उनका मतलब न समझी।
राजा – ‘तुमसे एक वरदान मांगता हूं।’
रानी – ‘सहर्ष मांगिए।’
राजा – ‘यह मेरी अंतिम प्रार्थना है। जो कुछ कहूंगा, करोगी?’
रानी – ‘सिर के बल करूंगी।’
राजा – ‘देखो, तुमने वचन दिया है। इनकार न करना।’
रानी – (कांप कर) ‘आपके कहने की देर है।’
राजा – ‘अपनी तलवार मेरी छाती में चुभा दो?’
रानी – रानी के हृदय पर वज्राघात-सा हो गया। बोली – ‘जीवन नाथ।’, इसके आगे वह और कुछ न बोल सकी। आंखों में नैराश्य छा गया।
राजा – ‘मैं बेड़ियां पहनने के लिए जीवित नहीं रहना चाहता।’
रानी-मुझसे यह कैसे होगा
पाँचवाँ और अन्तिम सिपाही धरती पर गिरा। राजा ने झुँझला कर कहा-इसी जीवन पर आन निभाने का गर्व था
बादशाह के सिपाही राजा की तरफ लपके। राजा ने नैराश्यपूर्ण भाव से रानी की ओर देखा। रानी क्षण भर अनिश्चित रूप से खड़ी रही लेकिन संकट में हमारी निश्चयात्मक शक्ति बलवान हो जाती है। निकट था कि सिपाही लोग राजा को पकड़ लें कि सारन्धा ने दामिनी की भाँति लपक कर तलवार राजा के हृदय में चुभा दी।
प्रेम की नाव प्रेम के सागर में डूब गयी। राजा के हृदय से रुधिर की धारा निकल रही थी पर चेहरे पर शान्ति छाई हुई थी।
कैसा हृदय है। यह स्त्री, जो अपने पति पर प्राण देती थी, अव उसकी प्राण घातिका है। जिस हृदय से आलिंगित होकर उसने यौवन सुख लूटा, जो हृदय उसकी अभिलाषाओं का केन्द्र था, जो उसके अभिमान का पोषक था, उसी हृदय को सारंधा की तलवार छेद रही है। किसी स्त्री की तलवार से ऐसा काम हुआ है?
आह! आत्माभिमान कैसा विषादमय अंत है। उदयपुर और मारवाड़ के इतिहास में भी आत्म-गौरव की ऐसी घटनाएं नहीं मिलती।
बादशाही सिपाही सारंधा का यह साहस और धैर्य देखकर दंग रह गये।
सरदार ने आगे बढ़कर कहा – ‘रानी साहिबा, खुदा गवाह है, हम सब आपके गुलाम हैं। आपका जो हुक्म हो, उसे ब-सरों चश्म बजा लायेंगे।
सारंधा ने कहा – ‘अगर हमारे पुत्रों में से कोई जीवित हो, तो ये दोनों लाशें उसे सौंप देना।’
यह कहकर उसने वही तलवार अपने हृदय में चुभा ली। जब वह अचेत होकर धरती पर गिरी, तो उसका सिर राजा चम्पतराय की छाती पर था।
