googlenews
मृग-तृष्णा-21 श्रेष्ठ युवामन की कहानियां पंजाब: Ambition Story
Mrg-Trshna

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

Ambition Story: राज ने ऑटो मोड़ कर, फ्लाईओवर के नीचे पिलर के पास लगाया, इंजन बंद कर, बिजली के खंभे से लटकते गत्ते पर अपने ऑटो का नंबर लिखने लगा। उसने हिसाब लगाया, सोलह नंबर पहले लिखे जा चुके थे। इनमें से नौ नंबर कटे हुए थे, इसका अर्थ है कि उसका नंबर आने में अभी समय लगेगा। कम से कम पौना घंटा तो अवश्य ही लगेगा। अधिक भी लग सकता है। उसने पिलर के पास पड़ा कंकड़ उठा कर पिछले टायर के आगे लगा दिया। वहां सड़क मामूली से ढलान पर थी। जिस कारण किसी के जरा-सा सहारा लेने पर ही कई बार ऑटो आगे की ओर खिसक जाता था। कंकड़ लगा कर सीधे होते हुए, उसने बीड़ी को होंठों में लगा कर, हाथ झाड़े और पैंट की पिछली जेब से कंघी निकाल कर सिर में फिराने लगा। कटी हुई जरा-जरा दाढ़ी पर भी…।

“आज तुम बहुत देर से आए हो?” चन्नी ने उसे घड़ी दिखाई। नौ बज रहे थे।

“रात डेढ़ बजे तक जागते रहे….सुबह नींद देर से खुली।” कंघी जेब में डाल कर, उसने बीड़ी फिर से अंगुलियों में फंसा ली।

“क्यों? इतनी देर तक क्या करता रहा?” उसकी आंखों में चमक उभरी।

“आश्रम वाले चौक में जगरात्रा था।”

“कौन-सा आश्रम?”

“हमारे मुहल्ले की ओर मुड़ते हुए सड़क पर पड़ता है।”

“फिर लगा कोई दांव? ” ऐसी भीड़ में किसी लड़की या जवान औरत से घिसटते हुए निकल जाने या किसी को कूल्हे पर चिकोटी काट लेने को ही वह बहुत बड़ी जीत का मैडल समझते थे।

“ना रस कम ही था। हां, पूड़ियों का लंगर खूब खाया, फिर पार्क की दीवार पर बैठ कर बीड़ियां फूंकते रहे….रात को तो नीलम भी दिखाई नहीं दी….नहीं तो उसे ही ले जाते।” नीलम उन्हीं के मुहल्ले की थी, पच्चीस-छब्बीस बरस की अविवाहित लकड़ी, जो रिलायंस के स्टोर पर लगी हुई थी। सामान के पैकेट झाड़-पोंछ कर करीने से रखती थी। वहां से सात बजे फारिग होकर वह किसी के साथ भी चली जाती थी, ढाई सौ रुपए ले कर।

“तुम्हारे डैडी को मालूम हो गया तो तुम्हारी टांगे काट डालेगा।”

“अरे, ऐसे कैसे पता लग जाएगा।” उसने लंबा कश खींचा, मगर बीड़ी बुझ चुकी थी। बातों में व्यस्त होने के कारण, वह कश खींचना भूल-सा गया था। जब उसे बीड़ी में सुलगती चिंगारी दिखाई न दी तो उसने जेब से माचिस निकाल कर उसे फिर से सुलगा लिया। एक जोर से कश खींच कर, उसने धुंआं छोड़ते हुए कहा, “चन्नी सेठ, आते बरस मैं नया स्कूटर ले लूंगा। यह साला खच-खच बस मुसीबत ही बन गया है अब।” उसने बीड़ी के दो-तीन कश और लगाए।

“यह तो तुम पिछले साल से कह रहे हो।”

“डैडी के बीमार हो जाने के कारण रह गया इस साल…। बीमारी पर बहुत खर्चा हो गया…साला कहने को ही सरकारी अस्पताल होता है! पर्ची लिख कर थमा देंगे…दवा बाजार से लेकर आओ…फिर वह अभी भी पूरी तरह से ठीक नहीं हुआ।” उसने जोर से एक और कश खींचा। इस बार उसे धुएं से कसैलापन महसूस ना हुआ, तब उसने बीड़ी को होंठों से निकाल कर आंखों से देखा। वह एकदम जल चुकी थी। उसने बचे टुकड़े को नीचे फेंक कर पैर से मसल दिया। वहां से ध्यान हटा कर वह फिर से सामने सड़क की ओर देखने लगा। बसों के हॉर्न, कंडक्टरों द्वारा लगाई जा रही तेज आवाजें सुनाई दे रही थीं:

फगवाड़ा, फिल्लौर, लुधियाना

आदमपुर, होशियारपुर, ऊना

मुकेरिया, पठानकोट, जम्मू

ब्यास अमृतसर…

चारों ओर जाने वाली बसें। ब्रेक पर पैर दबा कर ड्राईवर जरा-सी रेस देते तो इंजन की घं-घं कानों को फाड खाने वाली आवाज सुनाई देने लगती। एक पल ब्रेक से पैर उठाते, बस दो-चार इंच चलती कि फिर से ब्रेक दबा देते। बहुत सरकारी या लंबे रूट वाली बसें एक ओर से निकल जाती मगर लोकल बसें फ्लाईओवर के उस निचले रास्ते से निकलने का नाम न लेती। अड्डे से निकल कर फ्लाईओवर के नीचे ‘यहां बसें खड़ा करना मना है’ जैसे अनेक चेतावनियां बोर्ड पर लिखी थी परन्तु शायद ही कोई प्राइवेट बस होगी, जो वहां न रुकती न हो। सवारियां भी अड्डे से अधिक वहीं से बस लेती। शहर में ऑटो या मिनी बसों से आने वाली सवारियां आम तौर पर वहीं उतर जाती और जहां अपनी मंजिल की ओर जाने वाली बस दिखाई देती, वहीं उसकी खिड़की का डंडा पकड़ कर अंदर घुस जाती। ट्रैफिक पुलिस का सिपाही छोटा-सा डंडा लिए, वहां इसी कारण खड़ा था कि कोई भी बस वहां रुके न, मगर कंडक्टर दस का नोट उसकी मुट्ठी में दबा देता और वह पीछे जा कर खड़ा हो जाता। दो-तीन मिनट…पीछे की ओर लाईन लंबी होने लगती तो उसे डपट कर आगे करवा देता। बसों के आने-जाने के उस रास्ते पर ही ऑटो स्कूटर वालों ने भी अपने अड्डे बना लिए थे। शहर से सवारियां वहीं उतरती और आगे जाने के लिए वहीं से ऑटो ले लेती थी। शहर के हर गली-मुहल्ले, बाजार, इलाके की ओर जाने वाले ऑटो के वहां अपने-अपने अड्डे थे, अपनी-अपनी यूनियन थी। नंबर लगा कर सभी सवारी उठाते थे।

“आज सवारी इतनी कम क्यों लग रही है। इस हिसाब से तो आज तीन चक्कर भी नहीं लगेंगे।” करमे ने ऑटो की ओर देखते हुए मन ही मन सोचा। जब वह आया, तब एक सवारी बैठी हुई थी और पिछले पांच-सात मिनट में पांच ही सवारियां बढ़ी थी।

“क्यों भई, हुस्न-परी को शीश निवा दिया।” चन्नी ने सड़क के पार, सामने बस अड्डे के गेट के दाहिनी ओर लगे बड़े से होर्डिंग की ओर इशारा करते हुए कहा। होर्डिंग पर लड़की की आदमकद तस्वीर थी। नीचे पहनी कैपरी के साथ ऊपरी ब्लाऊज के स्थान पर छोटी-सी ब्रा थी। सीने की गहराई और ऊपर की ओर उठा सीना, नीचे जीरो-शेप आकार। वह एक हाथ से अपने बालों को अदा से पीछे की ओर कर रही थी और दूसरा हाथ हवा में उठा हुआ, मानो रुक जाने का इशारा करते हुए। आंखों में रोमांटिक कशिश। सामने से एक मंहगी गाड़ी की खिड़की से एक नौजवान बाहर सिर निकाले, उसे ‘बाय’ कहने के अंदाज में उसकी ओर देख रहा था।

“खूबसूरती का जादुई एहसास

दे जिन्दगी को नया उल्लास”

स्लोगन कार-मॉडल के रंग में उभरे हए थे। तस्वीर इस कदर खूबसूरत थी, जैसे होर्डिंग की मॉडल सच में कार वाले नौजवान की आंखों में छलांग लगा रही हो।

“तुमने देख लिया!”

“मैं तो हर समय पूजता हूं….सुबह, दोपहर…शाम!”

“और रात को…।” राज ने लुच्चेपन से उसकी ओर देखते हुए अपनी मूंछों को मरोड़ा। उसकी दाढ़ी कटी-छंटी हुई थी। दाढ़ी के हिसाब से ही मूंछे भी छोटी थी परन्तु सिर के बाल कुछ-कुछ लंबे थे, जिन्हें वह हरदम संवार कर रखने की कोशिश करता था। हालांकि ऑटो चलाते समय हवा के कारण उसके बाल अक्सर बिखर जाते थे। मगर जब भी वह सवारी उतार कर फुरसत में होता, तब जेब से कंघी निकाल कर बालों पर अवश्य फिराता।

सांवले रंग का इकहरा शरीर, आंखों से उभरती जवानी की चमक, जो उसके घिसे कपड़ों और साधरण गठन के बावजूद, उसे आकर्षित बनाती थी। काम वह तेजी से करता और मन मार कर भी। यहां आने से पहले उम्र के अठारह बरस उसने गांव में बिताए थे। गांव के बंधनों और संबंधियों-पड़ोसियों से घिरी पहचान से बाहर, यहां की आजाद फिजा में जैसे वह उड़ने लगा था। हर समय जेब में खर्च करने के लिए पैसे मौजूद होते। रहने के लिए उसने किशनपुरा चौक के पास ही कमरा ले रखा था, जिसमें उसके साथ दो साथी और शामिल थे। केस में उलझनों से पहले, सोखा भी उनके साथ ही रहता था। कमरे में ही स्टोव पर खाना बना लेते। काम, आवारगी, देर रात तक मोबाईल पर ब्लू फिल्मों के क्लिप देखते, कभी-कभी वह ‘धंधे’ वाली किसी औरत को कमरे में भी ले आते थे।

“जितनी मर्जी मूंछे संवार ले, वह तुझे तो नहीं मिलेगी।” चन्ने ने उसकी आंखों में उभरती तपिश को ताड़ते हुए कहा। इसके जवाब में वह कुछ कहता, राम सिंह ने उसे झिड़क दिया, “क्यों सुबह ही सुबह मुंह से गंद बक रहे हो, बोहनी का समय है…तरह-तरह की सवारी होती है…। कोई शरीफ आदमी आ कर बैठे तुम्हारे ऑटो में।” सफेद दाढ़ी, सिर पर घिसी हुई सफेद-सी पगड़ी लपेटे हुए। गले में फीके रंग का कुरता-पजामा, जो उसके सांवले रंग के साथ घुला-सा लग रहा था। साढ़े पांच फुट का कमजोर शरीर। पचास की आयु वाला राम सिंह अक्सर चुप ही रहता था। बहुत कम बात करता, बस तभी जब मतलब की बात होती या अत्यधिक आवश्यकता होती। वैसे यनियन में सभी उसका आदर करते थे। भले कितनी ही बहसबाजी चल रही हो, जब भी वह दखल देता, तब उसकी बात कोई कम ही टालता था।

“चाचा, आपके सामने, मैंने तो अभी ऑटो यहां आ कर लगाया है। बात किसने छेड़ी है…!” राज ने बात चन्नी की ओर सरकाने की कोशिश की। एक पल राम सिंह के चेहरे की ओर देखा। उसने दोनों को नसीहत के समान कहा, “जब हर समय गलत बातें सोचते रहो, उसका असर मन पर भी पड़ता है। सेखे का हश्र तुम्हारे सामने ही है।”

राम सिंह की बात सुन कर दोनों शर्मिन्दा हो गए। शायद इससे निकलने के लिए ही राज ने जोर से हांक लगाई, “रेलवे स्टेशन, किशनपुरा चौक….रेलवे स्टेशन किशनपुरा चौक….।” और बस अड्डे की ओर देखने लगा। गेट के सामने फ्लाईओवर था। गेट से बस पूर्वी ओर के स्पैन के नीचे से निकलती, वहां जंग में शहीदों के स्मारक से मुड़ते हुए अगले फ्लाईओवर से जी.टी. रोड़ की ओर बढ़ जाती थी। बसों के आने-जाने वाले स्पैन के पीछे की ओर इस स्पैन तले ऑटो रिक्शा का अड्डा था। फ्लाईओवर के साथ-साथ साइड-रोड से ऑटो भर कर शहर की ओर जाते थे। उसमें स्कूटर, मोटर साइकिल, रिक्शा और कारें सभी शामिल होते। इस ओर शहर में जाने के लिए और फ्लाईओवर के साथ-साथ दूसरे शहर के बस अड्डे की ओर आने का रास्ता भी यही था। हैवी-ट्रैफिक या बाहर जाने वाले सीधे फ्लाईओवर रोड़ से गुजरते थे।

करमा भक्त के ऑटो में छठी सवारी आ कर बैठ गई। उसने अपना ऑटो स्टार्ट करने के लिए दो-तीन बार कोशिश की। उसकी बाज नजर गेट की ओर लगी रही, किसी अन्य सवारी की तलाश में। मन में था, ‘एकाध सवारी और मिल जाए।’ तीसरे झटके में ऑटो स्टार्ट हो गया। उसने अपनी सीट को ठीक करते हुए ऊंची हांक लगाई, ‘रेलवे स्टेशन, किशनपुरा चौक….।” तेजी से एक नौजवान कंधे पर बैग लटकाए, उस ऑटो की ओर बढ़ा, जिसे उसने अपने साथ ही सीट पर बिठा लिया।

“लालच करने से बाज नहीं आते…। आगे बेशक पुलिस वाले घेर कर दो हजार का चलान काट दे।” छः सवारियों से अधिक बिठाने पर दो हजार रुपए का जुर्माना था। अगर वे चालान नहीं काटते तो ड्राईवर से पांच सौ तो झटक ही लेते थे।

राज फ्लाईओवर के पिल्लर से टेक लगा कर, बस अड्डे के गेट की ओर देखने लगा। गेट से निकल रही बसों व मिनी बसों की भीड़। साथ ही लोगों के आने-जाने वालों की भीड़। गेट के आगे बसों के निकलने देने का रास्ता छोड़ कर, ऑटो का जमघट। गेट के पश्चिमी छोर पर ज्योति चौक, पटेल नगर, मकसूदां के लिए ऑटो चलते थे। ऑटो ड्राईवर कम से कम छः सवारियां भर कर ही चलते। भले दस-पन्द्रह मिनट रुकना ही क्यों न पड़ता। उतावली सवारियां, बौखलाहट में इधर-उधर भटकती, पूछ-ताछ कर आखिर वहीं पहुंचती। स्पेशल ऑटो साठ-सत्तर रुपए से कम में जाता नहीं था।

“उधर देखो…वह शर्मा टी-स्टॉल के दाहिनी ओर…इसे यहां खड़े हुए आधा घंटा हो गया…” चन्नी ने इशारा किया। राज ने पिल्लर से हट कर उस ओर देखा। वही लड़की थी। बीस-इक्कीस बरस की, गोरा रंग। नीचे फीके खाकी रंग की टाईट जीन्स, ऊपर टी-शर्ट। खुले बाल, कंधों पर झूलते हुए। उसका सीना, शरीर के अनुपात में कुछ अधिक उभरा हुआ था। परन्तु वह उभार उसे और भी आकर्षित बनाता था।

“आज क्या बात हो गई?” पहले तो लड़का मोटर-साइकिल लिए उसका इंतजार करता खड़ा होता था। वह भी बीस-इक्कीस बरस का था। दोनों शायद किसी कॉलेज में पढ़ते थे या कहीं नौकरी करते थे। वे अक्सर दिखाई देते थे। उनका यही पक्का टाईम था, सवा नौ-साढ़े नौ का। राज कुछ पल उसकी ओर ललचाई नजरों से देखता रहा, फिर बोला, “आज तुम छोड़ आओ इसे।”

“मेरे पास कौन सा मोटर-साइकिल है कि मेरे पीछे चिपक कर बैठने से मुझे लुत्फ आएगा।”

“साथ सट कर ना सही, पीछे तो बैठी रहेगी। शीशे का ऐंगल उस पर फिट कर लेना।”

“ऐसी हिम्मत तुम ही करो..। मैं तो इस ‘ऐड वाली’ को देख कर ही काम चला लेता हूं।” वह होर्डिंग से उभरते लड़की के अंगों को देखने लगा। वह ही नहीं, सामने एक दर्जन से अधिक होर्डिंग और लगे हुए थे। कोई किसी प्रोफेनशल संस्था में दाखिला लेने के लिए, कोई शैक्षणिक आधार पर बाहर भेजने वाली किसी एजेंसी का था। आयलैट्स या इंग्लिश स्पीकिंग कोर्स करवाने वाले कई कोचिंग सैंटरों के थे। फिर जीन्स, मोबाइल…कई प्रकार के अन्य प्रॉडक्ट्स के भी थे। मगर हर विज्ञापन में मुख्य फोकस औरत के जिस्म पर ही था। इन सब होर्डिंग्स में से कार के विज्ञापन वाली मॉडल लड़की, जैसे सच में आसमान से उतरती प्रतीत होती और देखने वाली की निगाह वहीं टिकी रह जाती।

“साली है गजब की सुन्दर। एकदम कैटरीना कैफ..सी।” इंतजार में खड़े राज ने उस लड़की की ओर हसरत से देखा। तभी गेट से भैया लोगों का झुंड निकला। हाथों में सामान से लदे झोले, किसी-किसी के कंधे पर गठरियां भी। झुंड की ओर जाते हुए स्वाभाविकतावश राज के मुंह से निकला, “रेलवे स्टेशन किशनपुरा, बाईपास…।”

चन्नी भी उनकी ओर बढ़ा, “भैया, कहां जाना है?”

“टेशन, सिटी वाले।”

“आओ, आओ, दस-दस रुपए सवारी।” चन्नी उनके झोले ऑटो की ओर खींचने लगा।

“नहीं, दस नहीं देंगे!”

“दस से कम नहीं होंगे!” चन्नी के हाथ ढीले पड़ गए।

“कितनी सवारी हैं…?” हरी सिंह गिनती करने लगा, “ऐसा करो, आप लोग दो ऑटो कर लो, अस्सी-अस्सी बनते हैं, सत्तर-सत्तर दे देना।” वह इतनी सारी सवारियों को रेट के कारण हाथ से जाने नहीं देना चाहता था। आज वैसे भी सवारी काफी कम थी। खाली खड़े रहने की बजाए दो ऑटो का नंबर लग सकता था। उसे इस बात का भी डर था कि अड्डे से बाहर निकलने पर कोई भी उन सवारियों को पचपन-साठ में बिठा कर ले जाएगा। अड्डे के दायरे से बाहर निकल कर यूनियन का कोई जोर नहीं था। भैया लोग पैंसठ पर मान गए। मदन और बलराम ने अपने-अपने ऑटो में सवारियां बिठा ली।

उनके जाने के बाद हरी सिंह ने अपना ऑटो आगे लगा लिया। चन्नी ने खंभे पर लटके गत्ते पर निगाह दौड़ाई। उसके बाद अब उसी का नंबर था। उसने गहरी सांस ली, राज से बोला, “निकाल यार बीड़ी, जरा ताजा दम हो ले।”

ताजा दम होने के लिए, उस पर निगाह दौड़ा ले।” खोखे के साथ खड़ी लड़की की ओर इशारा करते हुए राज ने जेब से बीड़ी का बंडल निकाल कर उसकी ओर बढ़ा दिया। खुद भी एक बीड़ी निकाल ली। बीड़ी जला कर, उसने जोर से कश खींचा, “कल जाते समय दो बंडल लिए थे…डेढ बंडल रात तक पी गए?” साथ ही उसकी निगाह उस लड़की पर टिकी हुई थी। उसी समय उसी लड़के का मोटर साइकिल उस लड़की के पास आ कर रुका। लड़के ने मोटर साइकिल रोक कर उससे हाथ मिलाया। लड़की ने सीट पर बैठने से पहले पर्स से बारीक दुपट्टा निकाल कर, अपना चेहरा लपेट लिया। केवल माथा और आंखें ही दिखाई दे रही थी। फिर वह उछल कर लडके के पीछे बैठ गई। मोटर साइकिल के बढ़ते ही लड़की ने अपनी बाजू से लड़के की कमर को कस लिया।

“यह बुरके का नया ही रिवाज शुरू हो गया है!” राज ने उसकी ओर देखते हुए कहा।

“भाई साहब, यह इसलिए है कि कहीं घर से या कोई अन्य जान-पहचान का देख न ले। तुम्हें क्या मालुम….ये लडकियां क्या-क्या गुल खिलाती हैं?”

“तुम्हें मालम है…?” उसका प्रश्न उसकी ओर ही सरकाते हए, राज की नजर भीड़ में खोते मोटर साइकिल पर टिकी रही। फिर उसने गेट की ओर निगाह मारी, जहां वह खड़ी थी। फिर हरी सिंह के ऑटो की ओर देख, जिसमें पांच सवारियां बैठ चुकी थी।

“चलो चाचा, अब खींच ले रस्सी…। स्टार्ट होने तक एकाध सवारी आ ही जाएगी।” पहला फेरा लगा कर लौटे सत्ते धामी ने कहा। चन्नी अपने ऑटो के पास चला गया लेकिन राज वहीं खड़ा रहा। पिछले छः साल से वह इसी यूनियन के तले ही ऑटो चला रहा था। यही रेलवे स्टेशन, किशनपुरा चौक तक की सवारियां ढो रहा था। प्रतिदिन, महीने के तीस दिन, वर्ष के बारह महीने। कभी-कभी किसी ओर की स्पेशल सवारी भी मिल जाती थी। नागा तभी पड़ता, जब कभी बीमार-शीमार हो जाता या किसी साक-संबंधी में जाना पड़ता। सुबह आठ-साढ़े आठ बजे वह अपना ऑटो लेकर पुल के नीचे पहुंच जाता, फिर सारा दिन रेलवे स्टेशन, किशनपुरा चौक और किशनपुरा चौक से बस अड्डे तक चक्कर लगाता। इतने से रास्ते में ही इतनी दुकानें, गलियां, शौ-रूम…सब कुछ उसे याद हो गए थे। इस रूट पर या कुछ परे, किस कंपनी का ऑफिस था, कौन-सा अस्पताल या शौ-रूम है….सभी उसे याद थे। यहां तक कि कौन-सी गली मुड़ कर कहां पहुंचती थी, उसे मालूम था। अनेक सवारियों को भी जानने-पहचानने लगा था।

कितना कुछ बदल गया था पिछले छः बरसों में, उसके देखते ही देखते। यह फ्लाईओवर उसके देखते-देखते शुरू हुआ और तैयार हो गया। फिर नया बस अड्डा। पहले भी वह सड़क किनारे ही ऑटो खड़े करते थे। सड़क के दोनों ओर फलदार वृक्षों की कतार के साथ-साथ घास भरी पार्क, कम से कम तीस फुट चौड़ी लंबी थी। उसमें कहीं-कहीं शौ-रूम के सामने से गुजरते साईड रोड तक पहुंचने के लिए पगडंडियां थी। पार्क का अधिकतर हिस्सा इन शौ-रूम वालों ने ही विकसित किया था, कहीं-कहीं कार्पोरेशन वालों ने भी। जब कभी उसके ऑटो का नंबर आने में समय होता, वह इस पार्क में घास पर जा बैठता या किसी वृक्ष की ओट तले जा बैठता। परन्तु अब सड़क के स्थान पर फ्लाईओवर निर्मित हो गया था। कंक्रीट, सीमेंट, सरिये का दैत्य आकार और पार्क के स्थान पर बस अड्डे के लिए आने-जाने वाली साईड रोड…।

शौ-रूम पहले से अधिक बड़े हो गए। उनके सामने वाली सड़क का काफी हिस्सा उनकी पार्किंग ने घेर लिया था। जब कभी मन थका हुआ या कहीं वैसे ही सुस्ताने का मन करे, तो बैठने के लिए कहीं कोई जगह बाकी नहीं रही थी, ना ही कहीं घास। वैसे बैठने के लिए बहुत से नए स्थान बन गए थे, कितने ही रेस्टोरेंट व होटल खुल गए थे, जिनके सामने वाले हिस्से, देखने वाले के मन में लालसाओं का अंबार पैदा करते! जी ललचाता, उनमें दाखिल होने के लिए मगर अंदर जाने के लिए पैसे चाहिए थे। अब हर शै पैसे से खरीदी-बेची जाने वाली बन गई थी और पैसे कमाने का साधन भी।

अब समय नौ-साढ़े नौ का हो गया था, फिर भी अभी प्रतिदिन जैसी सवारियों की कमी थी। इसी समय ऑटो जल्दी-जल्दी भरते थे। साढ़े दस के बाद तो सवारियां कम होने लगती थी।

“आज सवारी बहुत कम लग रही है…यह तो भैया इन लोगों ने बचा लिया। एक-दो झुंड और ऐसे मिल जाएं तो मजा ही आ जाए।” चन्नी ने कहा। उसका मन अब बेचैन होने लगा था। मन चाह रहा था, जल्दी से ऑटो की सवारियां पूरी हो और वह अड्डे से बाहर निकल जाए, परन्तु अभी सवारियां केवल दो ही हुई थी।

“आज शनिवार है….अधिकतर सरकारी ऑफिस बंद रहते हैं…। सवारी अपने आप ही कम हो जाती है।” जतिन ने कहा और साथ ही अपना ऑटो स्टार्ट करने लगा, “चलते है भई एम.सी. चौक…वहां से कई बार स्पैशल सवारी भी मिल जाती है।” उसके ऑटो का नंबर बहुत पीछे था। जिस हिसाब से सवारी मिल रही थी, उसे अपना नंबर बारह बजे से पहले आने की उम्मीद नहीं थी। वैसे भी वह एक चक्कर लगा चुका था। सुबह सात बजे छः सवारियां लेकर वह स्टेशन गया था और वापसी में भी उसे पांच सवारियां मिल गई थी।

“हम तो यहीं से ही भर कर चलेंगे।” राज ने कहा। जवाब में जतिन ने कहा, “तुम्हारी क्या बात है…राजा शाह…। तुम तो अपना सारा दिन लड़कियों को देखते-देखते भी निकाल सकता है। अगर कोई लड़की नजर ना आई तो सामने विज्ञापन वाली मॉडल तो है ही। हम अगर शाम तक पांच सौ कमा कर ना ले जाएं…तो रोटी कहां से खाएंगे?” वह ऑटो किराए पर लेकर चलाता था। रोज का डेढ सौ किराया। सौ-सवा सौ का पेट्रोल लग जाता। परन्तु राज ने उसे कोई जवाब न दिया। उसका ध्यान बस अड्डे के गेट के साथ, एस.टी.डी. बूथ के सामने खड़ी लड़की की ओर चला गया। नीचे गहरे काले रंग की स्किन टाईट पजामी और ऊपर गहरे हरे रंग की कमीज। पीठ पर खुले सुनहरी बाल..। शौख रंग का मेकअप। वैक्सिंग की नंगी बांहें। पैरों में सैंडलनमा चप्पल, जो एडी को थोडा-सा ढक रही थी। नंगे पैरों की कोमल और नरम चमड़ी, उसे उसकी गालों से ही कोमल प्रतीत हुई। उसके मेकअप का अंदाज और कपड़ों की फिटिंग ऐसे थी जैसे शरीर के एक-एक अंग का, एक-एक कटाव उभर रहा था। रिक्शे, ऑटो का जमघट, प्रतीक्षा करती सवारियां, इधर से उधर उतावले लोग, लेकिन निगाह पड़ने पर, हर एक उस लड़की की ओर क्षण भर के लिए गौर से अवश्य देखता, जैसे हुस्न के इस जलवे को अपने दिल की गहराईयों में बसा लेना चाहता हो।

“सुबह तैयार होने में यह पता नहीं कितनी देर लगाती होगी।” राज के भीतर उत्तेजना पैदा होने लगी थी।

“चन्नी चाय पिए..।” उसने सड़क पार उस लड़की की ओर जाने का बहाना तलाश किया। वह उसे और भी नजदीक से देखना चाह रहा था।

“मेरा तो नंबर लगा हुआ है…मुझे मालूम है, तुम कौन-सा चाय पीना चाह रहा है…। साले, उसे क्या, उसकी जूती को भी छूने की हैसियत नहीं तुम्हारी!”

“मगर चोरी-चोरी तो देख ही सकता हूं।” कहते हुए राज उस ओर चला गया। उसने पीछे से व्यंग्य कसा, “तेरे साथ भी एक दिन सेखे जैसा ही होगा, देख लेना!”

वैसे सेखा पलक झपकते ही फंस गया था। अब मिलने जाने पर रोता है, “मुझसे ऐसा कैसे हो गया…? मैं तबाह हो गया…।”

उस दिन रात को उसने आखिरी फेरा लगाया। पांच सवारियां थी, जिनमें से चार रेलवे स्टेशन पर उतर गई। बाकी रह गई पच्चीस-छब्बीस बरस की सजी-धजी युवती। उसने किशनपुरा चौक जाना था। जनवरी की धुंध भरी रात, सड़कें लगभग सुनसान…। “रेलवे स्टेशन पर सवारियां उतारने तक मेरे मन में कुछ नहीं था। जब मैं दमेरिया फ्लाईओवर चढ़ने लगा तो दिमाग में फितर भरने लगा। फ्लाईओवर उतरते ही मैंने ऑटो रेलवे गोदाम के उजाड की ओर मोड लिया। फिर तो जैसे मेरे अंदर कोई भूत घुस गया।”

छः महीने हो गए उसे जेल गए हुए। जमानत नहीं हो पाई। जिस प्रकार का केस उस पर बना है, उसमें दस साल से कम की सजा होगी नहीं।

राज ने कोई जवाब न दिया। वह पहले बस अड्डे के गेट में गया। वहां खड़े एक पहचान वाले कंडक्टर के पास कुछ देर तक खड़ा रहा ताकि बाहर खड़ी उस लड़की पर नजर बनी रहे। सवारियां भर जाने पर वह बस चल दी।

बस जाने के बाद उसने गेट से बाहर आ कर चाय वाले से चाय बनाने को कहा। लड़की पन्द्रह-बीस कदमों की दूरी पर खड़ी थी, सड़क पर नजर गड़ाये। ‘काश! कहीं एक पल ही इसे छूने का मौका मिल जाए। इससे कोई बात हो जाए!’ उसके भीतर उत्तेजना का ज्वार भाटा उछलने लगा था। इतने में एक सिल्वर रंग की हौंडा सिटी कार रास्ता बनाते हए गेट के सामने आ खड़ी हुई। लडकी से हट कर उसका ध्यान कार की ओर चला गया। लड़के ने कार रोक कर मोबाइल मिलाया, इधर लड़की का मोबाईल बजा। मोबाइल कान को लगाते ही वह मुस्कराई और हौंडा सिटी की ओर चल दी। बिलकुल पहले जैसा दृश्य दुहराया गया, जिसकी नायिका तो वही थी, मगर नायक और कार बदल गई थी। तब कार स्विफ्ट डिजायर थी। तीन महीने पहले का वह दृश्य….!

…उस दिन भी वह सड़क किनारे इसी प्रकार खड़ी थी। ऐसे ही कार उसके निकट आ कर रुकी। मगर वह अपने में मस्त खड़ी रही। जब मोबाइल की रिंग बजी, उसने मोबाइल कान पर लगाया और बात करते हुए आज की तरह मुस्करा कर कार में बैठ कर चली गई थी। तब पहली बार उसे लगा, वह उसका कोई ग्राहक था। कोई जान-पहचान नहीं, ना ही कोई हमसाया ही। बस अड्डे के आसपास इस धंधे की झलक अक्सर ही मिल जाती थी परन्तु मन में दृश्य कोई-कोई ही अटकता था, जैसे इस लड़की से जुड़ा दृश्य। शायद उसके हुस्न का जलवा ही ऐसा था कि उसे कुछ पल देखने की लालसा में, उसकी गैर-मौजूदगी में भी उसे लेकर कितनी कल्पना करता रहता था। कहीं आठ-दस दिन या पन्द्रह दिन बाद ही वह दिखाई देती थी। शायद बीच-बीच में आती हो या उसके द्वारा फेरा लगाए जाने के कारण दिखाई न देती हो। वैसे भी उसका कोई पक्का ठिकाना या निश्चित समय नहीं था कि यहीं पर खड़ी हो कर इंतजार करें। वह बस अड्डे के किसी भी दूसरी ओर या अन्य गेट की ओर भी जा सकती थी।

कार चली गई तो वह उसके हुस्न के जादुई जलवे से बाहर आया। होश संभाला। चाय वाले ने प्लास्टिक के कप में उसे चाय थमाई। “ऐसे ही यहां सात रुपए खराब किए।” उसे पछतावा होने लगा। उसे चाय की तलब कहां थी। यह तो एक बहाना था। उसे निकटता से खडे होकर देखने का, गौर से देखने का। पैसे दे कर चाय का कप थामे, वह अपने ऑटो की ओर चल दिया।

“क्यों उड गई कबतरी?” चन्नी ने उसे छेडा। उसके ऑटो में अभी केवल चार ही सवारियां बैठी थी। राज ने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया। चुपचाप अपने ऑटो की पिछली सीट पर बैठ कर चाय सुड़कते हुए गेट को घरता रहा. शायद किसी ऐसे ही चेहरे की तलाश में, जो कछ पल उसकी कल्पना में रंगीन सपनों को सुलगा सके, भले पहुंच से बाहर ही सही! वैसे भी परियों तक भला सभी की पहुंच कहां होती है …!

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

Leave a comment