do saakhiyaan by Munshi Premchand
do saakhiyaan by Munshi Premchand

इन्हें राजाओं-रईसों से चिढ़ है, साम्यवादी हैं। जब राजाओं से चिढ़ है तो उनके पिट्ठूओं से क्यों न होती? वह समझते हैं, इन रईसों के दरबार में खुशामदी, निकम्मे, सिद्धांतहीन एवं चरित्रहीन लोगों का जमघट रहता है। जिनका इनके सिवाय और काम नहीं कि अपने रईस की हर एक उचित-अनुचित इच्छा पूरी करें और प्रजा का गला काटकर अपना घर भरें! भोजन के समय बातचीत की धारा घूमते-घामते विवाह और प्रेम-जैसे महत्त्व के विषय पर आ पहुंची।

विनोद ने कहा- नहीं, मैं वर्तमान वैवाहिक प्रथा को पसंद नहीं करता। इस प्रथा का आविष्कार उस समय हुआ था, जब मनुष्य सभ्यता की प्रारंभिक दशा में था। तब से दुनिया बहुत आगे बड़ी है! मगर विवाह-प्रथा में जौ-भर भी अन्तर नहीं पड़ा। यह प्रथा वर्तमान काल के लिए उपयोगी नहीं है।

भुवन ने कहा- आखिर आपको इसमें क्या दोष दिखाई देते हैं?

विनोद ने विचार कर कहा- इसमें सबसे बड़ा ऐब यह है कि यह एक सामाजिक प्रश्न को धार्मिक रूप दे देती है।

‘और दूसरा?’

‘दूसरा यह कि यह व्यक्तियों की स्वाधीनता में बाधक है। यह स्त्री-व्रत और पतिव्रता का स्वाँग रचकर हमारी आत्मा को संकुचित कर देता है। हमारी बुद्धि के विकास में जितनी रुकावट इस प्रथा ने डाली है, उतनी और किसी भौतिक या दैनिक क्रांति से नहीं हुई है। इसने मिथ्या आदर्शों को हमारे सामने रख दिया और आज तक हम उन्हीं पुरानी, सड़ी हुई, लज्जाजनक, पाशविक लकीरों को पीटते जाते हैं। व्रत केवल एक निरर्थक बंधन का नाम है। इतना महत्त्वपूर्ण नाम देकर हमने उस कैद को धार्मिक रूप दे दिया है। पुरुष क्यों चाहता है कि स्त्री उसको अपना ईश्वर, अपना सर्वस्व समझे? केवल इसलिए कि वह उसका भरण-पोषण करता है? क्या स्त्री का कर्तव्य केवल पुरुष की संपत्ति के लिए वारिस पैदा करना है? उस सम्पत्ति के लिए जिस पर, हिंदू नीतिशास्त्र के अनुसार, पति के देहांत के बाद उसका कोई अधिकार नहीं रहता। समाज की वह सारी व्यवस्था, सारा संगठन सम्पत्ति-रक्षा के आधार पर हुआ है। इसने सम्पत्ति को प्रधान और व्यक्ति को गौण कर दिया है। हमारे ही वीर्य से उत्पन्न-संतान हमारी कमाई हुई जायदाद का भोग करे, इस मनोभाव में कितनी स्वार्थांधता, कितना दासत्व छिपा हुआ है, इसका कोई अनुमान नहीं कर सकता। इस कैद में जकड़ी हुई समाज की संतान यदि आज घर में, देश में, संसार में, अपने क्रूर स्वार्थ के लिए रक्त की नदियाँ बहा रही है तो क्या आश्चर्य। मैं इस वैवाहिक प्रथा को सारी बुराइयों का मूल समझता हूँ।’

भुवन चकित हो गया। मैं खुद चकित हो गई। विनोद ने इस विषय पर मुझसे कभी इतनी स्पष्टता से बातचीत न की थी। मैं यह तो जानती थी, वह साम्यवादी है, दो-एक बार इस विषय पर उनसे बहस भी कर चुकी हूँ पर वैवाहिक प्रथा के ये इतने विरोधी हैं, यह मुझे न मालूम था। भुवन के चेहरे से ऐसा प्रकट होता था कि उन्होंने ऐसे दार्शनिक विचारों की गंध तक नहीं पायी। जरा देर के वाद बोले-प्रोफेसर साहब, आपने तो मुझे एक बड़े चक्कर में डाल दिया। आखिर आप इस प्रथा की जगह कोई और प्रथा रखना चाहते हैं या विवाह की आवश्यकता ही नहीं समझते? जिस तरह पशु-पक्षी आपस में मिलते हैं, वही हमें भी करना चाहिए?

विनोद ने तुरंत उत्तर दिया-बहुत कुछ। पशु-पक्षियों में सभी का मानसिक विकास एक-सा नहीं है। कुछ ऐसे हैं, जो जोड़े के चुनाव में कोई विचार नहीं रखते। कुछ ऐसे हैं, जो एक बार बच्चे पैदा करने के बाद अलग हो जाते हैं, और कुछ ऐसे हैं, जो जीवनपर्यन्त एक साथ रहते हैं। कितनी ही भिन्न-भिन्न श्रेणियाँ हैं। मैं मनुष्य होने के नाते! उसी श्रेणी को श्रेष्ठ समझता हूँ जो जीवन-पर्यन्त एक साथ रहते हैं, मगर स्वेच्छा से। उनके यहाँ कोई कैद नहीं, कोई सजा नहीं। दोनों अपने-अपने चारे-दाने की फिक्र करते हैं। दोनों मिलकर रहने का स्थान बनाते हैं, दोनों साथ बच्चों का पालन करते हैं। उनके बीच में कोई तीसरा नर या मादा आ ही नहीं सकता, यहाँ तक कि उनमें से जब एक मर जाता है, तो दूसरा मरते दम तक फुट्टैल रहता है। यह अंधेर मनुष्य-जाति ही में है कि स्त्री ने किसी दूसरे पुरुष से हंसकर बात की और उसके पुरुष की छाती पर साँप लोटने लगा, खून- खराबे के मनसूबे सोचे जाने लगे। पुरूष ने किसी स्त्री की ओर रसिक नेत्रों से देखा और अर्धांगिनी ने त्यौरियां बदली, पति के प्राण लेने को तैयार हो गई। यह सब क्या है? ऐसा मनुष्य-समाज सभ्यता का किस मुँह से दावा कर सकता

भुवन ने सिर हिलाते हुए कहा मगर मनुष्यों में भी तो भिन्न-भिन्न श्रेणियाँ हैं। कुछ लोग हर महीने एक नया जोड़ा खोज निकालेंगे।

विनोद ने हँसकर कहा- लेकिन यह इतना आसान काम न होगा। या तो वह ऐसी स्त्री चाहेगा, जो संतान का पालन स्वयं कर सकती हो, या उसे एकमुश्त सारी रकम अदा करनी पड़ेगी।

भुवन भी हँसे- आप अपने को किस श्रेणी में रखेंगे?

विनोद इस प्रश्न के लिए तैयार न थे। था भी बेढंगा-सा सवाल। झेंपते हुए बोले-परिस्थितियाँ जिस श्रेणी में ले जाएँ। मैं स्त्री और पुरुष, दोनों के लिए पूर्ण स्वाधीनता का हामी हूँ। कोई कारण नहीं है कि मेरा मन किसी नवयौवना की ओर आकर्षित हो और वह भी मुझे चाहे, तो भी मैं समाज और नीति के भय से उसकी ओर ताक न सकूँ। मैं इसे पाप नहीं समझता।

भुवन अभी कुछ उत्तर न देने पाए थे कि विनोद उठ खड़े हुए। कॉलेज के लिए देर हो रही थी। तुरंत कपड़े पहने और चल दिए। हम दोनों दीवानखाने में आकर बैठे और बातें करने लगे।

भुवन ने सिगार जलाते हुए कहा- कुछ सुना, कहां जाकर ताज टूटी? मैंने मारे शर्म के सिर झुका लिया। क्या जवाब देती? विनोद की अंतिम बात ने मेरे हृदय पर कठोर आघात किया था। मुझे ऐसा मालूम हो रहा था कि विनोद ने केवल मुझे सुनाने के लिए विवाह का यह नया खंडन तैयार किया है। वह मुझसे पिंड छुड़ा लेना चाहते हैं। वह किसी रमणी की ताक में हैं, मुझसे उनका जी भर गया। यह खयाल करके मुझे बड़ा दुःख हुआ। मेरी आंखों से आंसू बहने लगे। कदाचित् एकांत में मैं न रोती, पर भुवन के सामने मैं संयत न रह सकी। भुवन ने मुझे बहुत सांत्वना दी- आप व्यर्थ इतना शोक करती हैं। मिस्टर विनोद आपका मान न करें, पर संसार में कम- से-कम एक ऐसा व्यक्ति है, जो आपके संकेत पर अपने प्राण तक न्यौछावर कर सकता है। आप-जैसी रमणी रत्न पाकर संसार में ऐसा कौन पुरूष है, जो अपने भाग्य को धन्य न मानेगा? आप इसकी बिलकुल चिंता न करें।

मुझे भुवन की यह बात बुरी मालूम हुई। क्रोध से मेरा मुख लाल हो गया। यह धूर्त मेरी इस दुर्बलता से लाभ उठाकर मेरा सर्वनाश करना चाहता है। अपने दुर्भाग्य पर बराबर रोना आता था। अभी विवाह हुए, साल भी नहीं पूरा हुआ और मेरी यह दशा हो गई कि दूसरों को मुझे बहकाने और मुझ पर अपना जादू चलाने का साहस हो रहा है। जिस वक्त मैंने विनोद को देखा था, मेरा हृदय कितना फूल उठा था। मैंने अपने हृदय को कितनी भक्ति से उनके चरणों पर अर्पण किया था। मगर क्या जानती थी कि इतनी जल्द मैं उनकी आंखों से गिर जाऊंगी, और मुझे परित्यक्ता समझकर शोहदे मुझ पर डोरे डालेंगे।

मैंने आंसू, पोंछते हुए कहा- मैं आपसे क्षमा माँगती हूँ मुझे जरा विश्राम लेने दीजिए।

हाँ-हाँ, आप आराम करें, मैं बैठा देखता रहूँगा।

जी नहीं, अब आप कृपा करके जाइए। यों मुझे आराम न मिलेगा।’ अच्छी बात है, आप आराम कीजिए। मैं संध्या-समय आकर देख जाऊंगा।

जी नहीं, आपको कष्ट करने की कोई जरूरत नहीं है।

अच्छा, तो मैं कल आऊंगा। शायद महाराजा साहब भी आएँ।

नहीं, आप लोग मेरे बुलाने का इंतजार कीजिएगा। बिना बुलाए न आइए। यह कहती हुई मैं उठकर अपने सोने के कमरे की ओर चली। भुवन एक क्षण मेरी ओर देखता रहा फिर चुपके से चला गया।

बहन, एक दो दिन हो गए हैं। पर मैं कमरे से बाहर नहीं निकली। भुवन दो-तीन बार आ चुका है, मगर मैंने उससे मिलने से साफ इनकार कर दिया। अब शायद उसे फिर आने का साहस न होगा। ईश्वर ने बड़े नाजुक मौके पर मुझे सुबुद्धि प्रदान की, नहीं तो मैं अब तक अपना सर्वनाश कर चुकी होती। विनोद प्रायः मेरे ही पास बैठे रहते हैं। लेकिन उनसे बोलने को मेरा जी नहीं चाहता। जो पुरुष व्यभिचार का दार्शनिक सिद्धांतों से समर्थन कर सकता है, जिसकी आँखों में विवाह-जैसे पवित्र बंधन का कोई महत्त्व नहीं, जो न मेरा हो सकता है, न मुझे अपना बना सकता है, उसके साथ मुझ-जैसी मानिनी गर्विणी स्त्री का कितने दिन निर्वाह होगा!

बस, अब बिदा होती हूँ। बहन, क्षमा करना। मैंने तुम्हारा बहुत-सा अमूल्य समय ले लिया। मगर इतना समझ लो कि मैं तुम्हारी दया नहीं, बल्कि सहानुभूति चाहती हूँ।

तुम्हारी,

पद्मा