Rani Sarandha by Munshi Premchand
Rani Sarandha by Munshi Premchand

चम्पतराय – ‘प्रिये, तुमने सोचकर जवाब नहीं दिया।’

सारंधा – ‘प्राणनाथ, मैं अच्छी तरह जानती हूं कि यह मार्ग कठिन है। और अब हमें अपने योद्धाओं का रक्त पानी के समान बहाना पड़ेगा, परन्तु हम अपना रक्त बहायेंगे और चम्बल की लहरों को लाल कर देंगे। विश्वास रखिए कि जब तक नदी की धारा बहती रहेगी, वह हमारे वीरों की कीर्ति-गान करती रहेगी। जब तक बुंदेलों का एक भी नामलेवा रहेगा, ये रक्त-बिन्दु उसके माथे पर केशर का तिलक बनकर चमकेंगे।’

वायुमंडल में मेघराज की सेनाएं उमड़ रही थी। ओरछे के किले से बुंदेलों की एक काली घटा उठी और वेग के साथ चम्बल की तरफ चली। प्रत्येक सिपाही वीर-रस से झूम रहा था। सारंधा ने दोनों राजकुमारों को गले से लगा लिया और राजा को पान का बीड़ा देकर कहा – ‘बुंदेलों की लाज अब तुम्हारे हाथ है।’

आज उसका एक-एक अंग मुस्करा रहा है और हृदय हुलसित है। बुंदेलों की यह सेना देखकर शाहजादे फूले न समाये। राजा वहां की अंगुल-अंगुल भूमि से परिचित थे। उन्होंने बुंदेलों को तो एक आड़ में छिपा दिया और वे शाहजादों की फौज को सजाकर नदी के किनारे-किनारे पश्चिम की ओर चले। दारा शिकोह को भ्रम हुआ कि शत्रु किसी अन्य घाट से नदी उतरना चाहता है। उन्होंने घाट पर से मोर्चे हटा लिए। घाट में बैठे हुए बुन्देले उसी ताक में थे। बाहर निकल पड़े और उन्होंने तुरन्त ही नदी में घोड़े डाल दिये। चम्पतराय ने शाहजादा दारा शिकोह को भुलावा देकर अपनी फौज घुमा दी और बुंदेलों के पीछे चलता हुआ उसे पार उतार लाया। इस कठिन चाल में सात घंटों का विलम्ब हुआ, परन्तु जाकर देखा तो सात सौ बुंदेलों की लाशें तड़प रही थीं।

राजा को देखते ही बुंदेलों की हिम्मत बंध गयी। शाहजादों की सेना ने भी ‘अल्लाह-अकबर की ध्वनि के साथ धावा किया। बादशाही सेना में हलचल मच गयी। उनकी पंक्तियां छिन-भिन्न हो गयी, हाथों-हाथ लड़ाई होने लगी, यहां तक कि शाम हो गयी। रणभूमि इधर से लाल हो गयी और आकाश में अंधेरा हो गया। घमासान की मार हो रही थी। बादशाही सेना शाहजादों को दबाये जाती थी अकस्मात् पश्चिम से फिर बुंदेलों की एक लहर उठी और वेग से बादशाही सेना की पुश्त पर टकराई कि उसके कदम उखड़ गये। जीता हुआ मैदान हाथ से निकल गया। लोगों को कुतूहल था कि यह दैवी सहायता कहां से आयी। सरल स्वभाव के लोगों की यह धारणा थी कि यह फतह के फरिश्ते हैं। शाहजादों की मदद के लिए आये हैं, परंतु जब राजा चम्पतराय निकट आये तो सारंधा ने घोड़े से उतरकर उनके पैरों पर सिर झुका दिया। राजा को असीम आनंद हुआ। यह सारंधा थी।

समर-भूमि का दृश्य इस समय अत्यंत दुखमय था। थोड़ी देर पहले जहां सजे हुए वीरों के दल थे वहां अब बेजान लाशें तड़प रहीं थी। मनुष्य ने केवल अपने स्वार्थ के लिए अन्नादि काल से ही भाइयों की हत्या की है।

अब विजयी सेना लूट पर टूट पड़ी। पहले मर्द मर्दों से लड़ते थे। यह वीरता और पराक्रम का चित्र था, यह नीचता और दुर्बलता की ग्लानिप्रद तस्वीर थी। उस समय मनुष्य पशु बना हुआ था, अब वह पशु से भी बढ़ गया था।

इस नोंच-खसोट में लोगों को बादशाही सेना के सेनापति वली बहादुर खां की लाश दिखायी दी। उसके निकट उसका घोड़ा खड़ा हुआ अपनी दुम से मक्खियां उड़ा रहा था। राजा को घोड़ों का शौक था। देखते ही वह उस पर मोहित हो गया। यह एराकी जाति का अति सुंदर घोड़ा था। एक-एक अंग सांचे में ढला हुआ, सिंह की-सी छाती, चीते की-सी कमर, उसका यह प्रेम और स्वामिभक्ति देखकर लोगों को बड़ा कौतूहल हुआ। राजा ने हुक्म दिया – ‘खबरदार! इस प्रेमी पर कोई हथियार न चलाये, इसे जीता पकड़ लो, यह मेरे अस्तबल की शोभा बढ़ायेगा। जो इसे मेरे पास ले आयेगा, उसे धन से निहाल कर दूंगा।’

योद्धागण चारों ओर से लपके, परन्तु किसी को साहस न होता था कि उसके निकट जा सके। कोई चुमकार रहा था, कोई फंदे में फंसाने की फिक्र में था पर कोई उपाय सफल नहीं होता था। यहां सिपाहियों का मेल-सा लगा हुआ था।

तब सारंधा अपने खेमे से निकली और निर्भय होकर घोड़े के पास चली गयी। उसकी आंखों में प्रेम का प्रकाश था, छल का नहीं। घोड़े ने सिर झुका दिया। रानी ने उसकी गर्दन पर हाथ रखा और वह उसकी पीठ सहलाने लगी। घोड़े ने उसके अंचल में मुंह छिपा लिया। रानी उसकी रास पकड़कर खेमे की ओर चली। घोड़ा इस तरह चुपचाप उसके पीछे चला मानों सदैव से उसका सेवक है। पर बहुत अच्छा होता कि घोड़े ने सारंधा से भी निष्ठुरता की होती। यह सुन्दर घोड़ा आगे चलकर इस राज-परिवार के निमित्त स्वर्ण-जटित मृग साबित हुआ ।

संसार एक रण-क्षेत्र है। इस मैदान में उसी सेनापति को विजय-लाभ होता है, जो अवसर को पहचानता है। वह अवसर पर जितने उत्साह से आगे बढ़ता है, उतने ही उत्साह से आपत्ति के समय पीछे हट जाता है। वह वीर पुरुष राष्ट्र का निर्माता होता है और इतिहास उसके नाम पर यश के फूलों की वर्षा करता है।

पर इस मैदान में कभी-कभी ऐसे सिपाही भी जाते हैं, जो अवसर पर कदम बढ़ाना जानते हैं, लेकिन संकट में पीछे हटना नहीं जानते। ये रणवीर पुरुष विजय को नीति की भेंट कर देते हैं। वे अपनी सेना का नाम मिटा देंगे, किन्तु जहां एक बार पहुंच जाये हैं, वहां से कदम पीछे न हटायेंगे। उनसे कोई विरला ही संसार-क्षेत्र में विजय प्राप्त करता है, किन्तु प्रायः उसकी हार विजय से भी अधिक गौरवात्मक होती है। अगर अनुभवशील सेनापति राष्ट्रों की नींव की डालता है, तो आन पर जान देने वाला, मुंह न मोड़ने वाला सिपाही राष्ट्र के भावों को उच्च करता है, और उसके हृदय पर नैतिक गौरव को अंकित कर देती है। उसे इस कार्य-क्षेत्र में चाहे सफलता न हो, किंतु जब किसी वाक्य या सभा में उसका नाम जबान पर आ जाता है, तो श्रोतागण एक स्वर से उसकी कीर्ति-गौरव को प्रतिध्वनित कर देते हैं। सारंधा ‘आन पर जान देने वालों’ में थी।

शाहजादा मुहीउद्दीन चम्बल के किनारे से आगरा की ओर चला तो सौभाग्य उसके सिर पर मोर्छल हिलाता था। जब वह आगरा पहुंचा तो विजयदेवी ने उसके लिए सिंहासन सजा दिया औरंगजेब गुणज्ञ था। उसने बादशाही सरदारों के अपराध-क्षमा कर दिये, उनके राज्य-पद लौट दिये और राजा चम्पतराय से उसके बहुमूल्य कृत्यों के उपलक्ष्य में बारह हजार मनसब प्रदान किया। ओरछा से बनारस और बनारस से जमुना तक उसकी जागीर नियत की गयी। बुंदेला राजा फिर राज्य सेवक बना, वह फिर सुख-विलास में डूबा और रानी सारंधा फिर पराधीनता के शोक में घुलने लगी।

वली बहादुर खां बड़ा वाक्-चतुर मनुष्य था। उसकी मृदुता ने शीघ्र ही उसे बादशाह आलमगीर का विश्वास पात्र बना दिया। उस पर राज्य-सभा में सम्मान की दृष्टि पड़ने लगी। खां साहब के मन में अपने घोड़े के हाथ से निकल जाने का बड़ा शोक था।

एक दिन कुवंर छत्रसाल उसी घोड़े पर सवार होकर सैर को गया था। वह खां साहब के महल की तरफ जा निकला। वली बहादुर ऐसे ही अवसर की ताक में था। उसने तुरंत अपने सेवकों को इशारा किया। राजकुमार अकेला क्या करता? पांव-पांव घर आया और उसने सारंधा से सब समाचार बयान किया। रानी का चेहरा तमतमा गया। बोली, ‘मुझे इसका शोक नहीं कि घोड़ा हाथ से गया, शोक है कि तू उसे छोड़कर जीता क्यों लौटा, क्या तेरे शरीर में बुंदेलों का रक्त नहीं है घोड़ा न मिलता, न सही, किंतु तुझे दिखा देना चाहिए था कि एक बुंदेला बालक से उसका घोड़ा छीन लेनी हंसी नहीं है।’

यह कहकर उसने अपने पच्चीस योद्धाओं को तैयार होने की आज्ञा दी। स्वयं अस्त्र धारण किये और योद्धाओं के साथ वली बहादुर खां के निवास-स्थान पर जा पहुंची। खां साहब, उसी घोड़े पर सवार होकर दरबार चले गये थे, सारंधा दरबार के सामने जा पहुंची। यह कैफियत देखते ही दरबार में हलचल मच गयी। अधिकारी वर्ग इधर-उधर से आकर जमा हो गये। आलमगीर भी सहन में निकल आये। लोग अपनी-अपनी तलवारें संभालने लगे बातें और चारों तरफ शोर मच गया। कितने ही नेत्रों ने इसी दरबार में अमरसिंह के तलवार की चमक देखी थी। उन्हें वही घटना फिर याद आ गयी।

सारंधा ने उच्च स्वर से कहा – ‘खां साहब, बड़ी लज्जा की बात है, आपने वही वीरता जो चम्बल के तट पर दिखानी चाहिए थी, आज एक अबोध बालक के सम्मुख दिखायी है। क्या यह उचित था कि आप उससे घोड़ा छीन लेते?’

बली बहादुर खां की आंखों से अग्नि-ज्वाला निकल रही थी। वे कड़ी आवाज से बोले – ‘किसी गैर को क्या मजाल है कि मेरी चीज अपने काम में लाये?’ रानी – ‘वह आपकी चीज नहीं, मेरी है। मैंने उसे रण-भूमि में पाया है और उस पर मेरा अधिकर है। क्या रण-नीति की इतनी मोटी बात भी आप नहीं जानते?’

खां साहब – ‘वह घोड़ा मैं नहीं दे सकता, उसके बदले में सारा अस्तबल आपकी नजर है।’

रानी – ‘मैं अपना घोड़ा लूंगी।’

खां साहब – ‘मैं उसके बराबर जवाहरात दे सकता हूं, परन्तु घोड़ा नहीं दे सकता।’

रानी – ‘तो फिर इसका निश्चय तलवार से होगा। बुंदेले योद्धाओं ने तलवारें सौंत ली और निकट था कि दरबार की भूमि रक्त से प्लावित हो जाये, बादशाह आलमगीर ने बीच में आकर कहा – ‘रानी साहिबा, आप सिपाहियों को रोकें। घोड़ा आपको मिल जायेगा, परन्तु इसका मूल्य बहुत देना पड़ेगा।

रानी – ‘मैं उसके लिए अपना सर्वस्व खोने को तैयार हूं।’

बादशाह – ‘जागीर और मन्सब भी?’

रानी – ‘जागीर और मन्सब कोई चीज नहीं।’

बादशाह – ‘अपना राज्य भी।’

रानी – ‘हां राज्य भी।’

बादशाह – ‘एक घोड़े के लिए?’

रानी – ‘नहीं, उस पदार्थ के लिए जो संसार में सबसे अधिक मूल्यवान है।’

बादशाह – ‘वह क्या है?’

रानी – ‘अपनी आन।’

इस भांति रानी ने अपने घोड़े के लिए अपनी विस्तृत जागीर, उच्च राज और राज-सम्मान सब हाथ से खोया और केवल इतना ही नहीं, भविष्य के लिए कांटे बोये, इस घड़ी से अंत दशा तक चम्पतराय को शांति न मिली।

राजा चम्पतराय ने फिर ओरछे के किले में पदार्पण किया। उन्हें मन्सब और जागीर के हाथ से निकल जाने का अत्यन्त शोक हुआ, किन्तु उन्होंने अपने मुंह से शिकायत का एक शब्द भी नहीं निकाला, वे सारंधा के स्वभाव को भली-भांति जानते थे। शिकायत इस समय उसके आत्म-गौरव पर कुठार का काम करती।

कुछ दिन यहां शांतिपूर्वक व्यतीत हुए लेकिन बादशाह सारंधा की कठोर बात भूला न था, वह क्षमा करना जानता ही न था। ज्यों ही भाइयों की ओर से निश्चित हुआ, उसने एक बड़ी सेना चम्पतराय का गर्व चूर्ण करने के लिए भेजी और बाईस अनुभवशील सरदार इस मुहिम पर नियुक्त किये। शुभकरण बुंदेला बादशाह का सूबेदार था। वह चम्पतराय का मित्र और सहपाठी था। उसने चम्पतराय को परास्त करने का बीड़ा उठाया। और भी कितने ही बुंदेला सरदार राजा से विमुख होकर बादशाही सूबेदार से आ मिले। एक घोर संग्राम हुआ। भाइयों की तलवारें रक्त से लाल हुईं। यद्यपि इस समर में राजा को विजय प्राप्त हुई लेकिन उसकी शक्ति सदा के लिए क्षीण हो गयी। निकटवर्ती बुंदेला राजा, जो चम्पतराय के बाहुबल थे, बादशाह के कृपाकांक्षी बन बैठे। साथियों में कुछ तो काम आये, कुछ दगा कर गये। यहां तक कि निज संबंधी ने भी आंखें चुरा लीं, परन्तु इन कठिनाइयों में भी चम्पतराय ने हिम्मत नहीं हारी, धीरज को न छेड़ा। उन्होंने ओरछा छोड़ दिया और वे तीन वर्ष तक बुंदेलखंड के सघन पर्वतों में छिपे फिरते रहे। बादशाही सेनाएं शिकारी जानवरों की भांति सारे देश में मंडरा रही थी। आये दिन राजा का किसी-न-किसी से सामना हो जाता था। सारंधा सदैव उनके साथ रहती और उनका साहस बढ़ाया करती। बड़ी-बड़ी आपत्तियों में, जब कि धैर्य लुप्त हो जाता – और आशा साथ छोड़ देती – आत्मरक्षा का धर्म उसे संभाले रहता था। तीन साल के बाद अंत में बादशाह के सूबेदारों ने आलमगीर को सूचना दी कि इस शेर का शिकार आपके सिवा और किसी से न होगा। उत्तर आया कि सेना को हटा लो और घेरा उठा लो। राजा ने समझा, संकट से निवृत्ति हुई, पर वह बात शीघ्र ही भ्रमात्मक सिद्ध हो गयी।

तीन सप्ताह से बादशाही सेना ने ओरछा घेर रखा है। जिस तरह कठोर वचन हृदय हृदय को छेद डालते हैं, उसी तरह तोपों के गोलों ने दीवार को छेद डाला है। किले में 20 हजार आदमी घिरे हुए हैं, लेकिन उनमें आधे से अधिक स्त्रियां और उनसे कुछ ही कम बालक हैं। मर्दों की संख्या दिनों-दिन न्यून होती जाती है। आने-जाने के मार्ग चारों तरफ से बंद हैं। हवा का भी गुजर नहीं। रसद का सामान बहुत कम रह गया है। स्त्रियां पुरुषों और बालकों को जीवित रखने के लिए आप उपवास करती हैं। लोग बहुत हताश हो रहे हैं। औरतें सूर्यनारायण की ओर हाथ उठा-उठाकर शत्रु को कोसती हैं। बालक वृंद मारे क्रोध के दीवार की आड़ से उन पर पत्थर फेंकते हैं, जो मुश्किल से दीवार के उस पार जा पाते हैं। राजा चम्पतराय स्वयं ज्वर से पीड़ित है। उन्होंने कई दिन से चारपाई नहीं छोड़ी। उन्हें देखकर लोगों को कुछ तरस होता था, लेकिन उनकी बीमारी से सारे किले में नैराश्य छाया हुआ है।

राजा ने सारंधा से कहा – ‘आज शत्रु जरूर किले में घुस आयेंगे।’

सारंधा – ‘ईश्वर न करे कि इन आंखों से वह दिन देखना पड़े।’