Bhagwan Vishnu Katha: किसी समय की बात है – धरती पर सर्पों और नागों ने भयानक उत्पात मचा रखा था । इनसे आतंकित होकर सभी मनुष्य कश्यप मुनि की शरण में गए । तब कश्यप जी ने ब्रह्माजी के सहयोग से कुछ दिव्य मंत्रों की रचना की । महर्षि कश्यप ने अपने मन से एक देवी की उत्पत्ति की और ब्रह्माजी ने उन्हें इन मंत्रों की अधिष्ठात्री देवी बना दिया । महर्षि कश्यप के मन से प्रकट होने के कारण ये देवी ‘मनसा’ नाम से प्रसिद्ध हुईं । बाद में ब्रह्माजी ने मनसा को नागों की देवी नियुक्त किया । इन देवी की स्तुति और मंत्रों से नागों के आतंक से लोगों को मुक्ति मिल गई ।
प्रकट होते ही मनसा देवी भगवान् शिव के धाम में चली गईं और वहाँ रहकर कठोर तप करने लगीं । शिवजी ने प्रसन्न होकर मनसा को दिव्य ज्ञान प्रदान किया और परब्रह्म श्रीकृष्ण के अष्टाक्षर मंत्र का उपदेश दिया । मनसा देवी ने अष्टाक्षर मंत्र का तीन युगों तक निरंतर जप किया । मनसा के जप से प्रसन्न होकर भगवान् श्रीकृष्ण ने उन्हें जरत्कारु नाम से सम्बोधित करते हुए दिव्य सिद्धि प्रदान की । तत्पश्चात् उन्होंने मनसा देवी की विधिवत् पूजा की । इसके बाद ब्रह्मा, शिव, कश्यप, इन्द्रादि देवगण, नागों, गंधर्वों आदि ने भी मनसा देवी की विधिवत स्तुति की । इस प्रकार जगत् में मनसा – देवी के रूप में स्थापित होकर पूजी जाने लगीं ।
एक प्रचलित कथा में बताया गया है कि – कश्यप मुनि ने मुनिश्रेष्ठ जरत्कारु के साथ मनसा का विवाह कर दिया । विवाह से पूर्व जरत्कारु मुनि ने प्रतिज्ञा की कि ‘जिस क्षण साध्वी मनसा उनके कर्मों में बाधा बनेगी या उनकी आज्ञा का उल्लंघन करेगी वे उसी क्षण उसका त्याग कर देंगे ।’ विवाह के बाद वे तपस्या करने में संलग्न हो गए ।
एक दिन मुनि जरत्कारु को निद्रा ने आ घेरा । वे मनसा की गोद में सिर रखकर सो गए । जब सूर्य अस्त होने लगे, तब मनसा देवी ने विचार किया – ‘जरत्कारु मुनि संध्या के समय नियमित पूजा करते हैं । यदि ये समय से नहीं उठे तो इनका नियम भंग हो जाएगा और ये पाप के भागी बन जाएँगे ।’ यह विचार कर मनसा ने जरत्कारु मुनि को जगा दिया ।
निद्रा के भंग होने पर महर्षि जरत्कारु क्रोधित हो गए और मनसा से बोले – “हे साध्वी! मैं सुखपूर्वक सो रहा था । तुमने मेरी निद्रा क्यों भंग कर दी? जो स्त्री अपने पति के कर्मों में बाधा बनती है, उसके व्रत, तपस्या, उपवास और दान आदि सभी सत्कर्म व्यर्थ हो जाते हैं । स्वामी का अप्रिय कार्य करने वाली स्त्री किसी भी सत्कर्म का फल नहीं प्राप्त कर सकती ।” मुनि जरत्कारु को क्रोधित देख साध्वी मनसा विनम्र शब्दों में बोलीं – “हे देव! मेरा उद्देश्य आपकी आज्ञा का उल्लंघन करना नहीं था । आप नियमित रूप से संध्या-पूजन करते हैं । यदि आज आप सोये रहते तो आपका नियम-धर्म नष्ट हो जाता । इसी भय से मैंने आपको जगा दिया ।” मनसा देवी की बात सुनकर जरत्कारु मुनि प्रसन्न हो गए, किंतु अपनी प्रतिज्ञा की रक्षा के लिए उन्होंने उनका त्याग कर दिया । उस समय साध्वी मनसा के शोक की कोई सीमा नहीं रही । तब मनसा ने शिव, ब्रह्माजी, श्रीकृष्ण तथा महर्षि कश्यप का स्मरण किया । मनसा के चिंतन करते ही सभी देवता वहाँ उपस्थित हो गए । जरत्कारु मुनि उन्हें प्रणाम करके उनकी स्तुति करने लगे ।
तब भगवान् श्रीकृष्ण बोले – “हे मुनिश्रेष्ठ ! तुम्हारी पत्नी मनसा एक परम साध्वी स्त्री है । तुम व्यर्थ ही उसे दण्ड का भागी बना रहे हो । पत्नी का यह कर्त्तव्य है कि वह सदा अपने पति के हितों का ध्यान रखे । तुम्हारे हित के लिए ही इसने अपने धर्म का उल्लंघन किया है । इसमें इसका कोई दोष नहीं हैं । किंतु फिर भी यदि तुम इसे त्यागना चाहते हो तो पहले इसे जननी बना दो, जिससे कि यह अपने मातृ- धर्म का पालन कर सके ।”
भगवान् श्रीकृष्ण की बात सुनकर जरत्कारु मुनि ने मंत्र पढ़कर मनसा का स्पर्श किया और बोले – “प्रिय! इस स्पर्श से तुम्हें एक ज्ञानवान पुत्र प्राप्त होगा । वह पुत्र जितेन्द्रिय, पुरुषों में श्रेष्ठ, धार्मिक, ब्रह्मज्ञानी, तेजस्वी, तपस्वी, यशस्वी, ज्ञानियों और योगियों में प्रमुख विष्णुभक्त तथा अपने कुल का उद्धारक होगा । हे प्रिय ! प्रतिज्ञावश मैंने तुम्हारा त्याग कर दिया, मेरे इस अपराध को क्षमा करो । मैं तपस्या करने के लिए जा रहा हूँ । तुम भी सुखपूर्वक यहाँ से जाओ ।”
मुनिवर जरत्कारु के ये वचन सुनकर मनसा देवी दु:खी होते हुए बोलीं – “हे देव! पत्नी के लिए उसका पति सौ पुत्रों से भी अधिक प्रिय होता है । इसी कारण विद्वानों ने पति को प्रिय की संज्ञा दी है । एक पुत्र वालों का पुत्र में, वैष्णव पुरुषों का भगवान् विष्णु में, विद्वानों का शास्त्रों में, वैश्यों का वाणिज्य में, निरंतर मन लगा रहता है; उसी प्रकार पतिव्रता स्त्रियों का मन सदा अपने स्वामी के चरण-कमलों में लगा रहता है । अतः हे देव! मेरी प्रार्थना है कि मैं जब भी आपका स्मरण करूँ, आप उसी क्षण मुझे दर्शन देकर कृतार्थ करें ।”
मुनि जरत्कारु दया के सागर थे । उन्होंने मनसा को इच्छित वर प्रदान कर दिया और श्रीकृष्ण के चरणों का स्मरण करते हुए तपस्या करने के लिए वन में चले गए । मनसा देवी कश्यप ऋषि के आश्रम में आकर रहने लगीं । वहाँ भगवती माता ने दर्शन देकर उन्हें दिव्य-ज्ञान प्रदान किया । जरत्कारु ऋषि के वरदानस्वरूप मनसा देवी ने एक पुत्र को जन्म दिया । जब वह गर्भ में था तभी भगवान् शिव ने उसे वेदों-पुराणों और महामृत्युंजय मंत्र का सारा ज्ञान प्रदान कर दिया था । वह बालक बड़ा होकर योगियों और ज्ञानियों का गुरु बना । भगवान् शिव ने उसका नामकरण किया । चूँकि पिता के अस्त होने के अवसर पर उस बालक की उत्पत्ति हुई थी, इसलिए उसका नाम ‘आस्तीक’ रखा गया ।
जब राजा जनमेजय ने अपने पिता परीक्षित की मृत्यु का प्रतिशोध लेने के लिए एक विशाल सर्प-यज्ञ का आयोजन किया, तो तक्षक नाग और इन्द्र ने आस्तीक मुनि से सहायता की प्रार्थना की । तब आस्तीक मुनि ने ही जनमेजय को सर्प-यज्ञ बंद करने के लिए विवश कर दिया था । उनके इस कार्य से प्रसन्न होकर देवताओं ने भक्तिपूर्वक उनकी माता मनसा देवी की स्तुति की ।
मनसा देवी लम्बे समय तक कश्यपजी के आश्रम में रहीं । फिर अपने अवतार को सार्थक कर वापस स्वर्ग लौट गईं ।
ये कथा ‘पुराणों की कथाएं’ किताब से ली गई है, इसकी और कथाएं पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं – Purano Ki Kathayen(पुराणों की कथाएं)
