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नर्बदा दीदी-21 श्रेष्ठ नारीमन की कहानियां पंजाब-Nariman ki kahani
Narbada Didi

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

Nariman ki kahani-कमाल टॉकीज चौक उसका पक्का अड्डा था। वह पिछले पहर यहां आती और चौक में इधर-उधर खड़ी रहती। कभी-किसी मोची से अपने सैंडल पॉलिश करवाने लगती. कभी साइकिल की दकान पर खडे होकर. वहां के नौकर से इस प्रकार बतियाती. मानो वह उसकी साइकिल का पंचर लगा रहा हो और तो और कभी किसी चाय की दुकान पर खड़ी होकर चाय पीती दिखाई देती, छोटे-छोटे चूंट भरते हुए। कमाल टॉकीज में फिल्म का टाइम होने लगता तो टिकट कटा कर अंदर चली जाती। वह कभी भी महिलाओं के लिए बने विशेष केबिन में नहीं बैठती थी। आम जनता में बैठती, अच्छे लोगों के बीच। इस प्रकार दिखाती, मानो बहुत मुश्किल से उसे वह सीट मिली हो।

नर्बदा सादे स्वभाव की लड़की थी। हल्के रंग की कमीज-सलवार, कभी-कभी हल्के रंग की ही प्लेन साड़ी। पैरों में कभी सैंडल तो कभी चमड़े की चप्पल होती। हाथ में छोटा-सा पर्स और छोटा-सा ही रुमाल रखती। चेहरे पर मामूली-सा मेकअप, जो दिखाई न देता। तीखे नैन-नक्श, सुन्दर किताबी-सा चेहरा। मोटी-मोटी कजरारी आंखें। दंतपंक्ति से होंठों का पर्दा हटा नहीं कि चेहरा गुलाब-सा खिल उठता। होंठ भिंचे होते तो उसकी आंखें हंसती थी।

उस दिन सिनेमा का टिकट लेकर वह अभी अंदर नहीं गई थी। बाहर लोगों की भीड़ में इस प्रकार खड़ी थी, जैसे किसी का इंतजार कर रही हो। उसकी चोर-निगाह उस नौजवान पर ही टिकी थीं जो अपना टिकट लेकर उसकी तरह बाहर खड़ा था और अत्यन्त उदास दिखाई दे रहा था। वह रह-रह कर अपनी हिप पॉकेट में हाथ रखता जैसे कुछ टटोल कर देख रहा हो या कुछ जांच रहा हो। नर्बदा उसकी ओर खिंची गई और खिंचती ही चली गई। आखिर उसने फैसला कर लिया कि वह उस नौजवान के साथ वाली कुर्सी पर बैठेगी।

फिल्म शुरू हो गई। नौजवान का ध्यान फिल्म में बिलकुल नहीं था। वह पल भर के लिए स्क्रीन की ओर देखता, फिर आगे की सीट पर माथा रख कर जाने क्या सोचने लगता। ऐसे लग रहा था जैसे वह फिल्म का बहाना करके, वहां दो-ढाई घंटे का समय गुजारने के लिए यहां आया हो। जैसे बाहर की दुनिया से भाग कर, दो-ढाई के घंटे के लिए सिनेमाघर में घुस आया हो। नर्बदा सोच रही थी, जरूर इश्क का मारा होगा। उसका खुद का ध्यान फिल्म में नहीं था। उसकी निगाह नौजवान पर ही टिकी हुई थी, मानो वह केवल उस नौजवान की खातिर ही सिनेमाघर में आई हो।

फिल्म का मध्यांतर हुआ, बत्तियां जल उठीं। वह फुर्ती से हॉल से बाहर निकल आई। उसने अपने दुपट्टे में नौजवान का पर्स बहुत लापरवाही से थाम रखा था। तेज कदमों से कमाल टॉकीज की भीड़ को चीरती हुई, वह एक सूने स्थान पर आकर रुक गई। उसने तुरन्त पर्स की तलाशी ली। उसमें दस का एक नोट था और एक पुर्जा था। नोट उसने अपनी ब्रा में खोंस लिया। गाली देते हुए पुर्जा फाड़ने ही लगी कि नजर लिखावट पर गई। अक्षर उसे सुन्दर लगे। वह पढ़ने लगी। वह एक पत्र था, जो नौजवान ने अपने चाचा को लिखा था। उसने लिखा था कि वह बी. ए. के आखिरी साल में पढ़ रहा है और उसके पास इम्तहान की फीस भरने के लिए फूटी कौड़ी भी नहीं थी। उसने चाचा को सौ रुपए का मनीआर्डर करने को कहा था और लिखा था कि जब उसकी नौकरी लग जाएगी तो वह यह पैसे चुका देगा। अंत में लड़के का पता लिखा हुआ था। नर्बदा ने पत्र को भी नोट के साथ ही रख लिया।

नर्बदा जब दसवीं में पढ़ती थी, उसके बाऊजी चल बसे थे। वह रेलवे कर्मचारी थे। नर्बदा का कोई भाई-बहन नहीं था। केवल एक मां थी। रेलवे वालों ने क्वार्टर भी खाली करवा लिया था। मां-बेटी किराए का मकान लेकर रहने लगी। नर्बदा की मां चाहती थी कि उसका ब्याह हो जाए, परन्तु नर्बदा अभी कॉलेज में पढ़ रही थी। उसके बाऊजी कहा करते थे कि वह बेटी को बी.ए. करवा कर ही उसका ब्याह करेंगे। वह एक तरह से बाऊजी की इच्छा पूरी कर रही थी। उसे लगता था कि बी.ए. के बाद उसे कोई अच्छी-सी नौकरी मिल जाएगी। वह बाऊजी की जगह पर लग सकती थी। बाऊजी क्लर्क थे, वह क्लर्क नहीं बनना चाहती थी। उसकी आकाक्षाएं ऊंची थी। वह किसी अफसर लड़के से ब्याह करवाना चाहती थी। लेकिन कोई अफसर एक क्लर्क से शादी क्यों करेगा? नर्बदा की मां ने उससे बाऊजी का सारा बकाया ले लिया और अपनी पेंशन बंधवा ली। नर्बदा को अपने भविष्य के लिए आजाद छोड़ दिया। नर्बदा ने बी.ए. पूरी कर ली परन्तु ना उसे कोई अफसर वर मिला और ना ही कोई ढंग की नौकरी ही। उधर बैंक में रखा, मां का पैसा दाना-दाना करके घर-परिवार की खाइयों में चला गया। अब केवल पेंशन ही रह गई थी। मंहगाई के जमाने में पेंशन के सीमित रुपयों से मां-बेटी का गुजारा मुश्किल से हो रहा था।

नर्बदा शाम के घुसमुसे में जब घर आती तो मोहल्ले के छोटे-छोटे बच्चे, लड़के-लड़कियां, उसके पीछे हो जाते। वह बच्चों को टॉफियां, चॉकलेट, रेवड़ियां और गजक के छोटे-छोटे पैकेट बांटते हुए चलती। सभी उसे “नर्बदा दीदी, नर्बदा दीदी” कह कर पुकारते और बातें करते हुए उसके साथ चलते जाते। जिसे जो मिल जाता, वही लेकर खाने लगता। बाकी बच्चे किसी अच्छी चीज की आस में उसके साथ घर तक आते। नर्बदा जैसे महारानी हो। सौगातें बांटने वाली। जैसे उसे अपना कोई दुरूह ना हो।

मोहल्ले के नौजवान लड़के-लडकियों में भी वह लोकप्रिय थी। वह अभावग्रस्त घरों के विद्यार्थियों की फीस भर देती। किसी को किसी भी मामले में कोई भी जरूरत होती, पैसे की या भावनात्मक स्तर पर, तब मोहल्ले में नर्बदा को याद किया जाता। वह किसी पुलिस अफसर या छंटे हुए बदमाश की तरह सीना तान कर अगले के साथ चल देती। सारा मुहल्ला जानता था कि नर्बदा “जेबकतरी” है। वह पुलिस वालों को ‘हफ्ता’ देती थी। हवलदार-सिपाही लुके-छिपे ढंग से उसे सलाम ठोंकते थे। ‘हफ्ता’ लेने वाला इलाके का पुलिस अधिकारी उसकी प्रतीक्षा में रहता।

नर्बदा जब कभी अपने बारे में सोचती तो सन्न रह जाती, आखिर वह किस रास्ते पर चल निकली थी। उसे तो पढ़-लिख कर किसी अच्छी-सी नौकरी में जाना था। किसी अफसर से ब्याह करवाना था। जब यह ख्याल उसे आता, उसी झटके से निकल भी जाता था। उसे अब यही जिन्दगी रास आने लगी थी। वह जमाने को मुंह चिढ़ा रही थी और वक्त को ठेंगा दिखा रही थी। उसका कोई कसर नहीं था। जमाने ने ही उसे ऐसा बना दिया था। इस रास्ते पर आगे बढ़ाया था।

नर्बदा के दो अस्तित्व थे। एक अस्तित्व अवचेतन का और दूसरा चैतन्य था। जेब काटते समय उसके हाथों की पहली दो अंगुलियां ऐसे काम करती जैसे वह बेहोशी में ऐसा कर रही हो। सब कुछ खुद-ब-खुद होता चला जाता। मोहल्ले के नौजवान लड़के-लड़कियों की आर्थिक सहायता करते या बच्चों में खाने का कुछ बांटते हुए वह पूरी तरह से जागरूक होती। उसे लगता, वह कुछ अच्छा काम कर रही है। मां की कोई बात वह नहीं सुनती थी। मां कहती, “बेटी! क्या सारी जिन्दगी यूं ही गुजार देगी? शादी-ब्याह के बारे में कुछ सोचा है क्या?”

नर्बदा कोई जवाब नहीं देती थी। बस, इसी प्रकार से समय अपनी चाल चल रहा था। मां को भी अच्छे कपड़े लाकर देती। घर में बढ़िया खाना बनता, घर में वह सामान भी था, जो बाऊजी के समय कभी नहीं हो पाया था।

सिनेमाघर में नौजवान की जेब काटने के बाद अगले ही दिन नर्बदा ने उसके पते पर दौ सौ रुपए मनीऑर्डर करवा दिए और भूल गई।

मनीऑर्डर मिलने के बाद उस नौजवान हितेश ने उसे लंबी चिट्ठी लिखी। मनीऑर्डर की वापसी रसीद भेजते हुए हितेश ने नर्बदा से उसके बाबत काफी कुछ पूछा।

एक बार तो नर्बदा खीझ उठी, “भई, तू पैसे ले और चुपचाप अपना काम कर। तुझे क्या लेना-देना, मैं कौन हूं, क्या काम करती हूं, इतनी अच्छी क्यों हूं।”

मगर वहीं अवचेतन में ही वह उसे चिट्ठी लिखने बैठ गई। कितने बरसों के बाद किसी को चिट्ठी लिखने का निकम्मा काम कर रही थी। वह लिखती गई, हितेश से भी लंबी चिट्ठी उसने लिख डाली। उसने अपने बारे में उसे सब बता दिया, अपने जेब काटने के धंधे के बारे में भी। उसकी चिट्ठी इतने अपनत्व से भरी थी, जैसे कोई किसी अपने को सब कुछ बता देता है।

हितेश की एक और चिट्ठी आ गई। यह पहले से भी ज्यादा लंबी थी। अब पत्रों का सिलसिला चल निकला। यह सिलसिला दो महीने तक इसी प्रकार चलता रहा। दोनों ने एक-दूसरे के बारे में सब कुछ जान-समझ लिया। एक-एक महीने के बाद दो सौ के दो मनीऑर्डर नर्बदा ने हितेश को भेजे।

हितेश इम्तहान के बाद ईंटों के भट्ठे पर मुंशी लग गया। उसका शहर बड़ा नहीं था। नर्बदा के कहने पर वह बडे शहर में आ गया। चार घंटे का रेल का सफर था। वे निश्चित स्थान पर मिले। बातें हुईं। वे चिट्ठियों के संसार से बढ़ कर कुछ नया महसूस कर रहे थे।

“तुम उस दिन हमारे शहर में क्या करने आए थे?” लड़की ने पूछा।

“किस दिन?” लड़के को शायद याद नहीं रहा था या यूं ही उसके मुंह से निकल गया।

“जिस दिन तुम्हारा पर्स…” नर्बदा के चेहरे पर निश्चल हंसी थी।

वह भी मुस्कुराने लगा, बोला, “यहां मेरे चाचा रहते हैं। उस दिन वह घर पर नहीं थे। वह चिट्ठी मैंने उन्हें पोस्ट करने के लिए रखी थी, जो तुम्हारे हाथ लग गई।”

“वह चिट्ठी तुमने मेरे लिए ही लिखी थी, है न।” नर्बदा शर्मा गई।

“हां, फिर वह तुम्हारी ही हो गई।”

“तुम भी तो मेरे हो गए, नहीं?”

“हां, यह तो है” लड़के ने अपना सारा वजूद समेटकर जवाब दिया।

वह दिन और यह दिन, मोहल्ले वालों ने फिर नर्बदा को कभी नहीं देखा। उसकी मां उसकी राह तकती रहती। सोचती, नर्बदा ने यह क्या किया? वह कभी एक रात भी घर से बाहर नहीं रही थी। बाहर से घूम-फिर कर आती, जो भी करके आती परन्तु रात को घर में आकर ही सोती थी।”

मोहल्ले के लड़के-लड़कियां हैरान-परेशान थे। नर्बदा दीदी कहां चली गई? मोहल्ले के छोटे बच्चों की तो जैसे मां ही मर गई? उनके मुंह से दूध छिन गया हो। बच्चों की भूख मर गई थी। उन्हें टॉफियों का इन्तजार नहीं था। वे सभी नर्बदा की बाट जोहते और आहे भरते रहते थे।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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