खनकती कांच की चूड़ियाँ-गृहलक्ष्मी की लघु कहानी
Khanakti Kaanch ki Chhudiyan

कमलेश जी को सजने सवंरने का बहुत शौक रहा, शुरू से ही। हाथ भर-भर के चूड़ियाँ, भारी सी पाजेब और पैरों में बड़ी-बड़ी बिछिया उनको बहुत भाती थी। अब तो उम्र हो गई लेकिन जब ससुराल की पूरी गृहस्थी संभालती थी तब भी सजने सवंरने का समय निकाल ही लेती।
तीज त्योहार पर तो ऐसे चहकती कि घर की दीवारें भी बोल उठे।
परिवार में हर कोई उनकी तारीफ ही करता। धीरे-धीरे समय बीतता गया। घर में नई बहू बेटियां आ गई। घर के ज्यादातर लोग अब उनको अम्मा ही कहते थे।
तीज आने वाली थी इसलिए कमलेश जी की बड़ी  इच्छा हो रही थी कि सुहाग का त्यौहार है। घर की सभी बहू बेटियों को नई चूड़ियां और श्रृंगार का सामान दिलवा लायें।
लेकिन अब नई बहू बेटियां सुनती ही कहां है। पोत बहु तो हाथ नंगे ही रखती। अम्मा मन मसोस के रह जाती।
इधर घर में कामवाली बाई पूरे हाथ भर-भर के चूड़ियां पहनकर पोछा लगाती तो अम्मा को उसकी चूड़ी की खनक बहुत अच्छी लगती। बर्तन मांजते समय भी उसके हाथों की चूड़ियों की खनखन अम्मा को बहुत सुहाती।

परिवार के लोग तो अम्मा की बात सुनते ही नहीं थे। अम्मा रहती अपनी धुन में मगन।
तीज से दो दिन पहले अम्मा कामवाली राजवती से बोली, “ले राजवती यह पैसे रख ले। अपनी पसंद की चूड़ियां पहन आना। श्रृंगार का सामान भी ले आना तीज के लिए। शुभ होता है। जिसके भाग में है उसके लिए ही सही।”
राजवती के तो चमन ही खिल गए। राजवती तो अगले ही दिन नई चूड़ियां पहन कर खुश होती फिर रही थी। उसकी चूड़ियों की खनक पूरे घर में गूंज रही थी।

अम्मा को  भी संतुष्टि हो रही थी। चलो कोई तो सुन लेता है। अम्मा भी अपनी धुन में मगन खुश चलो जिसके भाग का, उसी को सही।
हालांकि घर की महिलाएं थोड़ी सी चिढ़ गई। क्योंकि उनका स्थान कुछ हद तक कामवाली ने जो ले लिया था।