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दिल्ली
20-2-26
प्यारी बहन,
तुम्हारा पत्र पढ़कर मुझे तुम्हारे ऊपर दया आयी। तुम मुझे कितना ही बुरा कहो, पर मैं इतनी दुर्गति न सह सकती थी, किसी तरह नहीं। मैंने या तो अपने प्राण दे दिए होते, या फिर उस सास का मुँह न देखती। तुम्हारा सीधापन, तुम्हारी सहनशीलता, तुम्हारी सास-भक्ति, तुम्हें मुबारक हो। मैं तो तुरत आनन्द के साथ चली जाती और चाहे भीख ही क्यों न मांगनी पड़ती, पर उस घर में कदम न रखती। मुझे तुम्हारे ऊपर दया ही नहीं आती, क्रोध भी आता है, इसलिए कि तुममें स्वाभिमान नहीं है। तुम जैसी स्त्रियों ने सास और पुरुषों का मिज़ाज आसमान पर चढ़ा दिया है। जहन्नुम में जाए ऐसा घर. जहाँ अपनी इज्जत नहीं। मैं पति-प्रेम भी इन दामों न लूँ। तुम्हें उन्नीसवीं सदी में जन्म लेना चाहिए था। उस वक्त तुम्हारे गुणों की प्रशंसा होती। इन स्वाधीनता और नारी- सत्य के नवयुग में तुम केवल प्राचीन इतिहास हो। यह सीता और दमयंती का युग नहीं है। पुरुषों ने बहुत दिनों तक राज्य किया। अब स्त्री-जाति का राज्य होगा। मगर अब अधिक व कोसूंगी।
अब मेरा हाल सुनो। मैंने सोचा था, पत्रों में अपनी बीमारी का समाचार छपवा दूंगी। लेकिन फिर ख्याल आया यह समाचार छपते ही मित्रों का ताँता लग जाएगा। कोई मिज़ाज पूछने आएगा, कोई देखने आएगा। फिर मैं कोई रानी तो हूँ नहीं, जिसकी बीमारी का बुलेटिन रोजाना छापा जाए। न जाने लोगों के दिल में कैसे-कैसे विचार उत्पन्न हों, यह सोचकर मैंने पत्र में छापने का विचार छोड़ दिया। दिन भर मेरे दिल की क्या दशा रही, लिख नहीं सकती। कभी मन में आता, जहर आ लूँ। कभी सोचती, कहीं न जाऊँ। विनोद के संबंध में भांति- भांति की शंकाएं होने लगीं। अब मुझे ऐसी कितनी ही बातें याद आने लगीं जब मैंने विनोद के प्रति उदासीनता का भाव दिखाया था। मैं उनसे सब कुछ पा लेना चाहती थी। मैं चाहती थी कि वह आठों पहर भ्रमर की भांति मुझ पर मँडराते रहे, पतंगा की भांति मुझे घेरे रहें। उन्हें किताबों और पत्रों में मग्न देखकर मुझे झुँझलाहट होने लगती थी। मेरा अधिकांश समय अपने ही बनाव-सिंगार कटता था, उनके विषय में मुझे कुछ चिंता न होती थी। अब मुझे मालूम हुआ कि सेवा का महत्त्व, रूप से कहीं अधिक है। रूप मन को मुग्ध कर सकता है, आत्मा को आनंद पहुँचाने वाली कोई दूसरी ही वस्तु है।
इस तरह एक हफ़्ता गुजर गया। मैं प्रातःकाल मैके जाने की तैयारियाँ कर रही थी- यह घर फाड़े खाता था-कि सहसा डाकिये ने एक पत्र लाकर दिया। मेरा हृदय धक-धक करने लगा। मैंने काँपते हाथों से पत्र लिया पर सिरनामे पर विनोद की हस्तलिपि न थी। लिपि किसी स्त्री की थी, इसमें संदेह न था, पर मैं उससे सर्वथा अपरिचित थी। मैंने तुरंत पत्र खोला और नीचे की तरफ देखा, तो चौंक पड़ी-यह कुसुम का पत्र था। मैंने एक में साँस में सारा पत्र पढ़ लिया। लिखा था-’बहन, विनोद बाबू तीन दिन यहाँ रहकर बंबई चले गए। शायद विलायत जाना चाहते हैं। तीन-चार दिन बम्बई रहेंगे। मैंने बहुत चाहा कि उन्हें देहली वापस कर दूँ, पर वह किसी तरह राजी न हुए। तुम उन्हें नीचे लिखे पते से तार दे दो। शायद? जा. । यह क्या बात हुई? मुझसे तो विनोद ने बहुत पूछने पर भी नहीं बताया, पर वह दुःखी बहुत थे। ऐसे आदमी को भी तुम अपना न बना सकी, इसका मुझे आश्चर्य है, पर मुझे इसकी पहले ही शंका थी। रूप और गर्व में दीपक और प्रकाश का संबंध है। गर्व रूप का प्रकाश है।’
मैंने पत्र रख दिया और उसी वक्त विनोद के नाम तार भेज दिया कि बहुत बीमार हूँ तुरन्त आओ। मुझे आशा थी कि विनोद तार द्वारा जवाब देंगे, लेकिन सारा दिन गुजर गया और कोई जवाब न आया। बँगले के सामने से कोई सवारी निकलती, तो मैं तुरंत उसकी ओर ताकने लगती थी कि शायद तार का चपरासी हो। रात को भी मैं तार का इंतजार करती रही। तब मैंने अपने मन को इस प्रकार शांत किया कि विनोद आ रहे हैं, इसलिए तार भेजने की जरूरत न समझी।
अब मेरे मन में फिर शंकाएँ उठने लगी। विनोद कुसुम के पास क्यों गये। कहीं उसी प्रेम के करण तो मुझसे वह विरक्त नहीं हो गए? कुसुम कोई कौशल तो नहीं कर रही है? उसे विनोद को अपने घर ठहराने का अधिकार ही क्या था? इस विचार से मेरा मन बहुत छुब्ध हो उठा । कुसुम पर क्रोध आने लगा । अवश्य दोनों में बहुत दिनों से पत्र व्यवहार होता? रहा होगा । मैंने फिर कुसुम का पत्र पढ़ा और अबकी उसके प्रत्येक शब्द में मेरे लिए कुछ सोचने की सामग्री रखी हुई थी । निश्चय किया कि कुसुम को एक पत्र लिखकर खूब कोसूं । आधा पत्र लिख भी डाला, पर उसे फाड़ डाला । उसी वक्त विनोद को एक पत्र लिखा । तुमसे कभी भेंट होगी, तो वह पत्र दिखाऊंगी, जो कुछ मुँह में आया, बक डाला। इस पत्र की भी वही दशा जो कुसुम के पत्र की हुई थी। लिखने के बाद मालूम हुआ कि वह किसी विक्षिप्त हृदय की बकवास है। मेरे मन में यही बात बैठती जाती थी कि यह कुसुम के पास हैं। वही छलिनी उन पर अपना जादू चला रही है। यह दिन भी बीत गया। डाकिया कई बार आया, पर मैंने उसकी ओर आँखें भी नहीं उठायी। चंदा, मैं नहीं कह सकती, मेरा हृदय कितना तिलमिला रहा था। अगर कुसुम उस समय मुझे मिल जाती, तो मैं न-जाने क्या कर डालती। रात को लेटे-लेटे ख्याल आया, कहीं वह योरोप न चले गए हो। जी बेचैन हो उठा। सिर में ऐसा चक्कर आने लगा, मानो पानी में डूबी जाती हूँ। अगर वह योरोप चले गए, तो फिर कोई आशा नहीं। मैं उसी वक्त उठी और घड़ी पर नजर डाली। दो बजे थे। नौकर को जगाया और तार-घर आ पहुँची। बाबूजी कुरसी पर लेटे-लेटे सो रहे थे। बड़ी मुश्किल से उनकी नींद खुली। मैंने रसीदी तार दिया। जब बाबूजी तार दे चुके, तो मैंने पूछा- इसका जवाब कब आएगा?
बाबू ने कहा- यह प्रश्न किसी ज्योतिषी से कीजिए। कौन जानता है, वह कब जवाब दें। तार का चपरासी जबरदस्ती तो उनसे जवाब नहीं लिखा सकता। अगर और कोई कारण न हो, तो 8-9 बजे तक जवाब आ जाना चाहिए।
घबराहट में आदमी की बुद्धि पलायन कर जाती है। ऐसा निरर्थक प्रश्न करके मैं स्वयं लज्जित हो गयी। बाबूजी ने अपने मन में मुझे कितना मूर्ख समझा होगा। और, मैं वहीं एक बेंच पर बैठ गई, और तुम्हें विश्वास न आएगा, नौ बजे तक वहीं बैठी रही। सोचो, कितने घंटे हुए। पूरे सात घंटे। सैकड़ों आदमी आये और गये, पर मैं यहाँ जमी बैठी रही। जब तार का डमी खटकता, मेरे हृदय में धड़कन होने लगती। लेकिन इस भय कि बाबूजी झल्ला न उठें, कुछ पूछने का साहस न करती थी। जब दफ्तर की घड़ी में दो बजे, तो मैंने डरते-डरते बाबू से पूछा- क्या अभी तक जवाब नहीं आया?
बाबू ने कहा- आप तो यहीं बैठी हैं, जवाब आता तो क्या मैं खा डालता?
मैंने, बेहयाई करके फिर पूछा- तो क्या अब न आएगा?
बाबू! ने मुँह फेरकर कहा- और दो-चार घंटे बैठी रहिए।
बहन, यह वाक्य शर के समान मेरे हृदय में लगा। आंखें भर आयीं। लेकिन फिर भी मैं वहाँ से हटी नहीं। अब भी आशा बँधी हुई थी कि शायद जवाब आया हो। अब दो घंटे और गुजर गए, तब मैं निराश हो गई। हाय!. विनोद ने मुझे कहीं का न रखा। मैं घर चली, तो आंखों से आंसुओं की झड़ी लगी हुई थी। रास्ता न सूझता था।
सहसा पीछे मोटर का हॉर्न सुनायी दिया। मैं रास्ते से हट गई। उस वक्त मन में आया, इसी मोटर के नीचे लेट जाऊँ और जीवन का अंत कर दूँ। मैंने आंखें पोंछकर मोटर की ओर देखा, भुवन बैठा हुआ था, और उसकी बगल में बैठी हुई थी कुसुम! ऐसा जान पड़ा, मानो अग्नि की ज्वाला मेरे पैरों से समाकर सिर से निकल गई। मैं उन दोनों की निगाहों से बचना चाहती थीं, लेकिन मोटर रुक गई और कुसुम उतरकर मेरे गले से लिपट गई। भुवन चुपचाप मोटर में बैठा रहा, मानो मुझे जानता ही नहीं। निर्दयी, धूर्त।
कुसुम ने पूछा- मैं तो तुम्हारे पास जाती थी, बहन! वहाँ से कोई खबर आयी? मैंने बात टालने के लिए कहा- तुम कब आयीं?
भुवन के सामने मैं अपनी विपत्ति-कथा न कहना चाहती थी।
‘नहीं, मैं चली जाऊंगी। अवकाश मिले तो एक बार चली आना।’
कुसुम ने मुझसे आग्रह न किया। कार में बैठकर चल दी। मैं खड़ी ताकती रह गयी। यह वही कुसुम है या कोई और? कितना बड़ा अंतर हो गया?
मैं घर चली, तो सोचने लगी-भुवन से इसकी जान-पहचान कैसे हुई? कहीं ऐसा तो नहीं है कि विनोद ने इसे मेरी टोह लेने को भेजा हो! भुवन के विषय में कुछ पूछने तो नहीं आयी?
मैं घर बैठी ही थी कि कुसुम आ पहुँची। अबकी वह मोटर में अकेली न थी- विनोद बैठे हुए थे। मैं उन्हें देखकर ठिठक गई। चाहिए तो यह था कि मैं दौड़कर उनका हाथ पकड़ लेती और मोटर से उतार लाती, लेकिन मैं जगह से हिली तक नहीं। मूर्ति की भांति अचल बैठी रही। मेरी मानिनी प्रकृति अपना उद्दंड स्वरूप दिखाने के लिए विकल हो उठी। एक क्षण में कुसुम ने विनोद को उतारा और उनका हाथ पकड़े हुए ले आयी। उस वक्त मैंने देखा कि विनोद का मुख बिलकुल पीला पड़ा हुआ है और वह इतने अशक्त हो गए हैं कि अपने सहारे खड़े भी नहीं रह सकते। मैंने घबराकर पूछा- क्यों, तुम्हारा यह क्या हाल है? कुसुम ने कहा- हाल पीछे पूछना, जरा इनकी चारपाई चटपट बिछा दो और थोड़ा-सा दूध मँगवा लो।
मैंने तुरंत चारपाई बिछाई और विनोद को उस पर लिटा दिया। दूध तो रखा ही हुआ था। कुसुम उस समय मेरी स्वामिनी बनी हुई थी। मैं उसके इशारे पर नाच रही थी। चंदा, मुझे उस वक्त ज्ञात हुआ कि कुसुम पर विनोद को जितना विश्वास है, वह मुझ पर नहीं। मैं इस योग्य हूँ ही नहीं। मेरा दिल सैकड़ों प्रश्न पूछने के लिए तड़प रहा था, लेकिन कुसुम एक पल के लिए विनोद के पास से न टलती थी। मैं इतनी मूर्ख हूँ कि अवसर पाने पर इस दशा में भी मैं विनोद से प्रश्नों का ताँता बाँध देती।
विनोद को जब नींद आ गई, तो मैंने आंखों में आंसू भरकर कुसुम से पूछा- बहन, ‘इन्हें क्या शिकायत है? मैंने तार भेजा, उसका जवाब नहीं आया। रात दो बजे एक जरूरी तार भेजा। दस बजे तक तार-घर में बैठी जबाब की राह देखती रही। वहीं से लौट रही थी, जब तुम रास्ते में मिलीं। यह तुम्हें कहां मिल गए?’
कुसुम मेरा हाथ पकड़कर- दूसरे कमरे में ले गयी बोली- ‘पहले तुम यह बताओ कि भुवन का क्या मामला था? देखो साफ कहना।’
मैंने आपत्ति करते हुए कहा- ‘कुसुम, तुम यह प्रश्न पूछकर मेरे साथ अन्याय कर रही हो। तुम्हें खुद समझ लेना चाहिए था कि इस बात में कोई सार नहीं है। विनोद को केवल भ्रम हो गया।’
‘बिना किसी कारण के?
‘हाँ? मेरी समझ में तो कोई कारण न था।’
‘मैं इसे नहीं मानती। यह क्यों नहीं कहती कि विनोद को जलाने, चिढ़ाने और जगाने के लिए तुमने वह स्वांग रचा था?’
कुसुम की सूझ पर चकित होकर मैंने कहा- ‘वह तो केवल दिल्लगी थी।’
‘तुम्हारे लिए दिल्लगी थी, विनोद के लिए वज्राघात था। तुमने इतने दिनों तक उनके साथ रहकर भी उन्हें नहीं समझा! तुम्हें अपने बनाव-संवार के आगे उन्हें समझने की कहाँ फुरसत? कदाचित तुम समझती हो कि तुम्हारी यह मोहिनी मूर्ति ही सब कुछ है। मैं कहती हूँ इसका तमगा दो-चार महीने के लिए हो सकता है। स्थायी वस्तु और ही है।’
मैंने अपनी भूल स्वीकार करते हुए कहा- ‘विनोद को मुझसे कुछ पूछना तो चाहिए था?’
कुसुम ने हंसकर कहा – ‘यही तो वह नहीं कर सकते। तुमसे ऐसी बातें पूछना उनके लिए असंभव है। वह उन प्राणियों में से हैं, जो स्त्री की आँखों से गिरकर जीते नहीं रह सकते। स्त्री या पुरूष किसी के लिए भी वह किसी प्रकार का धार्मिक या नैतिक बंधन नहीं रखना चाहते। वह प्रत्येक प्राणी के लिए पूर्ण स्वाधीनता के समर्थक हैं। मन और इच्छा के सिवा वह और कोई बंधन स्वीकार नहीं करते। इस विषय पर मेरी उनसे खूब बातें हुईं। खैर, मेरा पता इन्हें मालूम था ही, यहाँ से सीधे मेरे पास पहुंचे। समझ गई कि आपस में पटी नहीं। मुझे तुम्हीं पर संदेह हुआ।
मैंने पूछा- ‘क्यों, मुझ पर तुम्हें क्यों संदेह हुआ?’
‘इसलिए कि मैं तुम्हें पहले देख चुकी थी।’
‘नहीं, मगर इसका कारण तुम्हारा संयम नहीं, परम्परा है। मैं इस समय स्पष्ट बातें कर रही हूँ इसके लिए क्षमा करना।’
‘तुम समझती हो कि मुझे विनोद से प्रेम वहीं है।’
‘नहीं, विनोद से तुम्हें जितना प्रेम है, उनसे अधिक अपने-आपसे है। कम- से-कम दस दिन पहले यही बात थी, अन्यथा यह नौबत ही क्यों आती? विनोद यहाँ से सीधे मेरे पास गये और दो-तीन दिन रहकर बम्बई चले गए। मैंने बहुत पूछा, पर कुछ बतलाया नहीं। वहाँ उन्होंने एक दिन विष खा लिया।’ मेरे चेहरे का रंग उड़ गया।
‘बम्बई पहुँचते ही उन्होंने मेरे पास एक खत लिखा था। उसमें यहाँ की सारी बातें लिखी थी और अन्त में लिखा था-मैं इस जीवन से तंग आ गया हूँ मेरे लिए मौत के सिवा और कोई उपाय नहीं है।’
मैंने एक ठंडी साँस ली।
‘मैं यह पत्र पाकर घबरा गई और उसी वक्त बम्बई रवाना हो गई। जब वहाँ पहुंची, तो विनोद को मरणासन्न पाया। जीवन की कोई आशा नहीं थी। मेरे एक संबंधी वहां डॉक्टरी करते हैं। उन्हें लाकर दिखाया तो वह बोले- उन्होंने जहर खा लिया है। तुरंत दवा दी गई। तीन दिन तक डॉक्टर साहब ने दिन-को-दिन और रात को रात न समझा, और मैं तो एक क्षण के लिए विनोद के पास से न हटी। तीसरे दिन इनकी आंखें खुलीं। पहला तार मिला था, पर उसका जवाब देने की किसे फुरसत थी। तीन दिन और बंबई मैं रहना पड़ा। विनोद इतने कमजोर हो गए थे कि इतना लंबा सफर करना उनके लिए असम्भव था। चौथे दिन जब मैंने उनसे यहाँ आने का प्रस्ताव किया, तो बोले- मैं अब वहाँ न जाऊंगा। मैंने बहुत समझाया, तब इस शर्त पर राजी हुए कि पहले आकर यहाँ की परिस्थिति देख जाऊँ।’
मेरे से निकला -’हाय! ईश्वर, मैं ऐसी अभागिनी हूँ।’
अभागिनी नहीं हो बहन, तुमने विनोद को केवल समझा न था। वह तो चाहते थे कि मैं अकेली आऊँ, पर मैंने उन्हें इस, दशा में वहाँ छोड़ना उचित न समझा। परसों हम दोनों वहाँ से चले! यहाँ पहुंचकर विनोद तो वेटिंग रूम में ठहर गए, मैं पता करती हुई भुवन के पास पहुँची। भुवन को मैंने इतना फटकारा कि वह रो पड़ा। उसने मुझसे यहाँ तक कह डाला। ‘तुमने उसे बुरी तरह दुत्कार दिया है। आंखों का बुरा आदमी है, पर दिल का बुरा नहीं। उधर से जब मुझे संतोष हो गया, और रास्ते में तुमसे भेंट हो जाने पर रहा-सहा भ्रम भी दूर हो गया, तो में विनोद को तुम्हारे पास लायी। अब तुम्हारी वस्तु तुम्हें सौंपती हूं। आशा है, इस दुर्घटना ने तुम्हें इतना सचेत कर दिया होगा कि फिर ऐसी नौबत न आएगी। आत्मसमर्पण करना सीखो। भूल जाओ कि तुम सुंदरी हो, आनंदमय जीवन का यह मूल मंत्र है। मैं डींग नहीं मारती, लेकिन चाहूँ तो आज विनोद को तुमसे छीन सकती हूँ। लेकिन रूप में मैं तुम्हारे तलवों के बराबर भी नहीं। रूप के साथ अगर तुम सेवा-भाव धारण कर सको तो तुम अजेय हो जाओगी।’
मैं कुसुम के पैरों पर गिर पड़ी और रोती हुई बोली- ‘बहन, तुमने मेरे साथ जो उपकार किया है, उसके-लिए मरते दम तक तुम्हारी ऋणी रहूँगी! तुमने सहायता न की होती तो आज न-जाने मेरी क्या गति होती।’
बहन कुसुम चली जाएगी। मुझे तो अब वह देवी-सी दीखती है। जी चाहता है, चरण धो-धोकर पीऊँ। उसके हाथों मुझे विनोद ही नहीं मिले हैं, सेवा का सच्चा आदर्श और स्त्री का सही कर्तव्य-ज्ञान भी मिला है। आज से मेरे जीवन का नवयुग आरंभ होता है, जिसमें भोग और विलास की नहीं, सहृदयता और आत्मीयता की प्रधानता होगी।
तुम्हारी,
पद्मा
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