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नारीमन की कहानियां
Remarriage-Nariman Ki Kahaniyan

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

मेरी यह कहानी सत्य घटना पर आधारित है। यद्यपि आधुनिक युग में बहुत कुछ बदल गया है पर आज भी हमारे देश में कई हिस्सों में बाल विवाह कर दिया जाता है।

रंगों का हर इंसान के जीवन में बहुत महत्व होता है। हर व्यक्ति अपने जीवन को मनपसंद रंगों से रंगीन कर सजाना चाहता है। पर दस साल की गुड्डी को आज तक कभी यह समझ नहीं आता था कि माँ उसके लिए लाल रंग का कपड़ा क्यों नहीं खरीदती। कई बार उसकी ज़िद्द होती थी, माँ सब रंग ले देती थी पर लाल रंग नहीं लेती। वार-त्योंहार आते, सबके लिए कपड़े बनते पर गुड्डी के लिए कभी भी लाल रंग का सूट नहीं बना। उसे याद ही नहीं कि जब से उसने होश सँभाला है, कभी लाल रंग का कपड़ा पहना हो। हमेशा अंदर से उसकी इच्छा यह थी कि कोई उसे लाल रंग का एक सूट सिलवा दे। फिर मन को समझा लेती थी कोई बात नहीं जब शादी होगी, तब तो घर के लोग लेकर ही देंगे ना।

गुड्डी के मन में लाल रंग को देख अजीब-सी बेचैनी शुरू हो जाती थी। अपने ही सपनों में खो जाती थी। उसकी दो सहेलियों की तो शादी भी हो चुकी है। उनको शादी के लाल जोड़े में जब देखा था तो उसने मन में एक बात बसा ली थी कि वह अपनी शादी में तो वही कपड़ा लेगी जिसमें लाल रंग हो। नैन नक्श, रंगरूप की धनी गुड्डी बहुत ही सुंदर थी। जब कभी भी माँ घर से बाहर जाती तो गुड्डी माँ की लाल ओढ़नी ओढ़ कर खुद को आइने में निहारती थी। अपने गौरे मुखड़े को लाल रंग के निखार में देख शरमा कर जल्दी से दुपट्टा उतार माँ की अलमारी में रख देती थी।

कुछ इसी तरह की कशमकश में गुड्डी की जिन्दगी कट रही थी। गाँव के स्कूल में पाँचवी तक की शिक्षा प्राप्त की थी और आगे की पढ़ाई के लिए दूसरे गांव जाना पड़ता था, इसलिए पिताजी ने आगे पढ़ने से इनकार करवा दिया था। अब जीवन में केवल घर में रहकर औरतों की तरह खाना बनाना और घर के काम करना ही उसकी दिनचर्या थी। लेकिन मन के किसी कोने में एक आस कि जब मेरी शादी होगी तो मैं लाल रंग के कपड़े पहन लूँगी और आगे पढ़ाई करूँगी। समय के साथ उसने लोगों को बदलते देखा था पर अपने घर में उसे कहीं भी कोई बदलाव या कहिए कि आधुनिकता की कोई पहल नज़र नहीं आती थी। पिताजी का स्वभाव कड़क था, उन से हमेशा ही डर कर ही रही थी, इसलिए कभी भी अपने मन की बात नहीं कह पाई थी। जब-जब माँ से उसने लाल रंग की बात की तो वैसे ही डाँट देती थी, “नहीं, तुम लाल रंग के कपड़े नहीं पहनोगी।” अब इतनी बड़ी होने के बावजूद भी यह बात वह समझ नहीं पाई थी।

आज घर में बड़ी हलचल थी। गुड्डी को समझ नहीं आ रहा था कि घर में क्या चल रहा है। जो भी कोई बात करता था, गुड्डी के सामने कोई बात नहीं होती थी। माँ और पिताजी बार-बार कमरे में जाकर बातें कर रहे थे। गुड्डी को यह समझ नहीं आ रहा था कि आखिर हो क्या रहा है! अब वह 18 साल की हो गई थी। रात में सोने से पहले माँ ने उसे बताया कि उसे ससुराल जाना है। उसे समझ नहीं आया कि कौन से ससुराल जाना है। उसकी तो शादी भी नहीं हुई। न डोली, न बारात, फिर कौन-सा ससुराल! पर घर आए दो पुरुषों से यह कहकर मिलवाया गया कि यह तुम्हारे पिता ससुर है और यह तुम्हारे देवर हैं। अब तो वह इतनी बड़ी हो चुकी थी कि उसे ससुर और देवर का मतलब पता था। लेकिन शादी के लिए तो दूल्हा होता है पर उसका ना होना, उसको समझ नहीं आया। फिर पता चला कि वह बाल विधवा है।

बहुत रोई, बहुत चिल्लाई पर किसी ने उसकी ना सुनी। उसे सफ़ेद जोड़े में ससुराल भेज दिया गया। उसके अंदर का लाल जोड़ा उसके अंदर ही जलकर राख हो गया। जब अपने माता-पिता ने नहीं सोचा तो दूसरों से क्या आशा रखती और भाग्य की विडम्बना समझकर गुड्डी चुपचाप ससुराल चली गई। जहाँ उसने अपना जीवन ससुराल की सेवा व इसे ही अपना भाग्य समझ स्वीकार कर लिया।

देवर उम्र में गुड्डी से पाँच साल बड़ा था और उसकी शादी है, इसलिए ससुराल वाले अब गुड्डी को लिवा लाए थे। ससुराल के घर में खूब रौनक थी, लेकिन किसी को यह चिंता नहीं थी कि इतनी छोटी गुड्डी के भी कुछ अरमान होंगे जो केवल एक बाल विवाह के अंदर दबकर रह गए थे। खैर, अब गुड्डी ने अपने-आप को समझा लिया था। देवर की शादी बहुत धूमधाम से हुई लेकिन फिर भी उसके लिए लाल जोड़ा नहीं आया। देवरानी के रूप में एक छोटी बहन उसे मिल गई थी। देवरानी बहुत प्यारी व समझदार थी, गुड्डी के साथ बहुत जल्दी घुल-मिल गई थी। गुड्डी अब पहले से ज्यादा खुश रहती थी। सास बीमार रहती थी, सो बड़ी बहू का फ़र्ज़ निभाते हुए पूरा घर सँभाल लिया था गुड्डी ने।

शादी के 2 साल बाद देवर के यहाँ लड़का पैदा हुआ। लेकिन भाग्य की विडम्बना कहिए या परिवार का दुर्भाग्य, छोटी बहू की डिलीवरी के समय मृत्यु हो गई। पोता घर आ गया। सास बीमार रहती थी। अतः बच्चे की सारी ज़िम्मेदारी गुड्डी के ऊपर आ गई। देवर तो एकदम गुमसुम हो गए थे, नन्ही जान का क्या होगा, यही सबकी चिंता का विषय था। घर की इतनी परेशानियों के बीच गुड्डी को तो एक जीता जागता खिलौना मिल गया था। सास-ससुर, देवर सब दुखी। गुड्डी को भी प्रभु से यही शिकायत रहती कि उसे खुशियाँ नसीब क्यों नहीं होती! घर में पोता आया तो देवरानी को छीन लिया।

अब तो गुड्डी ने बिन माँ के बच्चे को माँ बन पालने का निश्चय कर लिया। जब देखो पूरा समय अपने बच्चे की तरह प्यार करती। उसकी ममता का उफान इतना था कि सब लोग हैरान रह गए। जब एक दिन उन्होंने देखा गुड्डी बच्चे को अपना दूध पिला रही है। कोई भी इस बात पर विश्वास नहीं कर पाया। लेकिन कुदरत का करिश्मा कहिए या गुड्डी की ममता कि मासूम बच्चे को एक माँ का दूध नसीब हो गया। किसी को इस बात पर विश्वास ही नहीं हो रहा था। पर शायद माँ की ममता देख भगवान ने गुड्डी को सम्पूर्ण माँ का दर्जा दिलवा दिया। सास-ससुर के खुशी के आँसू रोके न रूकते थे। उन्हें तो विश्वास नहीं होता था कि यह करिश्मा कैसे हो गया। सुबह शाम गुड्डी को सरहाते नहीं थकते थे।

फिर एक दिन सास गुड्डी के पास आई और उसके हाथ में लाल जोडा था। जोड़ा लेकर उन्होंने गुड्डी के पैरों में रखते हुए कहा, “बेटा हमसे भूल हो गई। दुनिया बदल गई है पर हम अब भी वही पुरानी लीक पर चल रहे हैं। तुम्हारी शादी तुम्हारी बुआ के विवाह में हमारे बेटे से हुई थी जब तुम पाँच साल की थी। 18 साल पूरे होने पर तुम्हें ससुराल लाना था। आगे तुम्हें पता है। हम अपना एक बेटा तो पहले ही खो चुके थे और दूसरे के साथ भाग्य ने यह अन्याय कर दिया। तू मुन्ने की सचमुच की माँ बन जा।”

गुड्डी को कुछ समझ नहीं आया कि सासू माँ क्या कह रही हैं और क्यों कह रही है। तब तक ससुर भी वहीं आ गए और उन्होंने सिर पर हाथ रख कर कहा, “बेटा लोग चाहे कुछ भी कहे, अगर अपनी कोख से न जन्मे हमारे पोते को तुम दूध पिला सकती हो, फिर हम तुम्हारी दूसरी शादी क्यों नहीं कर सकते।” गुड्डी को कुछ समझ नहीं आया कि वह क्या कहे। वह कुछ कहती उससे पहले ससुर जी ने देवर से उसकी शादी करने का निर्णय सुना दिया।

ससुर जी का हाथ उसके सिर पर आशीर्वाद दे रहा था। हमेशा से लाल रंग को तरसने वाली गुड्डी अचानक अपने लिए लाल जोड़ा देखकर हैरान और समझ नहीं पा रही थी कि अब ये कैसी परीक्षा की घड़ी आन पड़ी है? ससुराल आकर जो अध्याय उसने अपने जीवन से हटा दिया था वह फिर से उसके सामने खुल गया था। अब यह निर्णय लेना उसके लिए बहुत मश्किल था। मन्ना को पाकर उसने अपनी सब कामनाओं को भला दिया था। अपने जीवन को मुन्ना के लिए समर्पित कर दिया था, पर आज फिर से पुनर्विवाह। शायद वह इसके लिए तैयार नहीं थी। अंदर ही अंदर चल रहे द्वंद्व को समझ नहीं पा रही थी। क्या जवाब दें ससुर जी और सासू माँ को। उनकी आँखें गीली और आशा से भरी हुई उसे निहार रही थी। वह केवल मुन्ना को देख रही थी, तभी सासु माँ की आवाज़ उसके कानों में पड़ी, “बेटा मुन्ना बहुत छोटा है और उसे एक माँ की ज़रूरत है, तुम से बेहतर कोई और माँ हो नहीं सकती।” उन्हीं की हाँ में हाँ मिलाते हुए ससुर जी ने कहा, “सौतेली माँ लाने से तो बेहतर है कि तुम ही अपने बेटे को पालो। दूध पिलाया है इसे तुमने अपना। तुम ही इसकी माँ हो, असली माँ।” अजीब-सी कशमकश और उलझन में फंसी वह सोच नहीं पा रही थी क्या जवाब दें। क्योंकि इस तरह की परिस्थिति का सामना उसे अब ज़िन्दगी में करना पड़ेगा, यह उसने कभी नहीं सोचा था। वह गर्दन झुकाए बैठी रही। मुन्ना उसकी गोदी में किलकारियाँ ले रहा था। अचानक उसे लगा जैसे कोई और उससे उसका मुन्ना छीन रहा है और पता नहीं सौतेली माँ इसके साथ कैसा व्यवहार करेगी! बस यह विचार मन को हिला गया और उसने सास-ससुर जी को हाँ बोल दिया और अपने आप को और अपने मन को एक बार फिर से परिवार की खुशियों के लिए कुर्बान होने के लिए तैयार कर लिया और हाँ कर दी पुनर्विवाह के लिए। सास-ससुर की आँखों से बहती हुई अविरल धारा और मुन्ने की किलकारी सुन मन के कोने में खुशी या प्रभु इच्छा, गुड्डी ने लाल जोड़ा उठाया और मुन्ने के माथे को चूमा और सासू माँ व ससुर जी को मुस्करा कर देखा और उनके पैर छू, शरमा कर कमरे में दौड़ गई।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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