do saakhiyaan by Munshi Premchand
do saakhiyaan by Munshi Premchand

9

देहली,

1-2-26

प्यारी बहन,

तुम्हारे प्रथम मिलन की कुतूहलमय कथा पढ़कर चित्त प्रसन्न हो गया। मुझे तुम्हारे ऊपर हसद हो रहा है। मैंने समझा था, तुम्हें मुझ पर हसद होगा, पर क्रिया उलटी हो गई। तुम्हारे चारों ओर हरियाली ही हरियाली नजर आती है, मैं जिधर नजर डालती हूं सूखे रेत और नग्न टीलों के सिवा और कुछ नहीं। खैर, अब कुछ मेरा भी वृत्तांत सुनो-

अब जिगर थाम कर बैठो, मेरी बारी आयी।’

विनोद की अविचलित दार्शनिकता अब असह्य हो गई है। कुछ विचित्र जीव हैं। घर में आग लगे, पत्थर पड़े, इनकी बला से! इन्हें मुझ पर जरा भी दया नहीं आती। मैं सुबह से शाम तक घर के झंझट में कुढ़े करूँ, इन्हें कुछ परवाह नहीं। ऐसा सहानुभूति से खाली आदमी कभी नहीं देखा था। इन्हें तो किसी जंगल में तपस्या करनी चाहिए थी। अभी तो खैर दो ही प्राणी हैं, लेकिन कहीं बाल-बच्चे हो गए तब तो मैं बेमौत मर जाऊंगी। ईश्वर न करे, यह दारुण विपत्ति मेरे सिर पड़े।

चंदा, मुझे अब दिल से लगी हुई है कि किसी भांति इनकी यह समाधि भंग कर दूँ। मगर कोई उपाय सफल नहीं होता, कोई चाल ठीक नहीं पड़ती। एक दिन मैंने उनके कमरे के लैंप का बल्ब तोड़ दिया। कमरा अँधेरा पड़ा रहा। आप सैर करके आये, तो कमरा में अंधेरा देखा। मुझसे पूछा, मैंने कह दिया, बल्ब टूट गया। बस, आपने भोजन किया और मेरे कमरे में आकर लेट गये। पत्रों और उपन्यासों की ओर देखा तक नहीं, न-जाने वह उत्सुकता कहां विलीन हो गयी। दिन भर गुजर गया, आपको बल्ब लगाने की कोई फिक्र नहीं। आखिर मुझी को बाजार से लाना पड़ा।

एक दिन मैंने झुंझलाकर रसोइये को निकाल दिया। सोचा, जब लाला रात भर भूखे सोएंगे तब आंखें खुलेंगी। मगर इस भले आदमी थे कुछ पूछा तक नहीं। चाय न मिली, कुछ परवाह नहीं। ठीक दस बजे अपने कपड़े पहने, एक बार रसोई की ओर जाकर देखा, सन्नाटा था। बस, कॉलेज चल दिए। एक आदमी पूछता है, महाराज कहां गया, क्यों गया, अब क्या इन्तजाम होगा, कौन खाना पकायेगा? कम-से-कम इतना तो मुझसे कह सकते थे कि तुम अगर नहीं पका सकती, तो बाजार से कुछ खाना मँगवा लो।

जब वह चले गए, तो मुझे बड़ा पश्चात्ताप हुआ। रॉयल होटल से खाना मँगवाया और बैरे के हाथ कॉलेज भेज दिया। पर खुद भूखी ही रही। दिन भर भूख के मारे बुरा हाल था। सिर में दर्द होने लगा। आप कॉलेज से आये और मुझे पड़े देखा तो ऐसा परेशान हुए, मानो मुझे त्रिदोष है। उसी वक्त एक डॉक्टर बुला भेजा। डॉक्टर आये, आंखें देखी, जबान देखी, हरारत देखी, लगाने की दवा अलग दी, पीने की अलग। आदमी दवा लेने गया। लौटा तो 12 रुपये का बिल भी था। मुझे इन सारी बातों पर ऐसा क्रोध आ रहा था कि कहीं भागकर चली जाऊँ। उस पर आप आराम कुर्सी डालकर मेरी चारपाई के पास बैठ गए और एक-एक पल पर पूछने लगे, कैसा जी है। दर्द कुछ कम हुआ? यहाँ मारे भूख के आंतें कुलबुला रही थीं। दवा हाथ से छुई तक नहीं। आखिर झख मारकर मैंने फिर बैरे से खाना मँगवाया। फिर चाल उलटी पड़ी। मैं डरी कि कहीं सबेरे महाशय डॉक्टर को न बुला बैठें, इसलिए सबेरा होते ही हारकर फिर घर के काम-धंधे में लगी। उसी वक्त एक दूसरा महाराज बुलवाया। अपने पुराने महाराज को बेकसूर निकालकर दंड स्वरूप एक काठ के उल्लू को रखना पड़ा, जो मामूली चपातियाँ भी नहीं पका सकता था। उस दिन से एक बला गले पड़ी। दोनों वक्त दो घंटे इस महाराज को सिखाने में लग जाते हैं। इसे अपनी पाक-कला का ऐसा घमंड है कि मैं चाहे जितना बकूं, पर करता अपने मन की है। उस पर बीच-बीच में मुस्कराने लगता है, मानो कहता हो कि ‘तुम इन बातों को क्या जानो, चुपचाप बैठी देखती जाओ।’ जलाने चली थी विनोद को, और खुद जल गई। रुपये खर्च हुए, वह तो हुए ही, एक और जंजाल में फंस गई। मैं खूब जानती हूँ कि विनोद का डॉक्टर को बुलाना या मेरे पास बैठे रहना केवल दिखावा था। उनके चेहरे पर जरा भी घबराहट न थी, चित्त जरा भी अशांत न था।

चंदा, मुझे क्षमा करना। मैं नहीं जानती कि ऐसे पुरुष के पाले पड़कर तुम्हारी क्या दशा होती, पर मेरे लिए इस दशा में रहना असह्य है। मैं आगे जो वृत्तांत कहने वाली हूं उसे सुनकर तुम नाक-भौं सिकोड़ोगी, मुझे कोसोगी, कलंकिनी कहोगी, पर जो चाहे कहो, परवाह नहीं। आज चार दिन होते हैं, मैंने त्रिया-चरित्र का एक नया अभिनय किया। हम दोनों सिनेमा देखने गये थे। वहाँ मेरी बगल में एक बंगाली बाबू बैठे हुए थे। विनोद सिनेमा में इस तरह बैठते हैं, मानो ध्यानावस्था में हों। न बोलना, न चालना। फिल्म इतनी सुंदर थी, एक्टिंग इतनी सजीव कि मेरे मुँह से बार-बार प्रशंसा के शब्द निकल जाते थे, बंगाली बाबू को भी बड़ा आनंद आ रहा था। हम दोनों उस फिल्म पर आलोचनाएँ करने लगे। वह फिल्म के भावों की इतनी रोचक व्याख्या करता था कि मन मुग्ध हो जाता था। फिल्म से ज्यादा मजा मुझे उसकी बातों में आ रहा था। बहन सच कहती हूँ , शक्ल-सूरत में वह विनोद के तलवों की बराबरी भी नहीं कर सकता, पर केवल विनोद को जलाने के लिए मैं-उससे मुस्करा-मुस्करा कर बातें करने लगी। उसने समझा, कोई शिकार फंस गया। अवकाश के समय वह बाहर जाने लगा, तो मैं भी उठ खड़ी हुई, पर विनोद -अपनी जगह पर ही बैठे रहे।

मैंने कहा-बाहर चलते हो, मेरी तो बैठे-बैठे कमर दुख गई।

विनोद बोले- हाँ-हाँ चलो, इधर-उधर टहल आएँ ।

मैंने लापरवाही से करा- तुम्हारा जी न चाहे तो मत चलो, मैं मजबूर नहीं करती।

विनोद फिर अपनी जगह पर बैठते हुए बोले-अच्छी बात है।

मैं बाहर आयी तो बंगाली बाबू ने पूछा- क्या आप यहीं की रहने वाली हैं? ‘मेरे पति यहाँ यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हैं।’

‘अच्छा! वह आपके पति थे। अजीब आदमी हैं।’

‘आपको तो मैंने शायद यहाँ पहले ही देखा है।’

‘हाँ मेरा मकान तो बंगाल में हैं। कंचनपुर के महाराजा साहब का प्राइवेट सेक्रेट्री हूँ। महाराजा साहब वायसराय से मिलने आये हैं।’

तो अभी दो-चार दिन रहिएगा?

‘जी हां, आशा करता हूँ। रहूँ तो साल भर रह जाऊँ। जाऊं तो दूसरी गाड़ी से चला जाऊँ। हमारे महाराजा साहब का कुछ ठीक नहीं। यों बड़े सज्जन और मिलनसार हैं। आपसे मिलकर बहुत खुश होंगे।’

यह बातें करते-करते हम रेस्त्रा में पहुँच गए। बाबू ने चाय और टोस्ट लिया। मैंने सिर्फ चाय ली।

‘तो इसी वक्त आपका महाराजा साहब से परिचय करा दूँ। आपको आश्चर्य होगा कि मुकुटधारियों में भी इतनी नम्रता और विजय हो सकती है। उनकी बातें सुनकर आप मुग्ध हो जाएँगी।’

मैंने आईने में अपनी सूरत देखकर कहा- जी नहीं, फिर किसी दिन पर रखिए। आपसे तो अकसर मुलाकात होती रहेगी। क्या आपकी स्त्री आपके साथ नहीं आयी?

युवक ने मुस्कुराकर कहा- मैं अभी कुंवारा हूँ और शायद कुंवारा ही रहूँ। मैंने उत्सुक होकर पूछा- अच्छा! तो आप भी स्त्रियों से भागने वाले जीवों में हैं। इतनी, बातें हो गई और आपका नाम तक न पूछा। बाबू ने अपना नाम भुवन मोहन दास गुप्त बताया। मैंने अपना परिचय दिया।

‘जी वहीं, मैं उन अभागों में हूँ जो एक बार निराश होकर फिर उसकी परीक्षा नहीं करते। रूप की तो संसार में कमी नहीं, मगर रूप और गुण का मेल बहुत कम देखने में आता है। जिस रमणी से मेरा प्रेम था, वह आज एक बड़े वकील की पत्नी है। मैं गरीब था। इसकी सजा मुझे ऐसी मिली कि जीवन-पर्यंत न भूलेगी। साल भर तक जिसकी उपासना की, जब उसने मुझे धन पर बलिदान कर दिया, तो अब और क्या आशा रखूँ?’

मैंने हँसकर कहा- आपने बहुत जल्दी हिम्मत हार दी!

भुवन ने सामने द्वार की ओर ताकते हुए कहा- मैंने आज तक ऐसा वीर ही नहीं देखा, जो रमणियों से परास्त न हुआ हो। वे हृदय पर चोट करती हैं और हृदय एक ही गहरी चोट सह सकता है। जिस रमणी ने मेरे प्रेम को तुच्छ समझकर पैरों से कुचल दिया, उसको मैं दिखाना चाहता हूँ कि मेरी आंखों में धन कितनी तुच्छ वस्तु है। यही मेरे जीवन का एकमात्र उद्देश्य है। मेरा जीवन उसी दिन सफल होगा, जब विमला के घर के सामने मेरा विशाल भवन होगा और उसका पति मुझसे मिलने में अपना सौभाग्य समझेगा।

मैंने गम्भीरता से कहा- यह तो कोई ऊंचा लक्ष्य नहीं है। आप यह क्यों समझते हैं कि विमला ने केवल धन के लिये आपका परित्याग किया। सम्भव है, इसके और भी कारण हों। माता-पिता ने उसी पर दबाव डाला हो, या अपने ही में उसे कोई ऐसी त्रुटि दिखाई दी हो, जिससे आपका जीवन दुखमय हो जाता। आप यह क्यों समझते हैं कि जिस प्रेम से वंचित होकर आप उतने दुःखी हुए, उसी प्रेम से वंचित होकर वह सुखी हुई होगी। सम्भव था, कोई धनी स्त्री पाकर आप भी पिघल जाते।

भुवन ने जोर देकर कहा- यह असम्भव है, सर्वथा असम्भव है। मैं उसके लिए त्रिलोक का राज्य भी त्याग देता।

मैंने हंसकर कहा- हाँ इस वक्त आप ऐसा कह सकते हैं, मगर ऐसी परीक्षा में पढ़कर आपकी क्या दशा होती, इसे आप निश्चयपूर्वक नहीं बता सकते। सिपाही की बहादुरी का प्रमाण उसकी तलवार है, उसकी जबान नहीं। इसे आप अपना सौभाग्य समझिए कि आपको उस परीक्षा में नहीं पड़ना पड़ा। वह प्रेम-प्रेम नहीं है, जो प्रत्याघात की शरण ले, प्रेम का आदि भी सहृदयता है और अंत भी सहृदयता। सम्भव है, आपको अब भी कोई ऐसी बात मालूम हो जाए, जो विमला की तरफ से आपको नरम कर दे।

भुवन गहरे विचार में डूब गए। एक मिनट के बाद उन्होंने सिर उठाया और बोले- मिसेज विनोद, आपने आज एक ऐसी बात सुझा दी, जो आज तक मेरे ध्यान में आयी ही न थी। यह भाव कभी मेरे मन में उदय ही नहीं हुआ था। मैं इतना अनुदार क्यों हो गया, समझ में नहीं आता। मुझे आज मालूम हुआ कि प्रेम के ऊंचे आदर्श का पालन रमणियां ही कर सकती हैं। पुरुष कभी प्रेम के लिए आत्मसमर्पण नहीं कर सकता- वह प्रेम को स्वार्थ और वासना से पृथक् नहीं कर सकता। अब मेरा जीवन सुखमय हो जाएगा। आपने मुझे आज जो शिक्षा दी है, उसके लिए आपको धन्यवाद देता हूं।

यह कहते-कहते भुवन सहसा चौंक पड़े और बोले- ओह! मैं कितना बड़ा मूर्ख हूं-सारा रहस्य समझ में आ गया, अब कोई बात छिपी नहीं है। ओह, मैंने विमला के साथ घोर अन्याय किया! महान अन्याय। मैं बिलकुल अंधा हो गया था। विमला, मुझे क्षमा करो।

भुवन इसी तरह देर तक विलाप करते रहे। बार-बार धन्यवाद देते थे और अपनी मूर्खता पर पछताते थे। हमें इसकी सुध ही न रही कब घंटी बजी, कब खेल शुरू हुआ। एकाएक विनोद कमरे में आये। मैं चौंक पड़ी। मैंने उनके मुख की ओर देखा, किसी भाव का पता न था। बोले- तुम अभी यहीं हो पद्मा। खेल शुरू हुए तो देर हुई। मैं चारों तरफ खोज रहा था।

मैं हकबकाकर उठ खड़ी हुई और बोली–खेल शुरू हो गया? घंटी की आवाज तो सुनाई ही नहीं दी। भुवन भी उठे। हम फिर आकर तमाशा देखने लगे। विनोद ने मुझे अगर इस वक्त दो-चार लगने वाली बातें कह दी होतीं, उनकी आंखों में क्रोध की झलक दिखाई देती, तो मेरा अशांत हृदय सँभल जाता, मेरे मन को ढाढस होता, पर उनके अविचलित विश्वास ने मुझे और भी अशांत कर दिया। बहन, मैं चाहती हूं वह मुझ पर शासन करें। मैं उनकी कठोरता, उनकी उद्दंडता, उनकी बलिष्ठता का रूप देखना चाहती हूँ। उनके प्रेम, प्रमोद, विश्वास का रूप देख चुकी। इससे मेरी आत्मा को तृप्ति नहीं होती! तुम उस पिता को क्या कहोगी, जो अपने पुत्र को अच्छा खिलाए, अच्छा पहनाएं, पर उनकी शिक्षा-दीक्षा की कुछ भी चिंता न करे, वह जिस राह जाए, उस राह जाने दे, जो कुछ करे, वह करने दे। कभी उसे कड़ी आँख से देखे भी नहीं। ऐसा लड़का अवश्य ही आवारा हो जायेगा। मेरा भी यही हाल हुआ जाता है। यह उदासीनता मेरे लिए असह्य है। उस भले आदमी ने यहाँ तक न पूछा कि भुवन कौन थे। भुवन ने यही तो समझा होगा कि इसका पति इसकी बिलकुल परवाह नहीं करता। विनोद खुद स्वाधीन रहना चाहते हैं, मुझे भी स्वाधीन छोड़ देना चाहते हैं। वह मेरे किसी काम में हस्तक्षेप नहीं करना चाहते । इसी तरह चाहते हैं कि मैं भी उनके किसी काम में हस्तक्षेप न करूँ।

मैं इस स्वाधीनता को दोनों ही के लिए विष-तुल्य समझती हूँ। संसार में स्वाधीनता का चाहे जो भी मूल्य हो, घर में तो पराधीनता ही फूलती-फलती है। मैं जिस तरह अपने एक जेवर को अपना समझती हूँ उसी तरह विनोद को भी अपना समझना चाहती हूँ। अगर मुझसे पूछे बिना विनोद उसे किसी को दे दे, तो मैं लड़ पडूंगी। मैं चाहती हूं उसी तरह उन पर मेरा अधिकार हो। अपने ऊपर भी उनका ऐसा ही अधिकार चाहती हूँ। उन्हें मेरी एक-एक बात पर ध्यान देना चाहिए। मैं किससे मिलती हूँ कहां जाती हूँ किस तरह जीवन व्यतीत करती हूँ इन सारी बातों पर उनकी तीव्र दृष्टि रहनी चाहिए। जब वह मेरी परवाह नहीं करते, तो मैं उनकी परवाह क्यों करूं। इस खींचातानी में हम एक दूसरे से अलग होते चले जा रहे हैं। और क्या कहूं, मुझे कुछ नहीं मालूम कि वह किन मित्रों को रोज पत्र लिखते हैं। उन्होंने भी मुझसे कभी कुछ नहीं कहा। खैर, मैं क्या लिख रही थी, क्या कहने लगी। विनोद ने मुझसे कुछ नहीं पूछा। मैं फिर भुवन से फिल्म के संबंध में बातें करने लगी।

जब खेल खत्म हो गया और हम लोग बाहर आये और ताँगा ठीक करने लगे तो भुवन ने कहा-’मैं अपनी कार में आपको पहुँचा दूँगा।’

हमने कोई आपत्ति नहीं की। हमारे मकान का पता पूछकर भुवन ने कार चला दी। रास्ते में मैंने भुवन से कहा-’कल मेरे यहाँ दोपहर का खाना खाइएगा।’ भुवन ने स्वीकार कर लिया।

भुवन तो हमें पहुँचा कर चले गए, पर मेरा मन बड़ी देर तक उन्हीं की तरफ लगा रहा। इन दो-तीन घंटों में भुवन को जितना समझी, उतना विनोद को आज तक नहीं समझी। मैंने भी अपने मन की जितनी बातें उससे कह दीं, उतनी विनोद से आज तक नहीं कहीं। भुवन उन मनुष्यों में है, जो किसी पर-पुरुष को मेरी ओर कुदृष्टि डालते देखकर उसे मार डालेगा। उसी तरह मुझे किसी पुरुष से हँसते देखकर मेरा खून पी लेगा और जरूरत पड़ेगी, तो मेरे लिए आग में कूद भी पड़ेगा। ऐसा ही पुरुष-चरित्र मेरे हृदय पर विजय पा सकता है। मेरे ही हृदय पर नहीं, नारी-जाति (मेरे विचार में) ऐसे ही पुरुष पर जान देती है। वह निर्बल है, इसलिए बलवान् का आश्रय ढूंढ़ती है।

बहन, तुम ऊब गयी होगी, खत बहुत लम्बा हो गया, मगर इस कांड को समाप्त किए बिना नहीं रहा जाता। मैंने सबेरे ही से भुवन की दावत की तैयारी शुरू कर दी। रसोइया काठ का उल्लू है, मैंने सारा काम अपने हाथ से किया। भोजन बनाने में ऐसा आनन्द मुझे कभी न मिला था।

भुवन बाबू की कार ठीक समय पर आ पहुँची। भुवन उतरे और सीधे मेरे कमरे में आये। दो-चार बातें हुईं। डिनर टेबल पर जा बैठे । विनोद भी, भोजन, करने आये। मैंने उन दोनों का परिचय करा दिया। मुझे ऐसा मालूम हुआ कि विनोद ने भुवन की ओर से कुछ उदासीनता दिखायी। इन्हें राजाओं-रईसों से चिढ़ है, साम्यवादी हैं। जब राजाओं से चिढ़ है तो उनके पिट्ठुओं से क्यों न होती? वह समझते हैं, इन रईसों के दरबार में खुशामदी, निकम्मे, सिद्धांतहीन एवं चरित्रहीन लोगों का जमघट रहता है। जिनका इनके सिवाय और काम नहीं कि अपने रईस की हर एक उचित-अनुचित इच्छा पूरी करें और प्रजा का गला काटकर अपना घर भरें! भोजन के समय बातचीत की धारा घूमते-घामते विवाह और प्रेम-जैसे महत्त्व के विषय पर आ पहुंची।

विनोद ने कहा- नहीं, मैं वर्तमान वैवाहिक प्रथा को पसंद नहीं करता। इस प्रथा का आविष्कार उस समय हुआ था, जब मनुष्य सभ्यता की प्रारंभिक दशा में था। तब से दुनिया बहुत आगे बड़ी है! मगर विवाह-प्रथा में जौ-भर भी अन्तर नहीं पड़ा। यह प्रथा वर्तमान काल के लिए उपयोगी नहीं है।