Hindi Motivational Story: बरामदे में बैठी रचना और कविता आशा जी और मोहन जी को कमरे से निकलते देख फुसफुसाने लगी… इस उम्र में क्या पड़ी थी इन्हें शादी रचाने की? “सारी बिरादरी में हमारी नाक कटा दी इन्होंने….” कविता ने कहा। कल ही किटी पार्टी में सभी सहेलियां मेरा मज़ाक उड़ा रही थी भाभी कि, तेरे ससुर सत्तर बरस के हो गए और इस उम्र में अब शादी करने की क्या सूझी? मुंह चढ़ाते हुए रचना बोली। हमारे खुद के इतने बड़े-बड़े बच्चे हो गए हैं… वह हमसे पूछते हैं कि,मम्मी मम्मी दादाजी नई दादी क्यों लाए हैं? अब तुम ही बताओ हम क्या जवाब दे इसका…। हक्का-बक्का नज़रों से दोनों देवरानी जेठानी एक दूसरे को देखकर बात कर रही थी।
आशा जी कमरे से बाहर निकल ही रही थी….प्रश्न सूचक नज़रों से मोहन जी की ओर देखते हुए फिर से अपने कमरे की ओर बढ़ गई। पीछे-पीछे मोहन जी भी कमरे में आ गए। अरे! आशा जी आपको शर्मिंदा होने की कोई ज़रूरत नहीं है। हमने कोई गुनाह तो नहीं किया। क्या उम्र के इस पड़ाव पर प्रेम होना पाप है क्या? और इस निष्पाप प्रेम को हमने शादी के बंधन में बांधा है। दुनिया जो भी कहती है कहने दो…मुझे कोई परवाह नहीं है आशा जी। आशा जी का हाथ थामते हुए मोहन जी बोले। तब कहां थी हमारी ये औलादें, जब हम तनहाई में आंसू बहाया करते थे? भूखे ही सो जाया करते थे… तब हमारे यह बच्चे हमारा कहां खयाल रखते थे?
बेटे व्यवसाय के लिए सुबह निकलते थे तो सांझ ढलने तक आते थे और उन्हें इतनी भी फुर्सत नहीं होती थी कि, मुझसे दिन भर में मिल भी ले और बहुएं…उन्हें उनके घूमने फिरने और किटी पार्टियों से कहां फुर्सत थी? आशा जी का मन भी भर आया…आशा जी भी मोहन जी का हाथ पकड़ कर बोली, “सच मोहन जी विकास के पापा को गए चौदह वर्ष हो गए, मानो मैंने भी यह समय वनवास जैसा ही काटा है”… बहु प्रिया की मनमानी सहते-सहते कभी-कभी आत्महत्या करने को जी करता था। सारा दिन मुझसे घर का काम करवाती और खाने को बासी रोटी देती। ज़रा देर मै अपने बेटे विकास से बात कर लूं, तो प्रिया बहू की छाती पर सांप लोट जाते। बस एक संगीत ही था जो मेरे जीने की वजह था…दोनों ही अपने अतीत में खो गए।
आशा जी बोली,मेरे पोते बिट्टू ने उसका पुराना मोबाइल देकर कहा कि, लो दादी आप इस मोबाइल पर स्टार मेकर ऐप से गाना गाया करो। अरे बिट्टू! मुझे इसे चलाना नहीं आता बेटा…इसका मैं क्या करूंगी? नहीं-नहीं मुझे नहीं चाहिए मोबाइल वोबाइल। मैं ऐसे ही गा लेती हूं तो मेरा मन हल्का हो जाता है। अरे दादी! आपकी आवाज़ इतनी सुरीली है, सच आप एक बार कोशिश करोगी तो आप सब सीख जाओगी। और आपका वक्त भी कट जाएगा। और हां दादी… मैं आपको मेरा एक इयर फोन भी दे देता हूं….धीरे-धीरे बिट्टू ने मुझे गाना कैसे गाते हैं? कैसे पोस्ट करते हैं? कैसे ड्युएट गाते हैं?… यह सब कुछ सिखा दिया। मेरे फॉलोअर्स बढ़ते चले गए और स्टार मेकर के ज़रिए मुझे आप मिल गए।
आपके साथ ड्युएट गाते-गाते आपके प्रति खिंचाव महसूस होने लगा और हम कब एक दूसरे से प्रेम करने लगे पता ही नहीं चला… “आपकी सुरीली आवाज़ और गायकी मुझे मोहित करने लगी” आंखों से आंखें मिलाकर आशा जी मोहन जी से कहने लगी। एक रोज़ प्रिया बहू को सब कुछ पता चल गया कि, बिट्टू मेरा बैलेंस करवाता है चुपके से…. बस फिर क्या था, शाम को विकास के घर आते ही प्रिया बहू हंगामा मचा कर बोली विकास तुम्हारी मां ने तो हमारे बेटे को चोरी करना भी सिखा दिया। जब की बिट्टू अपनी पॉकेट मनी से कुछ पैसे बचा कर मेरा बैलेंस करवाता था। प्रिया बहु ज़ोर-ज़ोर से चीखने लगी…अब मैं एक पल बिट्टू को यहां नहीं रखने वाली….अब हम बिट्टू को हॉस्टल में डाल देंगे… इतना कहकर बिट्टू को खींचते हुए प्रिया बहू कमरे में ले गई। और खूब पिटाई की और सारी रात मुझे और बिट्टू को भूखा रखा। दूसरे ही दिन बिट्टू के हॉस्टल जाने की तैयारी हो गई… अब फिर वही तनहाई…..।
अपनी कड़वी यादों से उबर कर, आंखों में अश्रु लिए आशा जी बोली…वह उजली सुबह मैं भूला नहीं सकती मोहन जी! जिस दिन मुझे पता चला कि, आप जलगांव से इंदौर आ रहे हैं। मन में एक तरफ खुशी और एक तरफ थी हलचल, घबराहट। आपसे मिलने के बाद उस दिन मुझे ऐसा लगा मानो दूसरी सुनहरी ज़िंदगी ने मेरे दरवाज़े पर दस्तक दी है। आपका सौम्य, सरल स्वभाव मुझे सम्मोहित कर गया। मैं और आप एक ही नांव के सवार यात्री थे….। “मेरे आश्चर्य का ठिकाना तो तब ना था, जब आपने उम्र के इस पड़ाव पर मेरे समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा”… मैं यह बात तो स्वप्न में भी नहीं सोच सकती थी मोहन जी। मोहन जी ने आशा जी का हाथ हाथों में लेकर कहा कि, “मैं तुमसे सच्चा प्रेम करता हूं, प्रेम उम्र की अवस्थाएं नहीं देखता, देखता है तो केवल मन”… “जहां तक मेरी नज़रें भांप रही है कि, आप भी मुझसे उतना ही प्रेम करने लगी है आशा जी”… निश्छल प्रेम सिर्फ तन का साथी नहीं होता मन का होता है। क्या जीवन में दूसरी बार प्रेम नहीं हो सकता? माना मैं मेरी पत्नी से बेइंतहा प्रेम करता था, आप आपके पति से बेइंतहा प्रेम करती थी। पर उनके जाने के बाद जीवन मानो सूना, बेरंग , वीरान पतझड़ हो गया था। बच्चे अपना-अपना मधुबन सजा रहे थे और हम अकेले राही अनवरत वीरानी राहों की ओर चले जा रहे थे। अचानक वीराने में, पतझड़ में बहार बनकर आई आप… हमारे जीवन में अगर खुशियों के फूल खिल जाए तो किसी को क्या? क्या हमारे बच्चों की खुशियों से हमें कभी तकलीफ हुई है क्या? आखिर क्यों… हमारे बच्चों को हमारी खुशियों से तकलीफ होनी चाहिए? बताइए आशा जी… कुछ तो कहिए… मुझे आपकी स्वीकृति चाहिए हमारे विवाह के लिए और दोनों की आंखों से अश्रुधाराएं बह चली…। मैं दो दिन यहीं इंदौर में हूं, आपके सकारात्मक उत्तर की प्रतीक्षा करूंगा।
बोझिल कदमों से आशा जी घर की ओर चल पड़ी। घर आते ही बहू बरस पड़ी…. इतनी देर से कहां गायब थी आप? घर का सारा काम पड़ा है कौन करेगा?…”मैं तो ऑफिस से थक कर आई हूं, अब जल्दी से खाना बनाओ, विकास आते ही होंगे ऑफिस से” कहकर प्रिया कमरे की ओर चल दी। सारा काम निपटाकर आशा जी रात को सोने के लिए कमरे में गई, तो आंखों में नींद का नामोनिशान नहीं था। आंखों से अश्रुधाराएं बहती जा रही थी और ज़हन में मोहन जी की बातें, उनके विवाह का प्रस्ताव चलित हो रहा था…. सच तो यह भी था कि, आशा जी से अब इतनी ज़िल्लतें, इतना ज़ुल्म, इतनी वेदनाएं सही नहीं जा रही थी। अब तक अपनी किस्मत मानकर आशा जी ने इन सभी ज़्यादतियों को जीवन का अध्याय मान लिया था… अपितु इस अंधियारे में अब एक आशा की किरण थी…. मोहन जी।
सारी रात करवटों में गुज़र गई। सुर्ख लाल सूजी हुई आंखों में पानी था जब वह सुबह-सुबह अपने बेटे विकास के कमरे में चाय का कप लेकर पहुंची… चाय का कप विकास को पकड़ा कर आशा जी वहीं खड़ी रही। विकास ने चाय की चुस्की लेते हुए कहा, क्या बात है मां, तुम खड़ी क्यों हो कुछ कहना है क्या? बड़ी हिम्मत जुटाते हुए आशा जी बोली, मैंने एक फैसला लिया है बेटा… कैसा फैसला मां?होले से आशा जी बोली, बेटा मैंने विवाह करने का फैसला लिया है… क्या, क्या कहा आपने, फिर कहना प्रश्न सूचक निगाहों से विकास मां की और एक टक देख रहा था… चाय का घूंट ठसके के साथ मुंह के बाहर निकल आया था। विकास भौंचक्का सा खड़ा रह गया… फिर अचानक झल्लाहट भरे स्वर में चिल्लाया, मां तुम्हारा दिमाग तो खराब नहीं है, यह क्या कह रही हो तुम? इस उम्र में विवाह, किससे करना है विवाह? मां ने भर्राई आवाज़ में बेटे विकास को मोहन जी के बारे में सब कुछ बता दिया। मां तुम्हारे इस फैसले पर सारी दुनिया हंसेंगी….लोग क्या कहेंगे? कहते हुए विकास और प्रिया दोनों एक-दूसरे की ओर एकटक देख कानाफूसी करने लगे। इतने में आशा जी ने स्वर को सख्त करते हुए कहा कि, फैसला मैंने ले लिया है बेटा… तुमसे पूछ नहीं रही हूं, तुम्हें बता रही हूं। और रही दुनिया की बात, दुनिया मेरे दुख में तो कभी शामिल नहीं हुई फिर मेरी खुशियों में भी दुनिया को शामिल होने का हक नहीं है। दुनिया के बारे में मैं क्यों सोचूं ? तुम्हें कोख से जन्म देकर सारा जीवन मैं सिर्फ तुम्हारे बारे में सोचती रही… तुम्हारे और परिवार के सुख दुख का खयाल रखती रही, फिर भी मुझे झिड़कियों के सिवा क्या मिला बेटा? और तुम बेटा बहू के सामने कब बोल पाए? चाहे बहू ने मुझ पर कितने भी अत्याचार किए हो?… कहकर आशा जी अपने कमरे की ओर चल दी। अपना सामान एक अटैची में भरकर मोहन जी के साथ एक नए सफर पर चल पड़ी…। विकास नज़रें झुका कर शर्मिंदा सा खड़ा रहा।
आशा जी और मोहन जी ने मंदिर में जाकर रीति रिवाज़ के साथ विवाह किया और चल पड़े नई मंज़िल की ओर….। दोनों जैसे ही मोहन जी के घर पहुंचे, घर पर दोनों को देखकर सभी जन भौंचक्कें रह गए… दोनों के गले में पुष्पमालाएं, दूल्हा दुल्हन का वेश देखकर हैरान रह गए। तभी बड़ा बेटा सामने आकर बोला, यह सब क्या है पापा? क्या माजरा है? क्या आप दोनों ने विवाह किया है? इतने प्रश्नों की बौछार पर पापा ने सभी को सब कुछ बता दिया…. और आशा जी का हाथ पकड़ कर सभी को एक बाजू हटाकर अंदर ले आए… दोनों को सारा परिवार बुत बनकर देख रहा था। आशा जी और मोहन जी ने वह हंसीं रात में एक दूजे की आप बीती सुनी। जलती वेदनाओं पर नेह का मरहम लगाया। एक दूसरे से वादा किया कि,अब हम एक दूसरे का पूरा-पूरा खयाल रखेंगे। ज़िंदगी को जीना अब हम सिखायेंगे…. इस पर उम्र का बंधन क्यों? दोनों की सारी रात बातों ही बातों में कटी। सुबह-सुबह आशा जी कमरे से बाहर निकली तो फिर वही जली कटी बातें… मोहन जी की बहुओं के ताने, शर्मिंदगी… यह सब मोहन जी ने देख-सुन लिया था। कैसी विडंबना थी कि, पेट के बच्चों से बागबान का सुखी संसार देखा नहीं जा रहा था। जिन बच्चों का संसार बसाने के लिए एक मां और पिता ने अपना सारा जीवन कुर्बान कर दिया। अपना सुख नहीं देखा, सिर्फ अपने बच्चों के बारे में जीवन पर्यंत सोचते रहे, वह बच्चे मां-बाप को एक कतरा सुख भी नहीं दे सकते।
मोहन जी उस वक्त तो मूक-बधिर बने रहे। शाम को मोहन जी ने सारे परिवार की एक मीटिंग बुलाई और फैसला किया और परिवार को सुनाया कि, अब मैं और आशा जी अलग मकान में रहेंगे…. मोहन जी बहुत ही कर्मठ थे। आज भी बेटों से ज़्यादा मेहनत करके सारे परिवार को चलाते थे… और भगवान की कृपा से मोहन जी ने सारी ज़िंदगी मेहनत करके धन संपत्ति भी खूब जोड़ रखी थी। आज तक तो हम यह देखते आए थे कि, बेटे बाप का घर छोड़कर अलग हो जाते हैं… लेकिन आज एक पिता ने अपने बेटों का घर छोड़ दिया। जिस घर को बनाने में, सींचने में उनकी सारी उम्र बीत गई। एक बागबान की तरह उन्होंने अपने मधुबन को सजाया था… अब अपना नया आशियाना बसाने के लिए निकल पड़े आशा जी और मोहन जी…और फिर से सजा लिया अपना मधुबन दुनिया के परवाह किए बगैर… दोनों ने सारी खुशियां समेट ली… फिर से एक नई ज़िंदगी जीने लगे दुनिया की परवाह किए बगैर…दोनों खूब घूमते फिरते… आशा जी नई दुल्हन की तरह मांग में सिंदूर सजा कर, बड़ी-बड़ी लाल बिंदिया लगाकर, चटक लाल साड़ी पहनकर मोहन जी के साथ हर जगह उपस्थित रहती… चाहे सामाजिक कार्य हो या पारिवारिक कार्य… जो मोहन जी महिनों बाल नहीं कटवाते, दाढ़ी नहीं बनवाते, अच्छे कपड़े नहीं पहनते थे… वह भी अब बढ़िया तैयार होकर घर से निकलते आशा जी के साथ… और उम्र के इस पड़ाव पर भी दोनों की जोड़ी खूब कमाल लगती थी। कैसे अनोखे बंधन में बंधे थे यह दोनों? एक दूसरे का मान-सम्मान करना, एक दूसरे को आगे बढ़ाना,एक दूसरे की कद्र करना कोई इनसे सीखे…सारा समाज, रिश्तेदार उनके इस फैसले को स्वीकार करने लगे थे मानने लगे थे उनकी उपस्थिति को… अब समाज और परिवार में मायने रखती थी उनकी मौजूदगी…सब कहते कि,आज के नवयुग से बेहतर आबंध तो इनका है। आशा जी और मोहन जी की जोड़ी ने एक आदर्श स्थापित किया था समाज में। आज हम देखते हैं समाज में पंद्रह दिन, एक महीना, एक साल की शादियों में संबंध विच्छेद की घटनाएं तेजी से आखिर क्यों बढ़ रही है? वहीं अपने जीवन की दूसरी पारी में भी आशा जी और मोहन जी सफल रहे…. आखिर क्यों?
आखिर क्यों-गृहलक्ष्मी की कहानियां
