नारीमन की कहानियां
Nariman Ki Kahaniyan

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

मिनी अपने पति और बच्चों के साथ अपने ससुराल आई हुई थी। उसकी सासू मां ने माता रानी का जागरण रखा था। घर मेहमानों से भरा हुआ था। मिनी स्वभाव से ही बड़ी सहज व सरल स्वभाव की होने के साथ-साथ काम में भी बहुत ही निपुण थी। सभी घरवाले उसे बहुत पसंद करते थे। वह सर्वगुण संपन्न एक आदर्श बहू थी।

जागरण को अटेंड करने मिनी के पति राहुल का चचेरा भाई रोहित भी आया हुआ था। वह एमबीबीएस कर रहा था। उससे मिलकर मिनी को लगा ही नहीं कि वह उससे पहली बार मिल रही है। उसके प्रति मिनी को एक अंजाना-सा आकर्षण प्रतीत हो रहा था। वह बाकी लोगों के जैसे ही उससे भी बातें कर रही थी, पर कुछ सहज-सा नहीं लग रहा था। रोहित भी उसे एकटक देखता रहता था। रोहित की आंखों से आंखें मिलते ही उसे कुछ महसूस-सा होने लगता था और वह जानबूझकर सब कुछ नजरअंदाज़ करने की नाकाम कोशिश किए जा रही थी। रोहित उसके पास बहाने से आता था और फिर प्यार भरी नज़रों से उसे निहार कर दूर चला जाता था। मिनी को यह सब गलत लगते हुए भी वह खुद को उसके बारे में सोचने से नहीं रोक पा रही थी। उसकी नज़रें, उसका आस-पास होना, उसके दिल की धड़कनें बढ़ा देता था। आखिरकार जागरण संपन्न हुआ और सभी मेहमान अपने-अपने घरों को जाने लगे।

जब रोहित के जाने का समय आया तो मिनी को ऐसा लगा कि जैसे उसके दिल का कोई हिस्सा उससे अलग हो रहा है। वह नहीं समझ पा रही थी कि ऐसा क्यों हो रहा है। उसने सोचा कि रोहित के जाने के बाद सब सही हो जाएगा। पर उसके जाने के बाद मिनी का दिल जैसे बैठने लगा और वह चुपचाप कमरे में जाकर कमरा बंद करके बैठ गई। अनायास ही आंसुओं की झड़ी उसकी आंखों से बह निकली। वह किसी से अपने दिल की बात भी नहीं बता सकती थी। वह खुद से सवाल करने लगी कि क्या वह रोहित को चाहने लगी है पर ऐसा कैसे हो सकता है, वह मन ही मन सोच रही थी। उसने खुद को खूब दुत्कारा कि ‘बेशर्म मत बन, तू शादीशुदा है, यह गलत है, हर तरह से ही ये एक पाप के अलावा और कुछ नहीं है। ऐसा विचार मन में आना ही एक गुनाह है।’ उसने खुद को खुद ही खूब डांटा फटकारा और किसी तरह से मन को समझा कर और अपने आंसू पोंछकर वापस अपने काम में लग गई। उसके दिल में अभी भी बेचैनी-सी थी।

कुछ दिनों बाद वह भी अपने शहर वापस आ गई। खुद को ज़्यादा से ज़्यादा व्यस्त रखते हुए वह अपने दिल को रोहित के बारे में सोचने का मौका ही नहीं देती थी। पर कहते हैं ना कि आप। प्यार को नहीं ढूंढते हो, प्यार आपको ढूंढ लेता है। उसका बार-बार दिल चाहता था कि रोहित को फोन करे, उससे बात करे, लेकिन फिर अपने दायरों के बारे में सोच कर वह रुक जाती थी। काफी समय बाद एक दिन फोन की घंटी बजी और स्क्रीन पर रोहित का नाम देखते ही उसके चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गई। दिल ही दिल में आखिर वह भी तो यही चाहती थी। उसने फोन उठाया, उधर से रोहित की आवाज़ सुनकर मानो रेगिस्तान में बारिश की फुहार-सी पड़ गई हो। आखिरकार खुद को संभालते हुए उससे नॉर्मल तरीके से बात की। इसके बाद दोनों में अक्सर फोन पर बातें होने लगी। एक-दूसरे की ज़िन्दगी में क्या चल रहा है, क्या अच्छा हुआ, क्या बुरा हुआ, दोनों एक-दूसरे से शेयर करते थे। दोनों की आदतें और स्वभाव एक-दूसरे से काफी हद तक मिलते थे।

सब कुछ मिनी को बहुत अच्छा लग रहा था। रोहित उसकी एक-एक बात का ध्यान रखता था और उसकी बहुत परवाह करता था। पता ही नहीं लगा कि कब दूर होते हुए भी दोनों के दिल एक-दूसरे के सबसे करीब आ चुके थे। अक्सर वह अपनी ज़िन्दगी के बीते हुए पलों में खो जाते थी। वास्तव में मिनी शुरू से ही चंचल स्वभाव की थी। मस्त रहना, जिन्दगी के हर पल को जीना और ज़िन्दगी को एंजॉय करना, बस यही उसकी लाइफ थी। वह अपने सपनों की रंगीन दुनिया में जीती थी जिसमें केवल वह होती थी और उसके सपनों का राजकुमार।

उसके माता-पिता रूढ़िवादी थे। उनके लिए लड़का-लड़की का मिलना, प्यार करना एक बुरी बात थी जिसे समाज में भी स्वीकार नहीं किया जा सकता था। मिनी अपने मां-बाप को सबसे ज्यादा चाहती थी और वह किसी भी तरीके से उनका दिल नहीं दुखाना चाहती थी। स्कूल, कॉलेज के समय भी कुछ लड़कों ने उसे प्रपोज किया था परंतु उसने अपने दिल में यह ठान लिया था कि उसके मम्मी-पापा जिससे भी उसकी शादी करेंगे, उसको ही वह दिल में बसा लेगी जैसे कि बाकी सभी अरेंज मैरिज करने वाले करते हैं। उसके दिल में यही डर था कि अगर वह किसी को प्यार कर बैठी और उसके मां-पापा उसके साथ उसकी शादी के लिए तैयार नहीं हुए तो वह ना तो अपने मां-बाप के फैसले के विरुद्ध जा पाएगी ना ही जिन्दगी भर अपने प्यार को भूल पाएगी और किसी और के साथ भी एडजस्ट नहीं कर पाएगी। इससे अच्छा है कि जिस तरफ जाना ही नहीं, उस तरफ कदम ही ना बढ़ाया जाए।

हालांकि उसका दिल कहीं ना कहीं अपनी कल्पनाओं में अपने प्यार को ढूंढता ही रहता था। लेकिन वास्तविकता में उसको नज़रअंदाज़ करके उसने यह फैसला ले लिया था कि वह अपने मां-पापा की पसंद से ही शादी करेगी और ऐसा ही उसने किया। अब उसकी शादी को पांच साल हो चुके थे। उसके पति का स्वभाव उसके स्वभाव के बिलकुल विपरीत था। वो गंभीर व गुस्सैल स्वभाव के थे। हंसना, मस्त रहना तो जैसे उनको आता ही नहीं था। मिनी का वह सपनों वाला प्यार, वो एहसास अपने पति में बहुत ढूंढने पर भी नहीं मिले। पति का बात बेबात गुस्सा करना, ताने मारना, उल्टा सीधा बोलना घर के वातावरण को तनाव ग्रस्त बनाए रखना. बस आए दिन घर में यही सब होता था। उनके हिसाब से खुद को ढालते-ढालते मिनी बोझिल-सा महसूस करने लगी थी। अब वह सिर्फ ज़िन्दगी को काट रही थी। घर के कामकाज, बच्चों की परवरिश आदि में उसने खुद को जैसे खो दिया था।

रोहित के मिलने पर मानो मिनी के प्यार भरे सपनों ने करवट ले ली थी। रोहित में उसको अपने सपनों वाला राजकुमार दिखता था। लेकिन परिस्थितिवश वह उसको स्वीकार नहीं कर सकती थी। रोहित से बातें करना, उसके साथ होना, मानो वही पल उसकी ज़िन्दगी बन गए थे और वह यही सोच कर खुश थी कि चलो रोहित उसकी ज़िन्दगी में तो है और फिर वह दिन आया जब उसे एक कड़ा फैसला लेना पड़ा। एक दिन बातों ही बातों में रोहित ने उसे ‘आई लव यू’ बोलकर उससे शादी का प्रस्ताव रखा। एकदम से मानो मिनी को किसी ने झकझोर कर नींद से जगा दिया हो। एक बार तो उसका भी मन हुआ कि वह प्रस्ताव स्वीकार कर ले, लेकिन मिनी चाह कर भी उसकी नहीं हो सकती थी। वह समाज और रिश्तो की बंदिशों में बंधी हुई थी। उसकी आंखों के सामने उसके मासूम बच्चों के चेहरे घूमने लगे जो उसके जीने का सहारा थे और वह अपने स्वार्थ के लिए उन्हें ज़िन्दगी के भंवर में अकेला नहीं छोड़ सकती थी। उस पर अपने परिवार की, अपने बच्चों की परवरिश की बहुत बड़ी जिम्मेदारी थी। वह अपने प्यार की वजह से अपनी जिम्मेदारियों से मुंह नहीं मोड़ सकती थी। रोहित के बहुत मनाने पर और यह कहने पर भी कि वह किसी की परवाह नहीं करता और उसके लिए दुनिया से लड़ जाएगा, मिनी ने अपने रिश्ते को वहीं रोकना ही उचित समझा, इससे पहले की बात बिगड़ जाती।

उसने रोहित को समझाया “सब कुछ हमारी इच्छा से नहीं होता। जो परिस्थितियां होती हैं, उन्हें हर हाल में स्वीकार करना ही पड़ता है और पारिवारिक रिश्तों और जिम्मेदारियों से भागकर कोई भी खुश नहीं रह सकता। हम उन तमाम लोगों से कितने भाग्यशाली है जो जिन्दगी भर प्यार को ढूंढते रह जाते हैं पर उन्हें सच्चा प्यार नहीं मिल पाता। सच्चे प्रेम की अनुभूति किसी रिश्ते या नाम की मोहताज नहीं होती, इस सच्चे, निश्छल और स्वार्थ रहित प्रेम को, अपनेपन को एक-दूसरे से दूर होते हुए भी दो दिलों के द्वारा अनुभव किया जा सकता है।” पर रोहित कुछ भी सुनने को तैयार नहीं था। आखिरकार मिनी को अपने दिल पर पत्थर रखकर यह कहना पड़ा कि “मैं सब कुछ छोड़ सकती हूं पर अपने बच्चों को नहीं छोड़ सकती। मैं इतनी स्वार्थी नहीं हो सकती कि अपनी खुशी के लिए अपने बच्चों की ज़िन्दगी बर्बाद कर दूं” रोहित, हमें एक-दूसरे को भूलना ही पड़ेगा। हां जितने पल हमने साथ में बिताए हैं, मेरे लिए वे अनमोल हैं और उन्हीं पलों को याद करके मैं अपनी पूरी ज़िन्दगी बिता सकती हूं और तुम्हें भी यही करना पड़ेगा। हम अपने परिवार और जिम्मेदारियों से नहीं भाग सकते। इसलिए बेहतर होगा कि तुम भी कोई अच्छी-सी लड़की देख कर उससे शादी कर लो। हम एक-दूसरे के बिना रहते हुए भी एक-दूसरे के दिल में रहेंगे। एक शादी ही तो अपने प्यार को पा लेने का पैमाना नहीं है ना, बल्कि दिल से दिल का मिलना, एक-दूसरे की परवाह करना, एक-दूसरे को समझना और एक-दूसरे की भलाई के लिए एक-दूसरे से अलग होकर भी हमेशा एक-दूसरे के दिल में रहना, यही तो सच्चा प्यार है ना।” मिनी अपने फैसले पर अटल थी और उसके बहुत समझाने पर रोहित को भी समझ आ गया कि बच्चों की ज़िन्दगी बर्बाद करके वे अपनी ज़िन्दगी आबाद नहीं कर सकते, जो वास्तविकता है उसको बदला नहीं जा सकता। यही सब सोचकर उसने मिनी की ज़िन्दगी से चले जाना ही उचित समझा।

आज मिनी अपने बच्चों और परिवार की जिम्मेदारियों को पूरी ईमानदारी से निभा रही है। खुद को काम में व्यस्त रखती है। रोहित उसकी हर धड़कन में है, हर पल में है। एकांत में वह रोहित के साथ उन पलों को जीती है और रोमांचित महसूस करती है कि उसकी ज़िन्दगी में जो सच्चे प्यार की कमी थी वह रोहित के रूप में उसे मिला तो सही और यह सोचकर गर्व भी अनुभव करती है कि उसने अपने कदमों को बहकने नहीं दिया। पहले अपने मां-बाप के लिए और अब अपने बच्चों के लिए एक बार फिर से उसने परिस्थितियों से समझौता कर लिया था क्योंकि यही उसके तथा उसके परिवार के लिए सही था। जब कभी वह दुखी महसूस करती है तो यह सोचकर अपने दिल को समझा लेती है कि ‘कभी भी वह यह सोचकर दुखी नहीं होगी कि उसका प्यार उससे बिछड़ गया, बल्कि यह सोचकर हमेशा खुश रहेगी कि कम से कम हम, उस निश्छल और सच्चे प्रेम को, कुछ समय के लिए ही सही, पर वह अनुभव तो कर सकी।’

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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