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गृहलक्ष्मी कहानियां

रक्षा, जरा इधर आना तो मैंने बिस्तर में लेटे-लेटे ही आवाज लगाई। ‘जी, मामी कहती हुई रक्षिता पल भर में हाजिर हो गई। ‘ऐसा करो, मुझे थोड़ा पानी गर्म करके दे दो पेट सेकूंगी, लग रहा है गैस बन रही है, थोड़ा पेट में दर्द भी मैंने उसकी तरफ देखते हुए कहा, ‘जी, अभी लाती हूं कहते हुए वह मुडऩे को हुई। ‘और सुन, अपने व आन्या के लिए ब्रेड सेक ले, स्कूल के लिए देर हो रही होगी, मामा को बोल देना, आज ऑफिस में ही नाश्ता कर लेंगे, मैं नहीं बना पाऊंगी रक्षिता किचन की ओर चली गई, उसने अपने व आन्या के लिए ब्रेड सेकी तथा दस मिनट के अंदर किशोर के लिए दो परांठे भी सेक कर रख दिए। वह और आन्या स्कूल जाने लगी तो उसने मेरे कमरे में आकर कहा, मामी हम लोग नाश्ता करके जा रहे हैं, मामा के लिए परांठे भी बना दिया है, कहिएगा। अचार या सॉस के साथ खा लेंगे, बाय…मामी। कहती हुई वह भाग

गई। मैं गर्म बॉटल से पेट सेकने लगी तथा सोचने लगी, कितनी फुर्ती है इस लड़की के अंदर, अभी कुल पंद्रह की ही होगी, परंतु काम करने में होशियारी व समझदारी गजब की है। हालांकि मैं दिल से चाहती थी कि वह आज स्कूल न जाए घर में रुक कर काम करे, परंतु उसने इतनी फुर्ती से काम निबटा दिया कि मैं चाहकर भी कुछ कह न सकी। मैं दिल ही दिल में उससे नफरत करती हूं, मैं नहीं चाहती कि वह अच्छे नंबरों से पास हो एवं सबकी प्रशंसा की पात्र बने, इसीलिए मैंने उसका नाम भी एक साधारण से स्कूल में लिखवाया है जबकि उससे दो वर्ष छोटी मेरी बेटी शहर के नामी कान्वेंट में पढ़ रही है। मैं स्वयं ही नहीं समझ पा रही हूं कि ऐसा दुव्र्यवहार मैं उसके साथ क्यों करती हूं, जबकि वह हमेशा मेरे साथ अच्छा व मर्यादित व्यवहार करती है, मेरे द्वारा कही गई किसी बात का बुरा नहीं मानती, ना ही किसी काम को मना करती है, कभी-कभी मेरा मन मुझे धिक्कारता भी है कि बिन मां-बाप की इतनी छोटी बच्ची के साथ इतना कटु व्यवहार क्यों करती हूं। क्या करूं? मैं जैसे ही रक्षिता को देखती हूं मुझे उसकी मां मेरी एकमात्र बड़ी ननद सरोजा जीजी की याद आ जाती है।

जब मैं इस घर में ब्याह कर आई तो सरोजा जीजी ज्यादातर यहीं रहती थीं। उनका ससुराल इसी शहर में था। सास-ससुर थे नहीं, दो जेठ-जेठानियां थीं जिनसे लड़-झगड़कर वे चंद दिनों में ही वापस मायके आ जाती।यहां उन्हीं की हुकूमत चलती थी। किशोर उनसे छोटे, उनके प्यारे, दुलारे भाई थे किशोर भी पूरे जीजी भक्त, उनके खिलाफ एक भी शब्द नहीं सुन सकते थे। बाबू जी की मौत ने अम्माजी को दिल का मरीज बना दिया था, अक्सर बीमार ही रहती थी।

पूरे घर पर जीजी का एकछत्र साम्राज्य था। मेरे हर कार्य में त्रुटियां निकालना जैसे जीजी का जन्मसिद्ध अधिकार हो, भोजन बनाने से लेकर साफ सफाई, यहां तक कि मेरे पहनावे पर भी स्वतंत्रता नहीं थीं। कुछ न कुछ नुक्ताचीनी करके अपनी ही करवाती थी। मुझे हमेशा छोटे शहर की कहकर उपेक्षा किया करती। मैं अंदर ही अंदर घुटकर रह जाती। किशोर से कभी अपने मन की बात कहना चाहा तो उन्होंने बड़े ही ठंडे स्वर से कह दिया, ‘छोड़ो भी जीजी की बात, कौन सी तुम्हें चिपक गई है, भूल जाओ उसे। मैं चुप हो जाती, कैसे कहती उनसे कि उनकी व्यंग्य भरी बातें मुझे चिपकती तो नहीं पर सीधे मेरे अंतर्मन को वेध रही थी, जो निरंतर लहुलुहान होता जा रहा है।

जीजी अपनी ससुराल बहुत ही कम जाती थीं अक्सर धवल जीजा आ जाते थे। एक बार वह कुछ दिनों के लिए ससुराल गई थीं। मैं अम्माजी के पैरों की मालिश कर रही थी, तभी उन्होंने अपने मन की पर्तों को खोला था। उन्होंने मेरा हाथ पकड़कर कहा, ‘बहू मैं जानती हूं तू बहुत ही योग्य, संस्कारी व सुघड़ बहू है, कमी तो मेरी ही कोखजायी में है, तू उसकी बातों को मन पर मत लाया कर। कुछ देर चुप रहने के बाद वे फिर बोलीं, ‘पता नहीं बेटी को उसकी सुखी गृहस्थी में स्थापित होते देख भी पाऊंगी अथवा ऐसे ही अधूरी आस लिए दुनिया से चली जाऊंगी।

उनकी आंखें भर आई थीं। मैंने उन्हें तसल्ली दी ‘धैर्य रखिए मां जी, सब ठीक हो जाएगा। करीब चार वर्ष उसी माहौल में बीत गए, जीजी की ज्यादतियां बढ़ती गईं और मेरी उनके प्रति नफरत। अचानक धवल जीजा का स्थानांतरण पदोन्नति सहित बागेश्वर केंद्रीय विद्यालय में हो गया। जीजी अपने परिवार के साथ चली गईं। फिर जीजी का आना करीब पांच वर्ष बाद अम्मा की मौत पर ही हुआ। वैसे इस बीच किशोर दो बार उनसे मिलने गए थे, मुझसे भी कहा था पर मेरा मन ही नहीं हुआ। अम्मा की मौत पर जीजी काफी बदली हुई लग रही थीं। शायद मेरे सफलतापूर्वक गृह संचालन व अम्मा की मौत के उपरांत सारे कर्मकांडी को विधिवत संस्कारपूर्वक निपटाने, को लेकर वे प्रभावित हुई हों, मां की मौत से उपजा दर्द का दंश वे बड़ी शांति से झेल गई थीं। तेरहवीं के बाद जाते समय जब मैंने उनके पैर छुए तो उन्होंने मुंह से तो कुछ नहीं कहा बस मेरे सर पर हाथ रख दिया।

वक्त का पहिया चलता रहा। एक दिन अचानक जीजी व जीजा की दुर्घटना की सूचना मिली, उनकी कार बस से टकरा कर हजारों फीट गहरी खाई में गिर गई थी। काफी प्रयत्नों के बाद मृत शरीर मिला था। हम फौरन भागे। रक्षिता तो हमें देखते ही अपने मामा के अंक में ऐसे समाई जैसे किसी जंगली जानवर से भयभीत शावक अपनी मां की गोद में छिप जाए। धवल जीजा के दोनों भाई अनिल व अभय भी अपने परिवार सहित आ गए थे। वहां रिश्तेदार तो कोई था नहीं, जीजा के विद्यालय का परिवार व थोड़े जान-पहचान वाले लोग थे। दाह संस्कार के बाद तेरहवीं भी वहीं करने का विचार बना। अब वहां से फिर इलाहाबाद आकर कर्मकांड निपटाने के लिए सबके पास समय जो नहीं था। 

तेहरवीं के बाद रात में जब सब बैठे तो प्रश्न रक्षिता को पालने का उठा। सबसे बड़े अनिल जीजा ने कहा, ‘भई मेरे पास तो अपने ही चार हैं, आमदनी भी सीमित ही है, ऐसे में अतिरिक्त भार उठाना थोड़ा मुश्किल लग रहा है। उनसे छोटे अभय जीजा अच्छे पद पर थे, आमदनी भी अच्छी खासी थी, वे बोले क्या करूं? मेरा तो दो कमरों का फ्लैट है, एक कमरे में मेरे दोनों ही झगड़ते रहते हैं ऐसे में… 

आगे का वाक्य उन्होंने अधूरा छोड़ दिया लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से इंकार ही था।
किशोर चुपचाप बैठे थे, ये तमाशा देखकर वे एक बारगी बोल पड़े, ‘आप सबको रक्षिता की चिंता करने की आवश्यकता नहीं है, उसका मामा अभी जीवित है, मैं अपने पास उसे रखूंगा।

मैंने अपनी नापसंदगी जताने के लिए उनका हाथ दबाया, जवाब में उन्होंने मुझे ऐसे घूरा जैसे शिवजी का तीसरा नेत्र खुल गया हो, जिसमें मैं भस्म हो जाऊंगी। फिर आगे कुछ कहने की मेरी हिम्मत ही नहीं हुई। अगले दिन दोनों अपने परिवार के साथ चले गए। वहां का सामान लाने के लिए ट्रक की व्यवस्था करना, बैंक का काम, उसकी टीसी निकलवाने आदि के लिए हमें चार-पांच दिन और रुकना पड़ा, फिर हम भी रक्षिता के साथ वापस आ गए। उनका पूरा सामान किशोर ने उनके पुश्तैनी मकान में रखवा दिया था।

इस घटना को आठ-नौ महीने हो चुके हैं परंतु मेरा अभी तक उसके साथ जुड़ाव नहीं हो पा रहा है। मेरी इन्हीं हरकतों से किशोर बहुत चुप रहते हैं और मुझसे बहुत दूर होते जा रहे हैं। वह मुंह से तो कुछ नहीं कहते, परंतु अंदर ही अंदर उन्हें इस बात का कष्ट है कि उनकी प्यारी बहन की निशानी को मैं अपना नहीं रही हूं।
‘का, बात है बीबी जी, अभी तक सोय रही हो? नयनाबाई आकर सामने खड़ी हो गई तो मेरी तंद्रा टूटी, मैं यकायक अतीत से वर्तमान में आ गई। ‘हां आज थोड़ा पेट में दर्द था सिकाई कर रही थी, पर अब ठीक हूं कहते हुए मैंने बिस्तर छोड़ दिया तथा नित्य क्रिया में लग गई। 

घंटे भर बाद नयना अपना काम निबटा कर बैठ गई, मैं चाय बनाने लगी। यह नित्य का काम था, वह पूरा काम करने के बाद चाय पीकर ही जाती थी। ‘बीबी जी, पारो का ब्याह अगले महीने है, पहले से बता दे रही हूं, पंद्रह हजार का इंतजाम आपको करना है, धीरे-धीरे मैं सब चुका दूंगी। ‘ठीक है भई, कर दूंगी, पर तू उसका ब्याह इतनी जल्दी क्यों कर रही है? ‘अरे बीबी जी, लड़की जात है, कुछ ऊंच-नीच हो गई तो उसकी मां को क्या मुंह दिखाऊंगी? मैं तो हमेशा इसी चिंता में रहती हूं कि इज्जत के साथ इसे विदा करके इसकी मां को दिया वचन पूरा कर सकूं।

‘क्या? पारो तुम्हारी अपनी सगी बेटी नहीं है मैं चौंकी क्योंकि दोनों मां-बेटी में इतना ह्रश्वयार देखा है मैंने कि मुझे यकीन ही नहीं हो रहा था। नयना चाय पीती जा रही थी तथा बोलती जा रही थी, ‘बीबी जी, हमारे मरद ने जवानी में एक गलती की, इसकी मां को एक दिन लाकर हमारे घर बैठा दिया। मैं खूब लड़ी-झगड़ी, अलग भी रहने को सोची, पर दो छोटे बच्चों के साथ अलग रहना भी तो आसान ना था, उसके साथ रहने से कम से कम मर्द का साया घर पे रहने से समाज में इज्जत से दो रोटी कमा तो पाऊंगी, यही सोच कर मैंने समझौता कर लिया। पर भाग्य का खेल तो देखिए, साल भर में पारो को जन्म देते समय वह चल बसी। आखिरी बखत पास में लेटी अपनी बेटी के ऊपर मेरा हाथ रख कर बोली, ‘मेरी भूलों की सजा इसे मत देना, इज्जत के साथ किसी भले आदमी के संग ब्याह देना, दीदी मुझे माफ कर देना।

‘बीबी जी, मैंने भी नन्हीं सी जान को कलेजे से लगा लिया, आखिर है तो पति का ही खून। मैं आश्चर्यचकित सी उसकी बातें सुन रही थी। नयना बाई चली गई। परंतु मेरी आंखों पर बंधी पट्टी खोल गई, मैं सोच रही थी कि एक अनपढ़ गंवार घर-घर काम करने वाली औरत की सोच इतनी ऊंची है कि अपने सौत की औलाद को प्यार व सुरक्षा दे रही है, कोई भेदभाव नहीं किया और मैं पढ़ी लिखी बुद्धिजीवी होकर भी क्या कर रही हूं? दूसरे की भूल की सजा उस मासूम को दे रही हूं, मन में नफरत का बीज पाले उसे दिल से नहीं अपना रही हूं। वह मुझसे ह्रश्वयार से मिलना चाह रही है और मैं अपने बड़प्पन को खोकर उसे दूर करती जा रही हूं। भला हो नयना बाई का जिसने मुझे नई राह दिखा दी है। प्रात:काल जैसे ही मेरी नींद खुली मैंने उठकर खिड़की के पर्दे सरका दिए, भगवान भुवन भास्कर की स्वॢणम किरणें मेरे चेहरे पर पड़ी जो इस भयंकर सर्दी में थोड़ी गर्माहट प्रदान कर गई। मैं फिर से रजाई में घुस कर बैठ गई। इतने में रक्षिता कमरे में आ गई।
‘हैप्पी न्यू ईयर मामी जी कहते हुए उसने पीले गुलाब का फूल मेरी तरफ बढ़ाया। ‘तुझे भी नया वर्ष मुबारक हो, ये पीला फूल बहुत ही सुंदर है मैंने फूल ले लिया, मुझे याद आया, सरोजा जीजा को पीला गुलाब बहुत पसंद था। ‘मैं हमेशा नए साल पर मम्मी को पीला गुलाब भेंट करती थी। वह थोड़ा भावुक हो गई थी।

मैंने उसे अपने समीप खींच लिया और प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा, ‘मैं भी तो तेरी मां समान हूं। ‘वो तो आप हैं ही, मुझ अनाथ का आप दोनों पालन-पोषण कर रहे हैं, तो जो पालन करती हैं, वे माता-पिता के समान ही तो हुए ना मामी। ‘बहुत बड़ी-बड़ी बातें करने लगी है, मैंने उसके गाल पर चपत लगाई, फिर बोली, अच्छा तो आज नए साल पर तू मुझसे एक वादा कर, करेगी?

‘आप बोलो तो मामी। ‘तू आज के बाद अपने को अनाथ कभी नहीं कहेगी और मुझे आज से मम्मी कहेगी। इतने में आन्या भी कूदती फांदती आ गई ‘हैप्पी न्यू ईयर मम्मी, पापा और रक्षिता दीदी। किशोर भी उठ गए थे ‘हैप्पी न्यू ईयरतुम सभी को, कहते हुए उन्होंने बहुत दिनों बाद मुझे जिन स्नेहिल निगाहों से देखा वहां मेरे लिए प्यार ही प्यार था।

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